देश की सर्वोच्च अदालत में कॉकरोच जनता पार्टी के हालिया आंदोलन और उस पर हुए पुलिस एक्शन को लेकर जबरदस्त कानूनी टकराव देखने को मिला है। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए इस विरोध प्रदर्शन के बाद पैदा हुई कानूनी स्थितियों पर विचार करने के लिए शीर्ष अदालत में वकीलों की अप्रत्याशित भीड़ जुट गई। स्थिति की गंभीरता और उपस्थित वकीलों की विशाल संख्या को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर तत्काल कोर्ट रूम बदलने का निर्णय लिया गया, जिससे अदालत परिसर के भीतर गहमागहमी का माहौल और बढ़ गया।
अदालत कक्ष में वकीलों का भारी जमावड़ा और कक्ष परिवर्तन
इस बहुचर्चित मामले की प्रारंभिक सूची कोर्ट नंबर 18 के समक्ष तय की गई थी। हालांकि, जैसे ही सुनवाई का समय नजदीक आया, वहां लगभग 200 अधिवक्ताओं का विशाल समूह एकत्र हो गया। कक्ष में तिल धरने की जगह न बचने के कारण संबंधित मामले की कार्यवाही को तुरंत कोर्ट नंबर 5 में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया। नए कक्ष में भी करीब 200 विधि विशेषज्ञ बेंच के पटल पर आने की प्रतीक्षा में उपस्थित रहे, जिससे मामले की संवेदनशीलता साफ झलक रही थी।
पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ताओं की तीखी बहस
अदालत की कार्यवाही शुरू होते ही दोनों पक्षों के शीर्ष वकीलों के बीच कानूनी तर्कों की झड़ी लग गई। सरकारी रुख का प्रतिनिधित्व करने के लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारियों की एक टीम के साथ उपस्थित हुए। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की पैरवी का जिम्मा वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने संभाला, जिनके साथ गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी और वृंदा ग्रोवर जैसी वरिष्ठ कानूनी हस्तियां मौजूद रहीं।
कार्यवाही के दौरान जस्टिस बागची ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि न्यायपीठ सबसे पहले सॉलिसिटर जनरल के तर्कों का संज्ञान लेगी। उन्होंने तुषार मेहता को भरोसा दिलाया कि सरकार को अपना विस्तृत प्रत्युत्तर पेश करने के लिए समुचित अवसर और समय प्रदान किया जाएगा। इसके उपरांत ही अन्य याचिकाकर्ताओं को अपनी आपत्तियां और बिंदु रखने का मौका मिलेगा।
याचिकाओं का जाल: अवमानना से लेकर बंदी प्रत्यक्षीकरण तक
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत के समक्ष कई भिन्न-भिन्न अर्जियों का ब्योरा सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत किया। इन याचिकाओं में एम.ए. बेबी, मेनका गुरुस्वामी, मनोज झा और अमन शर्मा द्वारा दायर किए गए मामले शामिल हैं। इसके अतिरिक्त स्कोरा एसोसिएशन की तरफ से भी अधिवक्ताओं के साथ घटित कथित दुर्व्यवहार और पुलिसिया ज्यादती को चुनौती देने वाली याचिका पेश की गई।
सिब्बल ने विशेष तौर पर इस बात को रेखांकित किया कि राष्ट्रीय राजधानी के 45 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार एकाएक बंद कर दिए गए, जो शीर्ष अदालत के पूर्व दिशा-निर्देशों की स्पष्ट अवमानना का विषय बनता है। उन्होंने मनोज झा की अर्जी की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। इसके समानांतर तुषार मेहता ने स्कोरा एसोसिएशन की याचिका का ब्योरा रखा, जबकि पीठ ने संज्ञान लिया कि मेनका गुरुस्वामी की तरफ से बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस की विशेष याचिकाएं भी लगाई गई हैं। इन याचिकाओं का मुख्य आधार यह है कि आंदोलन के दौरान हिरासत में लिए गए विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और कानूनी प्रतिनिधियों को तत्काल पेश किया जाए।
पुलिस आयुक्त पर सीधे आरोप और अवमानना की मांग
कानूनी लड़ाई का एक अत्यंत संवेदनशील पहलू दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के विरुद्ध दायर की गई अवमानना याचिका है। इस अर्जी में पुलिस तंत्र पर बेहद गंभीर आरोप चस्पा किए गए हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि शनिवार को सुरक्षाकर्मियों ने शांतिपूर्ण और निहत्थे नागरिकों पर अनावश्यक बल प्रयोग किया और अदालत की स्थापित गाइडलाइंस को नजरअंदाज किया।
याचिका में दावा किया गया है कि ग्राउंड पर तैनात कई पुलिसकर्मियों ने अपनी आधिकारिक नेम प्लेट तक नहीं लगा रखी थी, जिससे उनकी शिनाख्त छिपाने का अंदेशा जताया गया। इसके अलावा, प्रदर्शन स्थल पर मौजूद महिला आंदोलनकारियों के साथ पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा अनुचित धक्का-मुक्की और दुर्व्यवहार किए जाने की बात भी अदालत के संज्ञान में लाई गई है।
हजारों हिरासतें और प्रमुख विपक्षी चेहरे
शनिवार को जंतर-मंतर पर हुए इस आंदोलन के केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग थी। इस मांग को लेकर जुटे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने सघन धरपकड़ अभियान चलाया, जिसके तहत करीब 3,000 व्यक्तियों को हिरासत में ले लिया गया। इस बड़े एक्शन की चपेट में चार पूर्व मुख्यमंत्री भी आए, जिनमें आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और वामपंथी आंदोलन के वरिष्ठ नेता पिनराई विजयन व माणिक सरकार का नाम शामिल रहा।
