ओपनएआई ने चैटजीपीटी में जोड़ा जीआईएफ मेकर, स्थिर तस्वीरों और स्केच में जान फूंकना हुआ आसानअमेरिकी विदेश मंत्रालय में बड़े फेरबदल की चर्चाओं के बीच सर्जियो गोर ने मार्को रुबियो की जगह लेने की बातों को नकाराओपनएआई के अध्यक्ष ग्रेग ब्रुकमैन ने संकेत दिया, 2027 तक आईपीओ के लिए तैयार हो सकती है कंपनीदीवाली पार्टी में साथ नजर आईं ईशा देओल और भरत तख्तानी, तलाक के बाद दिखी दोस्ताना बॉन्डिंगकानपुर के पनकी में दिवाली पर ढही पुराने मकान की छत, नवजात सहित परिवार के तीन सदस्यों की जान गईदिवाली मुहूर्त ट्रेडिंग के 15 वर्षों के रिकॉर्ड में 80 फीसदी बार चमका बाजार, जानिए इस बार के समीकरणहूतियों के मिसाइल नेटवर्क में मिले चीनी सैन्य पुर्जे, सऊदी अरब और पश्चिम एशिया में बढ़ा नया रणनीतिक तनावदेवेंद्र फडणवीस ने किसानों के साथ मनाई दिवाली, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की सराहनाचुनावी फंडिंग में कांग्रेस को तगड़ा झटका, बड़े चंदे में आई 75 प्रतिशत की भारी गिरावटदीवाली पर मिठाइयों की शक्ल में जगमगाएंगी मोमबत्तियां, देहरादून के बाजारों में अनोखी स्वीट कैंडल्स की भारी मांग
तेलंगाना के आदिवासी इलाकों में दिवाली पर दांडारी गुस्साड़ी नृत्य की अनूठी धूम, नटराज बनकर युवक चुनते हैं जीवनसंगिनीकल्चर
8 नव॰ 2026, 1:57 pm (11 मिनट पहले)· 0

तेलंगाना के आदिवासी इलाकों में दिवाली पर दांडारी गुस्साड़ी नृत्य की अनूठी धूम, नटराज बनकर युवक चुनते हैं जीवनसंगिनी

आदिलाबाद के गोंड, कोलम और आंध समाज के लोग दिवाली पर करीब नौ दिनों तक दांडारी गुस्साड़ी उत्सव मनाते हैं, जिसमें युवा भगवान नटराज के रूप में रातभर नृत्य करते हैं.

दीपावली की रात जब पूरा देश दीपों की जगमगाहट में डूबा रहता है, तब तेलंगाना के जंगलों और पहाड़ियों से घिरे आदिवासी गांवों में ढोलक और पारंपरिक वाद्यों की अनोखी गूंज सुनाई देती है. राजधानी हैदराबाद से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर बसे आदिलाबाद क्षेत्र के मारलावाई, नारनूर और जैनूर जैसे गांवों में यह समय पारंपरिक दांडारी गुस्साड़ी उत्सव का होता है. इस पावन पर्व को मनाने के लिए गोंड, कोलम और आंध समुदाय के लोग एक साथ जुटते हैं और यह आयोजन लगातार 8 से 9 दिनों तक चलता है. सदियों पुरानी इस सांस्कृतिक विरासत में आस्था, कठोर अनुशासन और सामाजिक मेलमिलाप का एक दुर्लभ संगम देखने को मिलता है.

गांव के मुखिया का फैसला और गुस्साड़ी नर्तकों का चयन

इस पूरे उत्सव के शुभारंभ का दिन और समय हर गांव का मुखिया तय करता है, जिसे स्थानीय स्तर पर पटेल कहा जाता है. पटेल की अगुवाई में यह पर्व आम तौर पर दीपावली से ठीक पहले प्रारंभ होता है और त्योहार बीत जाने के कुछ दिनों बाद तक जारी रहता है. उत्सव के संचालन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी नर्तकों का चयन होता है. गांव का पटेल ही पूरी परख के बाद अपनी बस्ती से दो से आठ सबसे योग्य युवकों को चुनता है. गोंडी बोली में इन चुने हुए युवकों को गुस्साड़ी की संज्ञा दी जाती है, जो इस पूरे पर्व में मुख्य नर्तक की भूमिका निभाते हैं.

