राष्ट्रीय राजधानी में बार-बार होने वाले विरोध प्रदर्शनों और उनसे आम लोगों को होने वाली समस्याओं पर दिल्ली हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से सीधा सवाल किया कि अगर इन प्रदर्शनों की वजह से दिल्ली में आम जनजीवन प्रभावित होता है, तो इस विरोध स्थल को बंद ही क्यों नहीं कर दिया जाता।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी और याचिका की पृष्ठभूमि
दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जंतर-मंतर पर लगातार होने वाले धरना-प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए याचिकाएं दायर की गई हैं। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में बार-बार रास्ते बंद होने से नागरिकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुविधाओं और आवाजाही के अधिकार की अनदेखी करके विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जा सकती।
आवाजाही पर असर और मेट्रो बंद होने से बढ़ी मुसीबतें
जंतर-मंतर, टॉलस्टॉय मार्ग और संसद मार्ग जैसे क्षेत्रों में प्रदर्शनकारियों के जमावड़े के कारण आसपास के रास्तों पर यातायात प्रभावित रहा है। जुलाई 2026 में प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा कारणों से दिल्ली मेट्रो स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था। मेट्रो सेवाएं प्रभावित होने के कारण यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और ऑटो चालकों ने सामान्य से चार गुना अधिक किराया वसूलना शुरू कर दिया था।
प्रदर्शन स्थल पर विवाद और पुलिस का स्पष्टीकरण
जंतर-मंतर पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर युवाओं और छात्र संगठनों का विरोध प्रदर्शन जारी रहा है। इस दौरान केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सोनम वांगचुक से जुड़ी मांगों पर धरने आयोजित किए गए। 22 जुलाई 2026 को आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने देर रात प्रदर्शनकारियों पर कड़ी कार्रवाई की आशंका जताई थी। हालांकि 30 जुलाई 2026 को दिल्ली पुलिस ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए बंद नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त प्रदर्शन के दौरान अनुचित भाषा के इस्तेमाल मामले में रुचिका सिंह ने 02 अगस्त 2026 को बिना किसी दबाव के माफी मांगी थी।



















