साठ के दशक में जब भारत गंभीर खाद्य संकट और बुनियादी साक्षरता जैसी प्राथमिक चुनौतियों से जूझ रहा था, तब देश ने अंतरिक्ष विज्ञान की ओर अपने कदम बढ़ाए थे. उस दौर में प्रक्षेपण के लिए छोटे-छोटे कलपुर्जे भी विदेशी सहयोग से जुटाने पड़ते थे. आज वही भारत अपनी धरती से दुनिया के तमाम मुल्कों के उपग्रहों को व्यावसायिक स्तर पर अंतरिक्ष में भेज रहा है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ. वी. नारायणन ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली में आयोजित एक विशेष व्याख्यान के दौरान भारत के इस पूरे सफर की परतें खोलीं. ‘भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम: चुनौतियां और आगे की राह’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए भारत ने कैसे स्वदेशी ताकत खड़ी की और अब वह अपने अंतरिक्ष स्टेशन तथा चंद्र मानव मिशन की दिशा में अग्रसर है.
शुरुआती संघर्ष और थुंबा से उड़ी पहली उम्मीद
डॉ. वी. नारायणन ने देश के अंतरिक्ष सफर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को वर्ष 1962 की शुरुआत से जोड़ा. उन्होंने याद दिलाया कि उस जमाने में जब देश के सामने भोजन और आम जनजीवन की मूलभूत जरूरतें सबसे बड़ी चुनौती थीं, तब वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में भविष्य तलाशने की हिम्मत दिखाई. इसी सिलसिले में नवंबर 1963 में केरल के थुंबा तट से भारत का पहला साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपित किया गया था. उस समय रॉकेट तैयार करने के लिए आवश्यक कलपुर्जे और उपकरण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से जुटाकर एक साथ लाए गए थे. उस मामूली शुरुआत के बाद वैज्ञानिकों ने निरंतर अपनी तकनीकी महारत में इजाफा किया. आज स्थिति यह है कि उपग्रहों का डिजाइन तैयार करने, उनके निर्माण और उन्हें अंतरिक्ष में स्थापित करने में देश पूरी तरह आत्मनिर्भर है, बल्कि वैश्विक स्तर पर उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में अपनी व्यावसायिक सेवाएं भी दे रहा है.
प्रतिबंधों के दौर में क्रायोजेनिक आत्मनिर्भरता का उदय
भारत की तकनीकी यात्रा में क्रायोजेनिक प्रणोदन तकनीक का विकास एक ऐसा मोड़ था, जिसने पूरे परिदृश्य को बदल दिया. डॉ. नारायणन ने व्याख्यान में बताया कि 1990 के दशक की शुरुआत में कुछ शक्तिशाली देशों ने भारत को क्रायोजेनिक तकनीक देने से साफ मना कर दिया था. इस वैश्विक इनकार ने देश के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी बाधा खड़ी कर दी थी, लेकिन इसे एक अवसर की तरह लिया गया. उन्होंने कहा, “जब दुनिया ने हमें यह तकनीक देने से इनकार कर दिया, तो हमने इसे खुद विकसित करने का फैसला किया.” भारत ने किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपनी प्रयोगशालाओं में दिन-रात मेहनत की. डॉ. नारायणन ने गर्व के साथ बताया कि आज भारत ने पूरी तरह अपने दम पर तीन अलग-अलग क्रायोजेनिक प्रणोदन प्रणालियां सफलतापूर्वक तैयार कर ली हैं, जो देश के भारी रॉकेटों को शक्ति प्रदान कर रही हैं.
चंद्रयान-3 और अंतरिक्ष में डॉकिंग की ऐतिहासिक सफलताएं
डॉ. नारायणन ने 23 अगस्त 2023 की तारीख को भारतीय अंतरिक्ष इतिहास का स्वर्णिम पन्ना करार दिया. इसी दिन भारत के चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय इलाके के पास अपनी ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग दर्ज की थी. इस सफलता के साथ भारत चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की क्षमता प्रदर्शित करने वाला दुनिया का चौथा देश बना, जबकि चंद्रमा के दुर्गम दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के पास पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बनकर इतिहास रचा. इसके अलावा, उन्होंने भारत के हालिया अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग का उल्लेख किया. इस परीक्षण के जरिए भारत अंतरिक्ष में दो अलग-अलग यानों को आपस में जोड़ने की जटिल तकनीक हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन चुका है. उन्होंने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज और पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचने जैसी उपलब्धियों को भी भारतीय वैज्ञानिकों की अद्वितीय क्षमता का प्रमाण बताया.
गगनयान, 2035 का अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 का मून विजन
भावी योजनाओं पर बात करते हुए डॉ. नारायणन ने बताया कि भारत अब अंतरिक्ष में इंसानों की स्थायी उपस्थिति दर्ज कराने की दिशा में काम कर रहा है. गगनयान परियोजना के तहत देश अपनी पहली मानवरहित उड़ान की तैयारियों में जुटा है, जिससे इंसानों को सुरक्षित अंतरिक्ष में भेजने और वापस लाने की क्षमता को प्रमाणित किया जा सके. इसके बाद देश का बड़ा लक्ष्य भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना है. इस अंतरिक्ष स्टेशन के पहले मॉड्यूल को आधिकारिक स्वीकृति मिल चुकी है और इसे वर्ष 2028 तक अंतरिक्ष में स्थापित करने की योजना है. इसके बाद वर्ष 2035 तक स्टेशन के बाकी हिस्सों और मॉड्यूल्स को चरणबद्ध तरीके से जोड़ा जाएगा. चंद्र अन्वेषण के क्षेत्र में चंद्रयान-4 की तैयारी है, जिसका मुख्य काम चांद की सतह से मिट्टी और पत्थरों के नमूने धरती पर वापस लाना होगा. इसके बाद चंद्रयान-5 और शुक्र ग्रह के लिए प्रस्तावित मिशनों पर भी काम आगे बढ़ रहा है, जिसका अंतिम शिखर वर्ष 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को उतारना तय किया गया है.



















