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शर्की बेगम की इस ऐतिहासिक धरोहर को कभी कहते थे नमाजगाह, जानिए जौनपुर के लाल दरवाजे का दिलचस्प सफरकल्चर
2 सित॰ 2026, 9:30 am (56 दिन पहले)· 2

शर्की बेगम की इस ऐतिहासिक धरोहर को कभी कहते थे नमाजगाह, जानिए जौनपुर के लाल दरवाजे का दिलचस्प सफर

जौनपुर की प्रसिद्ध लाल दरवाजा मस्जिद का मूल नाम नमाजगाह था, जिसे शर्की राजवंश की रानी बीबी राजे ने बनवाया था। जानिए कैसे महल के लाल दरवाजे से इस धरोहर की पहचान बदल गई।

उत्तर प्रदेश के जौनपुर शहर में स्थित लाल दरवाजा मस्जिद केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि अपने भीतर सदियों पुरानी संस्कृति और कहानियों को समेटे हुए एक महत्वपूर्ण धरोहर है। आज भले ही लोग इसे लाल दरवाजा मस्जिद के नाम से जानते हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक स्थल का एक और पुराना नाम भी था, जिसे समय के साथ लोग लगभग भूल चुके हैं। इतिहास पर शोध करने वाले अजमत के अनुसार, इस मस्जिद का वास्तविक और मूल नाम 'नमाजगाह' था। इस नाम के बदलने और इसके निर्माण के पीछे एक बेहद दिलचस्प ऐतिहासिक घटनाक्रम जुड़ा हुआ है।

बीबी राजे और नमाजगाह के निर्माण की कहानी

लाल दरवाजा मस्जिद के निर्माण का श्रेय शर्की राजवंश के शासक महमूद शाह शर्की की पत्नी बीबी राजे को जाता है। उस दौर की शासन व्यवस्था में बीबी राजे का काफी गहरा प्रभाव और दबदबा माना जाता था। उन्होंने न केवल प्रशासनिक मामलों में अपनी भूमिका निभाई, बल्कि महिलाओं के कल्याण, धार्मिक गतिविधियों और सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर योगदान दिया। इसी क्रम में उन्होंने एक बुजुर्ग संत सैयद अली के लिए इस मस्जिद का निर्माण कराया था। सैयद अली का संबंध उस स्थान से था जो शहर की प्रसिद्ध बड़ी मस्जिद के ठीक पीछे स्थित क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।

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महल सरा और 'लाल दरवाजा' नाम पड़ने की वजह

इतिहासकार अजमत बताते हैं कि बीबी राजे के भव्य निवास स्थान को 'महल सरा' के नाम से जाना जाता था। इसी महल से सटाकर मस्जिद का निर्माण इस उद्देश्य से कराया गया था कि सैयद अली वहां रहकर आसानी से निवास कर सकें और नियमित रूप से नमाज तथा इबादत अदा कर सकें। इस इमारत की नक्काशी और वास्तुकला आज भी उस दौर के बेहतरीन स्थापत्य कला की गवाही देती है। मस्जिद की दीवारों पर उकेरी गई लिखावट और इसके निर्माण की विशेष शैली इसे जौनपुर की सबसे खूबसूरत धरोहरों में शामिल करती है।

मस्जिद का शुरुआती नाम नमाजगाह ही था। हालांकि, समय बीतने के साथ बीबी राजे के महल 'महल सरा' के मुख्य प्रवेश द्वार का सुर्ख लाल रंग लोगों के आकर्षण और पहचान का केंद्र बन गया। लाल रंग के विशाल दरवाजे के कारण स्थानीय लोग धीरे-धीरे इस पूरे इलाके को 'लाल दरवाजा' कहकर पुकारने लगे। देखते ही देखते यह नाम इतना अधिक लोकप्रिय हो गया कि मस्जिद का असली नाम नमाजगाह लोगों की स्मृति से ओझल होता चला गया और इमारत को लाल दरवाजा मस्जिद के रूप में पहचान मिल गई।

इतिहास के संरक्षण में चुनौतियां और पर्यटन की संभावनाएं

जौनपुर के समृद्ध इतिहास के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसके दस्तावेजों की सीमित पहुंच है। अजमत के अनुसार, जौनपुर के इतिहास से जुड़ी कई महत्वपूर्ण और प्रामाणिक पुस्तकें फारसी भाषा में लिखी गई हैं। इसके अलावा कुछ साहित्य उर्दू भाषा में भी उपलब्ध है, लेकिन उनका प्रकाशन और वितरण बेहद सीमित दायरे तक ही सिमट कर रह गया। इस कारण नई पीढ़ी अपने ही शहर के इस शानदार और गौरवशाली इतिहास से पूरी तरह से जुड़ नहीं पा रही है।

अजमत का मानना है कि जौनपुर की इन ऐतिहासिक इमारतों को पर्यटन के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानचित्र से प्रमुखता से जोड़ा जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, पास में स्थित वाराणसी शहर में हर साल लाखों देशी और विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं, जबकि जौनपुर में भी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि इन ऐतिहासिक स्थलों का उचित संरक्षण किया जाए, उन्हें सजाया और संवारा जाए तथा उनकी ऐतिहासिक गाथाओं को देश और दुनिया के पर्यटकों तक सही तरीके से पहुंचाया जाए। लाल दरवाजा मस्जिद की दास्तान केवल एक नाम के बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह जौनपुर के उस महान अतीत का प्रतीक है जिसे आज फिर से पढ़ने, समझने और संजोने की जरूरत है।

सवाल-जवाब

लाल दरवाजा मस्जिद कहां स्थित है और इसका निर्माण किसने कराया था?
यह ऐतिहासिक मस्जिद उत्तर प्रदेश के जौनपुर शहर में स्थित है और इसका निर्माण शर्की राजवंश के शासक महमूद शाह शर्की की पत्नी बीबी राजे ने कराया था।
लाल दरवाजा मस्जिद का मूल नाम क्या था?
इस मस्जिद का मूल नाम 'नमाजगाह' था, जो समय के साथ बदलकर लाल दरवाजा मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
नमाजगाह का नाम लाल दरवाजा मस्जिद कैसे पड़ा?
बीबी राजे के महल 'महल सरा' के मुख्य दरवाजे का रंग सुर्ख लाल था, जिसके कारण स्थानीय लोग इस क्षेत्र और मस्जिद को 'लाल दरवाजा' कहने लगे।
बीबी राजे ने इस मस्जिद का निर्माण किसके लिए कराया था?
बीबी राजे ने इस मस्जिद का निर्माण बुजुर्ग संत सैयद अली के रहने और नमाज अदा करने के लिए कराया था।
जौनपुर के इतिहास को जानने में क्या मुख्य चुनौती है?
जौनपुर के इतिहास से जुड़ी कई मुख्य पुस्तकें फारसी और उर्दू में उपलब्ध हैं, जिनका सीमित प्रकाशन होने के कारण नई पीढ़ी तक यह जानकारी आसानी से नहीं पहुंच पाती।
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