हालांकि इनमें से अधिकांश राजनेताओं को शनिवार देर रात तक छोड़ दिया गया था, परंतु सीजेपी के प्रमुख रणनीतिकारों अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को लंबे समय तक रोके रखा गया। यूट्यूबर ध्रुव राठी को भी पुलिस ने हिरासत में रखा था, जिन्हें शुक्रवार की देर रात रिहाई दी गई। पुलिस सूत्रों ने यह चेतावनी दी है कि यदि वे दोबारा जंतर-मंतर की दिशा में कदम बढ़ाएंगे तो उन पर पुनः कानूनी कदम उठाया जा सकता है।
बीएनएसएस के प्रावधान और नेताओं की अदालत में पेशी
हिरासत में लिए गए सीजेपी कार्यकर्ताओं पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और धारा 170 का इस्तेमाल किया गया। कानून की धारा 126 शांति व्यवस्था कायम रखने हेतु सुरक्षा मुचलके से जुड़ी है, जबकि धारा 170 किसी संज्ञेय अपराध की आशंका को रोकने के लिए एहतियातन गिरफ्तारी का अधिकार प्रदान करती है। हालांकि इन धाराओं के सटीक आधार पर विस्तृत ब्योरा स्पष्ट नहीं किया गया।
रविवार सुबह सीजेपी के तीनों प्रमुख नेताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली कैंटोनमेंट थाने ले जाकर कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया। पार्टी की कानूनी विंग की प्रमुख रत्ना सिंह ने पुष्टि की कि एसीएम कोर्ट में औपचारिक प्रक्रिया संपन्न होने के पश्चात तीनों नेताओं को अंततः रिहा कर दिया गया। रत्ना सिंह के मुताबिक, पुलिस अधिकारियों ने सुबह 9 बजे की पेशी की पूर्व सूचना दे दी थी और वकीलों की टीम पूरी प्रक्रिया के दौरान मौजूद रही।
मीडिया संगठनों की तीखी आपत्ति
प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के साथ हुए व्यवहार को लेकर देश के चार प्रमुख पत्रकार संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडियन वुमेन्स प्रेस कॉर्प्स, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई ने एक संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर विरोध दर्ज कराया।
इन संगठनों का कहना है कि पत्रकारों द्वारा वैध प्रेस पहचान पत्र दिखाए जाने के बावजूद उन्हें हिरासत में डाला गया और कथित तौर पर मानसिक व शारीरिक तनाव दिया गया। इतना ही नहीं, मौके पर रिपोर्टिंग कर रहे कुछ मीडियाकर्मियों के मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी जब्त कर लिए गए। संगठनों ने इसे स्वतंत्र प्रेस के कामकाज में सीधा दखल करार दिया है।
मुंबई में नए विरोध का बिगुल
दिल्ली में हुई धरपकड़ के विरोध में आंदोलन की आंच महाराष्ट्र तक पहुंच गई है। सीजेपी की इस मुहिम का नेतृत्व कर रहे अजिंक्य शिंदे ने मुंबई में जनप्रदर्शन का ऐलान किया। उन्होंने घोषणा की कि आंदोलनकारी शिवाजी पार्क के टी-जंक्शन पर शाम 4 बजे शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होंगे।
शिंदे ने केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि देश भर में हजारों नागरिकों को बंधक बनाकर लोकतांत्रिक आवाजों को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए और दो-टूक कहा कि नेताओं की गिरफ्तारियां सरकार की बड़ी राजनीतिक भूल साबित होंगी। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर अडिग रहने का संकल्प दोहराया।
यातायात, ट्रेनें और मेट्रो: सामान्य स्थिति की ओर कदम
आंदोलन के चलते राष्ट्रीय राजधानी की परिवहन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। शनिवार को नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों की ओर आने वाली अनेक मेल व एक्सप्रेस रेलगाड़ियां निरस्त कर दी गई थीं। यह रोक विशेष रूप से उन गाड़ियों पर लागू थी जो 9 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे के बाद रवाना हुई थीं और शनिवार सुबह 4 बजे से दोपहर 2 बजे के मध्य दिल्ली पहुंचनी थीं। खुफिया इनपुट और भारी जाम की आशंका को देखते हुए उत्तर रेलवे ने यह कदम उठाया था। हालांकि, उत्तर रेलवे ने अब यह राहत भरी सूचना दी है कि रविवार, 11 अक्टूबर से सभी रेलगाड़ियां अपने पूर्व निर्धारित समय पर सामान्य रूप से संचालित हो रही हैं।
इसी प्रकार, दिल्ली मेट्रो नेटवर्क के जिन स्टेशनों पर यात्रियों की आवाजाही प्रतिबंधित की गई थी, उनके सभी गेट अब आम जनता के लिए खोल दिए गए हैं और परिचालन पटरी पर लौट आया है। दूसरी ओर, दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने रविवार सुबह 6 बजे से ही शहर के 30 प्रमुख जंक्शनों पर संभावित डायवर्जन की चेतावनी जारी की थी। विशेष रूप से कनॉट प्लेस, जंतर-मंतर, मंडी हाउस और पटेल चौक के आसपास सतर्कता बरती जा रही है, जहां कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि किसी भी अप्रत्याशित हालात को नियंत्रित किया जा सके।




















