उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में आस्था और लोकसंस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जहां मनाया जाने वाला लोकपर्व सातू-आठूं यानी गौरा-महेश उत्सव अपनी समृद्ध परंपराओं के लिए खास पहचान रखता है। इस पर्व के दौरान बुरुड़, जिसे कई क्षेत्रों में बिरुड़ या बिरुड़े भी कहा जाता है, उसका धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से बहुत बड़ा महत्व माना गया है। यह केवल पूजा की एक साधारण सामग्री तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं की पारंपरिक कृषि संस्कृति और वहां के जनजीवन की सामूहिक भावना को भी खूबसूरती से दर्शाता है। इस विशेष प्रसाद को तैयार करने की प्रक्रिया काफी दिलचस्प होती है और इसमें कई तरह के अनाजों का इस्तेमाल किया जाता है।
बिरुड़ तैयार करने की पूरी विधि और सामग्री
यह पारंपरिक प्रसाद मुख्य रूप से पांच या सात तरह के अनाजों और दालों को आपस में मिलाकर तैयार किया जाता है। हालांकि अलग-अलग इलाकों और परिवारों की अपनी स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री में थोड़ा बहुत अंतर भी देखने को मिल जाता है। आमतौर पर इस मिश्रण में चना, गहत, गेहूं, उड़द, मटर और मक्का जैसे पौष्टिक अनाज शामिल किए जाते हैं। इसके अलावा कुछ जगहों पर स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध अन्य अनाज या दालें भी इसमें मिलाई जाती हैं। इन सभी अनाजों और दालों को सबसे पहले अच्छी तरह साफ किया जाता है और फिर पानी में भिगोकर रखा जाता है। परंपरा के अनुसार इन्हें तांबे या पीतल के बर्तनों में भिगोने का रिवाज है, जिससे पानी में रहने के बाद ये अनाज नरम हो जाते हैं और पूजा के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं।
भाद्रपद शुक्ल पंचमी से शुरू होती है विशेष परंपरा
बागेश्वर की रहने वाली माधुरी देवी के अनुसार, बुरुड़ तैयार करने की पूरी प्रक्रिया भाद्रपद शुक्ल पंचमी यानी बिरुड़ पंचमी के दिन से आरंभ हो जाती है। इस खास दिन पर पांच या सात प्रकार के अनाजों और दालों को भली-भांति साफ करके पानी में भिगोया जाता है और तय नियमों के अनुसार संभाल कर रखा जाता है। इसके बाद सप्तमी के दिन इन भीगे हुए अनाजों और दालों को दोबारा अच्छी तरह धोकर पूजा-पाठ के लिए तैयार किया जाता है। फिर महाष्टमी के दिन भगवान महेश और देवी गौरा की पूजा के दौरान इस तैयार किए गए बुरुड़ को अर्पित किया जाता है। जब अनुष्ठान पूरा हो जाता है, तब इसे प्रसाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों के साथ-साथ अन्य लोगों में भी वितरित किया जाता है, यही वजह है कि कुमाऊं में इसे इस लोकपर्व का सबसे अहम हिस्सा माना गया है।
कृषि संस्कृति और पारिवारिक विरासत का प्रतीक
बुरुड़ की यह प्राचीन परंपरा कुमाऊं के ग्रामीण जीवन और वहां की खेती से जुड़ी संस्कृति की गहरी झलक पेश करती है। इसमें विभिन्न प्रकार के अनाजों और दालों को एक साथ मिलाना विविधता और आपसी सामूहिकता का एक बहुत बड़ा प्रतीक माना जाता है। पुराने समय के समाज में खेतों से मिलने वाले पहले अनाज को देवी-देवताओं को समर्पित करने और फिर उसे प्रसाद के रूप में स्वीकार करने की परंपरा चली आ रही है। आज के आधुनिक दौर में भी कुमाऊं के तमाम परिवार सातू-आठूं के इस पावन अवसर पर विधि-विधान से बुरुड़ तैयार करते हैं। समय के लगातार बदलने के बाद भी यह लोक परंपरा आज की नई पीढ़ी तक सफलता से पहुंच रही है, जिसमें महिलाओं की भूमिका सबसे अहम होती है जो पारंपरिक नियमों का पालन करते हुए गौरा-महेश की पूजा संपन्न करती हैं।


















