सागर के बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज की चौंकाने वाली रिसर्च, डायबिटीज और थायराइड के मेल से बढ़ रहा है अंधापन का खतराकैलाश मानसरोवर यात्रा: भगवान शिव के इस पवित्र धाम तक पहुंचने का कठिन रास्ता और जरूरी बातेंघुटनों के दर्द और आंतों की सेहत का क्या है नाता, नई रिसर्च में इनुलिन फाइबर को लेकर हुआ बड़ा खुलासागोविंदा ने सुनाया मां निर्मला देवी का दर्द भरा किस्सा, परिवार के लिए मुंडवा लिया था सिर और भौहेंनवंबर में इन 5 मूलांकों की चमकेगी किस्मत, अंकशास्त्र के अनुसार होगा चौतरफा लाभबिना वैध वजह वैवाहिक संबंधों से लंबे समय तक दूरी बनाना मानसिक प्रताड़ना, राजस्थान हाईकोर्ट ने तलाक की डिक्री बरकरार रखीदिवाली बॉक्स ऑफिस के असली बादशाह अमिताभ बच्चन, सालों तक कोई नहीं तोड़ पाया था उनका यह रिकॉर्डठंड के मौसम में ऊर्जा बनाए रखने के लिए घर पर तैयार करें सूजी और ड्राई फ्रूट्स के पौष्टिक लड्डूबिग बॉस 20 में लव गिल ने काशवी को दिया करारा जवाब, माही विज और आम्रपाली दुबे के बीच किचन में हुई तीखी जंगदीये की लौ पर टकटकी लगाकर देखने से क्या बदलता है? जानिए तनाव और अनिद्रा के लिए त्राटक क्रिया के फायदे
मेवाड़ में श्राद्ध पक्ष के दौरान घर की दीवारों पर गोबर और फूलों से सजती है पारंपरिक सांझी कलाकल्चर
29 सित॰ 2026, 8:42 am (29 दिन पहले)· 1

मेवाड़ में श्राद्ध पक्ष के दौरान घर की दीवारों पर गोबर और फूलों से सजती है पारंपरिक सांझी कला

मेवाड़ क्षेत्र में श्राद्ध पक्ष के दौरान महिलाएं और बेटियां प्राकृतिक चीजों से सांझी तैयार करती हैं। बिना बाजार के महंगे सामान के गोबर, फूल-पत्तियों और अनाज से बनने वाली यह लोककला पीढ़ियों से परिवारों को एक सूत्र में पिरो रही है।

राजस्थान के मेवाड़ अंचल में धार्मिक उत्सव और रीति-रिवाज केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे स्थानीय लोकसंस्कृति और घरेलू आंगन की आत्मीयता से सीधे जुड़े होते हैं। श्राद्ध पक्ष के दिनों में इस इलाके के घरों में सांझी बनाने का एक विशेष रिवाज देखने को मिलता है। इस दौरान परिवार की महिलाएं और बेटियां अपने मकान की कच्ची दीवारों या आंगन की जमीन पर गाय के गोबर का उपयोग करके मनमोहक सांझी तैयार करती हैं। इसे सजाने के लिए बाजार की किसी भी कृत्रिम सामग्री की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के मेल से ही इसे भव्य रूप दिया जाता है।

गोबर के आधार पर उभरती हैं पारंपरिक आकृतियां

इस अनूठी लोककला को बनाने की शुरुआत सतह तैयार करने से होती है। सबसे पहले दीवार पर या आंगन के फर्श पर गाय के ताजे गोबर से एक चिकना लेप लगाकर मजबूत आधार बनाया जाता है। आधार तैयार हो जाने के बाद उस पर हाथों से विभिन्न प्रकार के रूपांकन उकेरे जाते हैं। इन आकृतियों में प्रकृति और आस्था का सुंदर संगम देखने को मिलता है। कई स्थानों पर बेल-बूटों और सुंदर फूल-पत्तियों के डिजाइन बनाए जाते हैं, तो कई घरों में देवी-देवताओं के स्वरूप तथा शुभ पारंपरिक प्रतीकों को दीवार पर स्थान दिया जाता है।

ये भी पढ़ें

इन आकृतियों को आकर्षक बनाने के लिए आसपास मौजूद सहज प्राकृतिक वस्तुओं का ही सहारा लिया जाता है। ताजे रंग-बिरंगे फूल, हरी पत्तियां, अलग-अलग प्रकार के अनाज के दाने और स्थानीय स्तर पर मिलने वाले प्राकृतिक रंग इसमें भरे जाते हैं। पर्यावरण के अनुकूल यह शैली स्थानीय जीवनशैली की सादगी को उजागर करती है।

साझा सृजन और गीतों से बंधता पारिवारिक ताना-बाना

मेवाड़ की सांझी परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्वावलंबी और सादगीपूर्ण स्वरूप है। इसके निर्माण में बाजार से कोई भी महंगा सजावटी सामान खरीदने की कोई बाध्यता नहीं रहती। रसोई और घर-आंगन में पहले से मौजूद साधारण वस्तुओं के विवेकपूर्ण उपयोग से ही दीवारें खिल उठती हैं। इसी सादगी की बदौलत ग्रामीण क्षेत्रों और पारंपरिक संयुक्त परिवारों में यह कला आज भी मजबूती से जीवित है।

पुराने समय में सांझी का निर्माण महिलाओं और बच्चों के दैनिक जीवन का एक जरूरी और उल्लासपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। दिन ढलने पर शाम के समय घर की सभी स्त्रियां और बच्चे एक जगह इकट्ठा होकर मिल-जुलकर सांझी सजाते थे। इस दौरान पारंपरिक लोकगीत गाए जाते थे, जिनकी मधुर तान से पूरा परिवेश गूंज उठता था। इस तरह यह केवल एक मौसमी कलाकृति बनाने का काम नहीं था, बल्कि परिवार के सदस्यों को आपसी प्रेम, सहयोग और आत्मीयता के धागे में पिरोने का सशक्त माध्यम भी था।

आधुनिक दौर में लोकसंस्कृति के संरक्षण का संकल्प

वर्तमान युग में घर-आवास की सजावट के तौर-तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं और बाजार में हर तरह के प्लास्टिक व रेडीमेड सजावटी उत्पाद प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। ऐसे आधुनिक समय में भी गोबर, मिट्टी और फूलों से सांझी बनाने की परिपाटी को जीवित रखना मेवाड़ की प्राचीन धरोहर को सहेजने के बराबर है। कई इलाकों में युवा पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों से इस कला की बारीकियां समझ रही है और इसे सीख रही है।

मेवाड़ की यह अनूठी प्रथा यह संदेश देती है कि सांस्कृतिक सौंदर्य का संबंध बाजार के महंगे खर्च से नहीं, बल्कि मिट्टी, गोबर और वनस्पतियों से जुड़े उन सरल उपादानों से है जो हमारी जड़ों को सदियों से पोषित करते आ रहे हैं।

सवाल-जवाब

मेवाड़ में सांझी कला किस अवसर पर बनाई जाती है?
मेवाड़ क्षेत्र में सांझी बनाने की यह विशेष परंपरा मुख्य रूप से श्राद्ध पक्ष के दिनों में निभाई जाती है।
सांझी बनाने के लिए किस मुख्य सामग्री का उपयोग किया जाता है?
इसके लिए दीवार या जमीन पर गाय के गोबर से आधार तैयार किया जाता है और फिर प्राकृतिक चीजों से आकृतियां बनाई जाती हैं।
सांझी में किन-किन चीजों से सजावट की जाती है?
इसे सजाने के लिए ताजे फूल, पत्तियां, विभिन्न प्रकार के अनाज और आसपास उपलब्ध प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है।
सांझी पर आमतौर पर कौन से डिजाइन या आकृतियां उकेरी जाती हैं?
दीवारों पर फूल-पत्तियों के बेल-बूटे, देवी-देवताओं के चित्र और कई पारंपरिक मांगलिक प्रतीक उकेरे जाते हैं।
पारिवारिक दृष्टि से सांझी परंपरा का क्या महत्व है?
शाम के समय परिवार की महिलाएं और बच्चे एक साथ मिलकर इसे बनाते हैं और लोकगीत गाते हैं, जिससे पारिवारिक मेलजोल बढ़ता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp