पश्चिमी राजस्थान की रेतीली धरती पर स्थित रामदेवरा, जिसे रूणिचा के नाम से भी जाना जाता है, सामाजिक समरसता और अटूट जनआस्था का अनूठा केंद्र बना हुआ है। लगभग 642 वर्ष पूर्व अवतरित हुए लोकदेवता बाबा रामदेवजी के समाधि स्थल पर हर साल देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु शीश नवाने पहुंचते हैं। समाज में फैले भेदभाव, छुआछूत और ऊंच-नीच के बंधनों को तोड़कर सभी को एक समान दृष्टि से देखने का जो संदेश उन्होंने दिया था, वह आज भी इस पावन धाम की हर व्यवस्था में जीवंत दिखाई देता है।
उन्नीसवीं पीढ़ी का संरक्षण और बराबरी की परंपरा
बाबा रामदेवजी के इस पावन मंदिर के कुशल संचालन, धार्मिक मर्यादाओं के पालन और संपूर्ण देख-रेख का जिम्मा वर्तमान में उनकी 19वीं पीढ़ी पूरी निष्ठा से संभाल रही है। उनकी 19वीं पीढ़ी के महेंद्र सिंह तंवर ने बताया कि मंदिर की व्यवस्थाओं में श्रद्धालुओं की सुख-सुविधा, मर्यादा और सदियों पुरानी परंपराओं की रक्षा करना उनकी शीर्ष प्राथमिकता है। यहां आने वाले हर व्यक्ति के साथ बिना किसी जाति, वर्ग या धार्मिक पहचान के पूरी तरह एक समान व्यवहार किया जाता है। मंदिर की चौखट पर कदम रखते ही सामाजिक और बाहरी पहचान पीछे छूट जाती है और हर व्यक्ति केवल एक श्रद्धालु के रूप में बाबा के दरबार में उपस्थित होता है।
गंभीर रोगों से मुक्ति और गोदभराई की आस्था
रामदेवरा में उमड़ने वाले जनसैलाब का मुख्य आधार श्रद्धालुओं के वे अनुभव और आस्थाएं हैं, जो सदियों से इस धाम से जुड़ी हुई हैं। भारत के विभिन्न कोनों के साथ-साथ विदेशों और प्रवासी भारतीय श्रद्धालुओं के बीच भी इस दरबार की गहरी मान्यता है। श्रद्धालुओं के अनुभवों और मान्यताओं के अनुसार, यहां आने वाले लोगों के चर्मरोग पूरी तरह दूर हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त पहले और दूसरे चरण के कैंसर से पीड़ित मरीजों को भी बाबा की असीम कृपा से स्वास्थ्य लाभ और चमत्कारी सुधार मिलने की गहरी आस्था भक्तों में देखी जाती है।
संतान सुख की चाह रखने वाले निसंतान दंपत्तियों के लिए यहां गोदभराई की एक विशेष और पावन रस्म आयोजित की जाती है। जिन परिवारों में संतान का सुख नहीं होता, वे इस अनुष्ठान में पूरी श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं। श्रद्धालुओं का यह अटूट विश्वास है कि इस पावन गोदभराई के 9 महीनों के भीतर बाबा के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है, जिसके बाद कृतज्ञता प्रकट करने के लिए परिवार पुनः यहां धोक लगाने पहुंचता है।
अवतार की कथा और सामाजिक क्रांति का संकल्प
इतिहास और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाबा रामदेवजी के पिता राजा अजमल तंवर एक धर्मपरायण शासक थे। लंबे समय तक उनके कोई संतान नहीं थी, जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी माता मैणादे के साथ द्वारका जाकर भगवान श्रीकृष्ण की कठोर भक्ति की। उनकी इस अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें दो पुत्रों की प्राप्ति हुई, जिनके नाम बीरमदेव और रामदेव रखे गए। इसी पृष्ठभूमि के कारण बाबा रामदेवजी को भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात अवतार माना जाता है।
बाबा रामदेवजी का जन्म विक्रम संवत 1409 में बाड़मेर जिले के उण्डू काश्मिर में राजा अजमल जी तंवर और माता मैणादे के आंगन में हुआ था। बाल्यावस्था से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी बाबा रामदेवजी ने तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों, छुआछूत और सामाजिक गैर-बराबरी को जड़ से समाप्त करने को अपने जीवन का ध्येय बनाया। उन्होंने समाज के वंचित और उपेक्षित वर्ग को सम्मान के साथ गले लगाया। इस समानता के संकल्प को पुख्ता करते हुए उन्होंने दलित कन्या डाली बाई को अपनी बहन बनाया और समाज के सामने बराबरी का एक ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया।
हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक और पीरों के पीर
