अदालती कार्यवाहियों में आमतौर पर तीखी बहस और गंभीर कानूनी दांव-पेंच देखने को मिलते हैं, परंतु राष्ट्रीय राजधानी स्थित दिल्ली हाईकोर्ट में एक ऐसा अनोखा वाकया सामने आया जिसने अदालत परिसर के पूरे माहौल को खुशनुमा बना दिया. एक कॉरपोरेट विवाद की सुनवाई के दौरान अदालत ने राहत मांगने आई कंपनी की गंभीर लापरवाही पर पहले भारी आर्थिक पेनल्टी लगाई, लेकिन बाद में माफी की गुहार पर ऐसा अनोखा फैसला सुनाया जिसकी चर्चा वकीलों और न्यायिक गलियारों में हर तरफ हो रही है.
चेक बाउंस विवाद में तथ्य छिपाने की कोशिश
यह पूरा कानूनी विवाद चेक बाउंस से जुड़े एक मामले से पैदा हुआ था. इस प्रकरण में इंदुस बीररा बेवरेजेज नामक फर्म ने अपने खिलाफ चल रहे चेक बाउंस केस को पूरी तरह रद्द करवाने के उद्देश्य से दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. जब मामले की कानूनी सुनवाई जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच के समक्ष शुरू हुई, तो पाया गया कि याचिकाकर्ता कंपनी ने पारदर्शी तरीका नहीं अपनाया. कंपनी ने मामले में पूर्व में आए निचली अदालत के एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश की जानकारी को जानबूझकर छिपा लिया था, जिससे अदालत के समक्ष पूरा सच नहीं आ पाया था.
जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच ने लगाया था पचास हजार रुपये का हर्जाना
न्यायालय की कार्यवाही में तथ्यों को छिपाने और अलग-अलग मंचों पर परस्पर विरोधी रुख अपनाने पर पीठ ने कड़ा ऐतराज जताया. जस्टिस सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता संस्था अदालत को गुमराह करके अपने पक्ष में अनुचित आदेश हासिल करने का प्रयास कर रही थी. न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ करने की इस प्रवृत्ति पर सख्त रुख अपनाते हुए पीठ ने कंपनी पर पचास हजार रुपये की भारी-भरकम कॉस्ट लगा दी थी. कोर्ट ने यह स्पष्ट निर्देश भी जारी किया था कि यह 50,000 रुपये की राशि दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सोशल सिक्योरिटी एंड वेलफेयर फंड में जमा कराई जानी चाहिए.
पेनल्टी माफी की अर्जी पर सामने आया अनूठा फरमान
लाखों रुपये के कारोबारी लेन-देन और पचास हजार रुपये की इस पेनल्टी के झटके के बाद कंपनी को अपनी विधिक भूल का अहसास हुआ. कंपनी ने अदालत में दोबारा दस्तक दी और लगाए गए जुर्माने को वापस लेने के लिए बाकायदा एक नई माफी याचिका दाखिल की. जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच ने मामले में कानूनी नरमी तो दिखाई, लेकिन बिना किसी सबक के राहत देने से इनकार कर दिया. पीठ ने पचास हजार रुपये के आर्थिक जुर्माने को निरस्त करने की अर्जी तो स्वीकार कर ली, परंतु इसके स्थान पर एक अनूठा आदेश पारित कर दिया.
एक सप्ताह के भीतर कर्मचारियों को खिलानी होगी चाय और समोसे
अदालत ने अपने आदेश में यह दिलचस्प शर्त रखी कि याचिकाकर्ता कंपनी के वकील को दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सभी कर्मचारियों को अपने हाथों से गरमा-गरम चाय और समोसे खिलाने होंगे. पीठ ने इस काम को पूरा करने के लिए एक हफ्ते की समयसीमा निर्धारित की और स्पष्ट किया कि कर्मचारियों का यह सत्कार तय अवधि में सुनिश्चित किया जाए. इस मानवीय और अनूठे फैसले ने यह दर्शाया कि अदालतें अनुशासन सिखाने के लिए केवल कड़े आर्थिक दंड का सहारा नहीं लेतीं, बल्कि कई बार ऐसे हल्के-फुल्के और सद्भाव भरे आदेश भी देती हैं जो माहौल को सहज बना देते हैं. अब कानूनी हलकों में इस आदेश की जमकर चर्चा हो रही है.




















