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दिल्ली प्रदर्शन में पेलेट गन इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता यशोवर्धन आजाद की अर्जी पर केंद्र को नोटिसदिल्ली
31 जुल॰ 2026, 2:53 pm (21 घंटे पहले)· 0

दिल्ली प्रदर्शन में पेलेट गन इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता यशोवर्धन आजाद की अर्जी पर केंद्र को नोटिस

जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान पेलेट गन से घायल हुए लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक मौजूदा कानूनी प्रावधानों को चुनौती नहीं दी जाती, तब तक इन पर पूर्ण प्रतिबंध संभव नहीं है।

राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शनों के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पेलेट गन के इस्तेमाल का मुद्दा अब देश की शीर्ष अदालत पहुंच गया है। इस कार्रवाई में दो प्रदर्शनकारियों के गंभीर रूप से घायल होने के बाद नागरिक अधिकारों और कानून प्रवर्तन पद्धतियों पर सवाल खड़े हो गए हैं। भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी और खुफिया मामलों के जानकार यशोवर्धन आजाद ने दो पीड़ित प्रदर्शनकारियों के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। मामले की प्राथमिक सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस बल प्रयोग के लिए निर्धारित कानूनी नियमों को सीधे तौर पर चुनौती दिए बिना पेलेट गन के इस्तेमाल पर पूरे देश में तुरंत शत-प्रतिशत पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि किसी विशिष्ट घटना में पेलेट गन के अनियंत्रित या गैर-कानूनी इस्तेमाल का मामला सामने आता है, तो उसकी निष्पक्ष न्यायिक जांच का रास्ता खुला रहेगा।

पेलेट गन के खतरों और जंतर-मंतर घटना को लेकर याचिकाकर्ताओं की दलीलें

यशोवर्धन आजाद और उनके साथ आए दो पीड़ित प्रदर्शनकारियों की ओर से दाखिल याचिका में असैन्य प्रदर्शनों के दौरान धात्विक (मेटैलिक) पेलेट वाले हथियारों के प्रयोग को आंशिक अथवा पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की गुहार लगाई गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सुरक्षा एजेंसियां इन हथियारों को गैर-घातक या कम घातक हथियारों की श्रेणी में रखती हैं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर पास से चलाए जाने पर ये किसी भी इंसान के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। इनसे आंख, मस्तिष्क, चेहरे और शरीर के अन्य संवेदनशील अंगों को स्थायी क्षति पहुंचती है। जंतर-मंतर पर हुए हालिया वाकये का विवरण देते हुए याचिका में बताया गया कि प्रदर्शन में शामिल 19 साल के एक नौजवान की आंख में पेलेट लगने से गंभीर चोट आई है। यह घटना साबित करती है कि यह हथियार आम नागरिकों की शारीरिक अखंडता के लिए बेहद खतरनाक है और भीड़ नियंत्रण के नाम पर इसका अनिश्चित इस्तेमाल उचित नहीं ठहराया जा सकता।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की पीठ के समक्ष आर्टिकल 21 का कानूनी दायरा

मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष इस संवेदनशील मामले पर गहन बहस हुई। सुनवाई में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कानूनी बारीकियों को रेखांकित करते हुए कहा कि केवल पेलेट गन पर रोक की मांग करने से प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बदल सकती। अगर याचिकाकर्ता यह चाहते हैं कि सुरक्षा बल पेलेट गन का प्रयोग पूरी तरह बंद करें, तो उन्हें उन वैधानिक नियमों व नियमों की धाराओं को चुनौती देनी होगी जो असाधारण स्थितियों में पुलिस को चरणबद्ध बल प्रयोग की अनुमति देते हैं। जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि यदि कोई सरकारी नियम या पुलिस गाइडलाइन आपात स्थिति में पेलेट गन चलाने की अनुमति देती है, तो याचिकाकर्ताओं को पहले यह साबित करना होगा कि वह नियम संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन करता है। जब तक उस कानूनी आधार को अमान्य नहीं ठहराया जाता, तब तक कार्यकारी अधिकारियों के प्रशासनिक अधिकारों को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता।

केंद्र सरकार और रैपिड एक्शन फोर्स को नोटिस, साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का आदेश

शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के पुलिस महानिरीक्षक को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम अंतरिम निर्देश जारी करते हुए कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी प्रदर्शन के दौरान आरएएफ द्वारा उपयोग किए गए सभी एम्युनिशन और कारतूसों का पूरा रिकॉर्ड पूरी तरह सुरक्षित रखा जाए। अदालत के इस निर्देश का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यदि आगे इस मामले में न्यायिक जांच या फोरेंसिक विश्लेषण की आवश्यकता पड़ती है, तो साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके। इस कदम से घटना में शामिल बल प्रयोग की आनुपातिकता की पड़ताल करने में मदद मिलेगी।

संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देशों का हवाला और अंतरराष्ट्रीय मानक

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने शीर्ष अदालत के सामने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों और संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देशों को भी प्रस्तुत किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के कानून प्रवर्तन में कम घातक हथियारों से संबंधित मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए मेटैलिक पेलेट गन के इस्तेमाल पर कड़े परहेज की सलाह दी गई है। याचिका में कहा गया कि भारतीय पुलिस व्यवस्था द्वारा पेलेट गन का यह प्रयोग संवैधानिक सिद्धांतों—आवश्यकता, आनुपातिकता और तर्कसंगतता—की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। जब तक सुरक्षा बलों के सामने जीवन का सीधा खतरा न हो, तब तक ऐसे आक्रामक और स्थायी क्षति पहुंचाने वाले हथियारों का प्रयोग नहीं होना चाहिए।

सुरक्षा बलों के पास चरणबद्ध विकल्प की आवश्यकता पर अदालत का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुरक्षा एजेंसियों की व्यावहारिक चुनौतियों पर भी ध्यान केंद्रित किया। अदालत ने माना कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल के पास अलग-अलग स्तर पर प्रतिक्रिया देने के अधिकार होने चाहिए। जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि कई बार शुरुआत में शांतिपूर्ण दिखने वाला प्रदर्शन एकाएक हिंसक हो जाता है या उपद्रवी तत्व उसमें शामिल होकर स्थिति को बेकाबू कर देते हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के हाथ पूरी तरह नहीं बांधे जा सकते। हालांकि, अदालत ने पुनरावृत्ति करते हुए कहा कि यदि कहीं भी स्थापित नियमों से परे जाकर पेलेट गन का अत्यधिक या गलत प्रयोग हुआ है, तो न्यायपालिका व्यक्तिगत मामलों में सख्त कार्रवाई और जांच करने के लिए हमेशा तत्पर है।

कौन हैं यशोवर्धन आजाद: पूर्व आईपीएस अधिकारी का करियर और सामाजिक योगदान

इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने वाले यशोवर्धन आजाद देश के एक बेहद सम्मानित पूर्व प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी हैं। भारतीय पुलिस सेवा के सदस्य के रूप में उन्होंने अपने लंबे और बेदाग करियर के दौरान कई अति-संवेदनशील पदों पर सेवाएं दी हैं। देश की प्रीमियर आंतरिक खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) में उन्होंने कई वर्षों तक महत्वपूर्ण अभियानों का नेतृत्व किया और स्पेशल डायरेक्टर के उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए। अपनी सरकारी सेवा पूरी करने के बाद भी यशोवर्धन आजाद सार्वजनिक नीतियों, नागरिक स्वतंत्रता, पारदर्शी शासन और पुलिस सुधारों के मुद्दों पर लगातार मुखर रहे हैं। वे मानवाधिकारों के संरक्षण और पुलिस प्रणाली को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने के पक्षधर माने जाते हैं। इसी सामाजिक और संवैधानिक प्रतिबद्धता के तहत उन्होंने आम नागरिकों के जीवन की सुरक्षा के लिए पेलेट गन के नियमन का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाया है।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट में पेलेट गन के खिलाफ याचिका किसने दायर की है?
पूर्व आईपीएस अधिकारी और इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर यशोवर्धन आजाद ने दो घायल प्रदर्शनकारियों के साथ यह याचिका दायर की है।
सुप्रीम कोर्ट ने पेलेट गन पर तुरंत पूर्ण प्रतिबंध लगाने से क्यों इनकार किया?
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक असाधारण परिस्थितियों में पुलिस बल प्रयोग की अनुमति देने वाले कानूनी प्रावधानों को चुनौती नहीं दी जाती, तब तक पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
जंतर-मंतर घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश जारी किए हैं?
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और आरएएफ को नोटिस जारी किया तथा जंतर-मंतर प्रदर्शन में इस्तेमाल हुए सभी एम्युनिशन का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के किस नियम का संदर्भ दिया?
याचिकाकर्ताओं ने कानून प्रवर्तन में कम घातक हथियारों पर संयुक्त राष्ट्र के गाइडलाइंस का हवाला देते हुए आवश्यकता, आनुपातिकता और तर्कसंगतता का तर्क दिया।
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