सामाजिक बंधनों से परे बाबा रामदेवजी का व्यक्तित्व सर्वधर्म सद्भाव का प्रतीक बन गया। यही वजह है कि हिंदू समुदाय उन्हें श्रद्धा से ‘बाबा रामदेव’ के रूप में पूजता है, जबकि मुस्लिम समाज उन्हें ‘रामसा पीर’ के नाम से नमन करता है। जनश्रुतियों के अनुसार, जब मक्का से पांच पीर उनकी ख्याति सुनकर उनकी परीक्षा लेने पहुंचे, तो बाबा के अलौकिक प्रभाव को देखकर वे भी नतमस्तक हो गए और उन्होंने स्वयं उन्हें ‘पीरों का पीर’ की उपाधि प्रदान की।
कमेटी का अनुशासित प्रबंधन और वीआईपी कल्चर का खात्मा
प्रतिवर्ष करोड़ों श्रद्धालुओं की आवक को सुगम और सुरक्षित बनाए रखना एक अत्यंत जटिल कार्य है, जिसे समाधि स्थल की प्रबंधन कमेटी ने कड़े अनुशासन से संभव बनाया है। समाधि स्थल परिसर में पूर्व में प्रचलित विशेष दर्शन व्यवस्था यानी वीआईपी कल्चर को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। अमीर हो या गरीब, सामान्य नागरिक हो या प्रभावशाली व्यक्ति, सभी के लिए एक समान कतार और एक जैसी व्यवस्था लागू की गई है। सभी श्रद्धालु एक ही पंक्ति में लगकर शांतिपूर्वक बाबा की पावन समाधि के दर्शन करते हैं।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम और सख्त निकासी नियम
मंदिर परिसर की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक तकनीकी निगरानी की व्यवस्था की गई है। मंदिर परिसर के भीतर 200 और परिसर के बाहरी हिस्सों में 200 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इस प्रकार कुल 400 कैमरों के माध्यम से 24 घंटे हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जाती है। इसके साथ ही भीड़ प्रबंधन को सुचारू रखने के लिए निकासी द्वार को लेकर कड़े नियम तय किए गए हैं, जिसके तहत निकास द्वार से किसी भी स्थिति में किसी भी व्यक्ति को अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती।
सालाना एक करोड़ श्रद्धालुओं की उपस्थिति और पदयात्रा
रामदेवरा में पूरे बारह महीने श्रद्धालुओं का आगमन जारी रहता है, लेकिन वार्षिक मेले के दौरान यहां की छटा देखते ही बनती है। मेले के समय प्रतिदिन 3 से 4 लाख श्रद्धालु बाबा के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। अनुमान के अनुसार, प्रत्येक वर्ष 1 करोड़ से अधिक भक्त रामदेवरा पहुंचकर समाधि के दर्शन करते हैं, अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर पुनः नतमस्तक होने आते हैं।
गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों और विदेशों से श्रद्धालु हजारों किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा करके यहां पहुंचते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में जातरू कहा जाता है। पैदल चलने वाले इन जातरुओं का उत्साह देखते ही बनता है, जो तपती धूप और कठिन रास्तों की परवाह किए बिना केवल बाबा के जयकारों के सहारे अपनी यात्रा पूरी करते हैं।
गुरु बालीनाथ और मसूरिया धाम की अनिवार्य परंपरा
बाबा रामदेवजी के आध्यात्मिक गुरु बालीनाथ जी थे। गुरु बालीनाथ जी का मुख्य धुणा पोखरण के समीप स्थित है, जबकि उनकी पावन समाधि जोधपुर की ऐतिहासिक मसूरिया पहाड़ी पर स्थित है। लोकमान्यता के अनुसार स्वयं बाबा रामदेवजी ने यह निर्देश दिया था कि जो भी श्रद्धालु रूणेचा में उनकी समाधि के दर्शन करने आएगा, उसे पहले जोधपुर में उनके गुरु की समाधि के दर्शन करने होंगे, तभी उसकी यात्रा और मनोकामना संपूर्ण मानी जाएगी।
इसी ऐतिहासिक परंपरा का पालन करते हुए आज भी देश भर से आने वाले करोड़ों श्रद्धालु पहले जोधपुर के मसूरिया धाम पहुंचकर गुरु बालीनाथ के मंदिर में शीश नवाते हैं और उसके बाद रामदेवरा के लिए प्रस्थान करते हैं। मेले के दौरान जोधपुर शहर में भी अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है, जहां समाज के सभी वर्गों के लोग इन जातरुओं की सेवा, भोजन और विश्राम की व्यवस्थाओं में पूरी आत्मीयता से जुट जाते हैं। यह तीर्थ आज भी इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची श्रद्धा के आगे जाति, वर्ग और सामाजिक भेदभाव के सारे दायरे निष्प्रभावी हो जाते हैं।


















