राष्ट्रीय राजधानी स्थित जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक मामले के विरोध में चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान हुई झड़प पर उच्चतम न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि विरोध प्रदर्शन के दौरान यदि अधिकारियों द्वारा अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया गया है, तो उसकी निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सुरक्षाकर्मियों पर हुए हमलों की सच्चाई सामने आना उतनी ही आवश्यक है।
संसद मार्च के दौरान बढ़ी तल्खी और पेलेट गन का विवाद
20 जुलाई को सीजेपी के नेतृत्व में छात्रों ने संसद भवन की ओर मार्च करने का प्रयास किया था। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तीखी झड़प देखने को मिली। आंदोलनकारियों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पेलेट गन और अत्यधिक बल का प्रयोग किया। विपक्ष ने भी इस घटना को लेकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ विरोध दर्ज कराया था। याचिकाओं के माध्यम से यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत के समक्ष पहुंचा।
कानून उल्लंघन पर शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी
मामले पर विचार करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने दोटूक टिप्पणी की। सीजेआई ने कहा, "जिसने भी ज्यादती की है और कानून अपने हाथ में लिया है, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।" अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित नियमों का पालन करने में लापरवाही हुई है, तो कानून को बिना किसी पक्षपात के अपना काम करना पड़ेगा। इसके अलावा बेंच ने सवाल उठाया कि छात्रों पर हुई कथित पुलिस बर्बरता की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच क्यों न कराई जाए।
250 पुलिसकर्मियों पर हमला और एसआईटी के गठन का सुझाव
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने घटना के दूसरे पहलू पर भी ध्यान केंद्रित किया। रिकॉर्ड के अनुसार, इस हिंसा में लगभग 250 पुलिसकर्मी भी चोटिल हुए थे। सर्वोच्च अदालत ने टिप्पणी की कि इस बात की भी गहन पड़ताल होनी चाहिए कि अधिकारियों पर हमला छात्रों की तरफ से हुआ था या फिर भीड़ में शामिल असामाजिक तत्वों ने हिंसा भड़काई थी। सभी तथ्यों को निष्पक्ष रूप से सामने लाने के लिए पीठ ने एक विशेष जांच दल (SIT) या किसी स्वतंत्र आयोग के गठन का सुझाव दिया है।
भविष्य के लिए स्पष्ट नियम बनाने पर जोर
अदालत ने माना कि इस मामले में स्वतंत्र जांच की प्राथमिक आवश्यकता प्रतीत होती है। हालांकि, जांच का उद्देश्य केवल दोषी व्यक्तियों को दंडित करना ही नहीं होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस कवायद का एक मुख्य उद्देश्य भविष्य में इस प्रकार के जन-प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक पारदर्शी और प्रभावी कार्यप्रणाली तैयार करना भी है, ताकि भविष्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान ऐसे टकराव न दोहराए जाएं।



