ये भी पढ़ें

शिव के नटराज स्वरूप का श्रृंगार और कठोर नियम

गुस्साड़ी बनने वाले नौजवान देवाधिदेव भगवान शिव के तांडव स्वरूप नटराज की तरह अपना रूप सजाते हैं. उनके हाथ में लकड़ी का एक मजबूत डंडा थमाया जाता है, जो भगवान शिव के त्रिशूल का प्रतीक माना जाता है. जब 40 से 50 लोगों का पूरा दल एक गांव से दूसरे गांव की यात्रा करता है, तब रात 10 बजे से लेकर सुबह 4 बजे तक ढोल की ताल पर ऊर्जावान नृत्य प्रस्तुत किया जाता है. इस उत्सव की अवधि में चुने गए गुस्साड़ी युवकों को बेहद सख्त नियमों का पालन करना होता है. उन्हें पूरे पर्व के दौरान नंगे पैर रहना पड़ता है और विश्राम के लिए जमीन पर ही सोना अनिवार्य होता है.

नृत्य की विभिन्न शैलियां और जीवनसाथी चुनने का अवसर

दांडारी गुस्साड़ी उत्सव के दौरान मुख्य रूप से तीन प्रकार के नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं. इनमें पहला केंद्रीय गुस्साड़ी नृत्य है, जिसके अंतर्गत पांच अलग अलग उप शैलियां शामिल होती हैं. दूसरा नृत्य पोलाक कहलाता है, जिसमें पुरुष महिलाओं की वेशभूषा धारण करके गुस्साड़ी नर्तकों के संग कदम मिलाते हैं. तीसरा अद्यान नृत्य होता है, जिसे मुख्य रूप से महिलाएं प्रस्तुत करती हैं. जब यह सांस्कृतिक टोली दूसरे गांवों में पहुंचती है, तो वहां की युवतियां इन नर्तकों की कला देखने एकत्र होती हैं. यदि किसी युवती को कोई नर्तक पसंद आ जाए या युवक किसी कन्या में रुचि दिखाए, तो वे इस बात की सूचना अपने कुल के बुजुर्गों को देते हैं. इसके पश्चात दोनों परिवारों के वरिष्ठ सदस्य बैठकर रिश्ते को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाते हैं. यद्यपि यह इस पर्व का मूल उद्देश्य नहीं है, फिर भी यह उत्सव जीवनसाथी चुनने का एक सहज माध्यम बन जाता है.

वेशभूषा में ऐतिहासिक बदलाव और सरकारी सहायता

समय के साथ गुस्साड़ी नर्तकों की वेशभूषा में कई रोचक बदलाव आए हैं. पूर्व में नर्तक त्रिशूल की बनावट वाली टोपी पहनते थे, लेकिन वर्तमान समय में इसका स्थान मोरपंखों और छोटे शीशों से जड़ी गोल टोपी ने ले लिया है. वन्यजीव सुरक्षा कानूनों का आदर करते हुए अब हिरण की खाल की जगह बकरी की खाल का प्रयोग किया जाता है. कुछ युवा आधुनिकता का पुट जोड़ते हुए धूप के चश्मे और चमकीले लहंगे भी पहनने लगे हैं. इतिहासकारों का मानना है कि इस परंपरा का इतिहास करीब 2,500 साल पुराना है और इसका उल्लेख प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है. इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने के मकसद से तेलंगाना सरकार ने 1.5 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है, जिसके माध्यम से करीब 1,000 सांस्कृतिक मंडलियों को 15-15 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जा रही है.

सवाल-जवाब

दांडारी गुस्साड़ी उत्सव मुख्य रूप से किन क्षेत्रों में मनाया जाता है?
यह उत्सव तेलंगाना के आदिलाबाद क्षेत्र के मारलावाई, नारनूर और जैनूर जैसे आदिवासी गांवों में मनाया जाता है.
इस उत्सव में कौन से जनजातीय समुदाय भाग लेते हैं?
इस सांस्कृतिक उत्सव में मुख्य रूप से गोंड, कोलम और आंध समुदाय के लोग एक साथ मिलकर हिस्सा लेते हैं.
गुस्साड़ी नर्तकों का चयन कौन करता है और उनकी संख्या कितनी होती है?
गांव का मुखिया यानी पटेल प्रत्येक गांव से दो से आठ युवकों को मुख्य गुस्साड़ी नर्तक के रूप में चुनता है.
नर्तकों को इस दौरान किन विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है?
चुने गए गुस्साड़ी नर्तकों को पूरे उत्सव के दौरान नंगे पैर रहना होता है और रात में जमीन पर ही सोना पड़ता है.
उत्सव में प्रस्तुत किए जाने वाले तीन प्रमुख नृत्य कौन से हैं?
इसमें मुख्य गुस्साड़ी नृत्य, पुरुषों द्वारा स्त्री वेश में किया जाने वाला पोलाक नृत्य और महिलाओं का अद्यान नृत्य शामिल है.
तेलंगाना सरकार इस परंपरा के संरक्षण के लिए क्या सहायता दे रही है?
सरकार ने 1.5 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जिसके तहत करीब 1,000 मंडलियों को 15-15 हजार रुपये की मदद दी जा रही है.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp