महाराष्ट्र के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ चुनावों की बहाली की सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम उठाते हुए एक विशेष समिति का गठन किया है, जो परिसरों में चुनाव कराने के तौर-तरीकों का खाका तैयार करेगी। इस पहल से उन छात्रों में उम्मीद जगी है जिन्हें अपने परिसरों में लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिनिधियों को चुनने का मौका कभी नहीं मिला।
समिति का गठन और रूपरेखा
उच्च और तकनीकी शिक्षा विभाग की ओर से गठित इस बारह सदस्यीय समिति की कमान मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर सुहास पेडणेकर को सौंपी गई है। समिति को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के लिए एक महीने का समय दिया गया है। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव प्रक्रिया न केवल शांतिपूर्ण और पारदर्शी हो, बल्कि पूरी तरह समावेशी भी रहे। इसके साथ ही समिति उन उपायों पर भी मंथन करेगी जिनके जरिए शिक्षण संस्थानों को बाहरी राजनीतिक प्रभावों और व्यावसायिक दखलंदाजी से सुरक्षित रखा जा सके।
इतिहास और अतीत के सबक
महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्र संघ चुनावों का इतिहास तीन दशक से अधिक पुराना है। राज्य के परिसरों में आखिरी बार छात्रों ने वर्ष 1993 में अपने प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए मतदान किया था। इसके बाद से परिसरों में होने वाली राजनीति में हिंसा की बढ़ती घटनाओं और बाहरी राजनीतिक दलों के भारी हस्तक्षेप के चलते चुनावी प्रक्रिया पर पाबंदी लगा दी गई थी। इस फैसले के पीछे एक बड़ी वजह वर्ष 1989 की वह दुखद घटना थी जब मुंबई के एक कॉलेज के बाहर चुनाव प्रचार के दौरान एनएसयूआई छात्र नेता ओवेन डी’सूजा की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद परिसरों में धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रयोग को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जाने लगी थीं, जिसके परिणामस्वरूप महाराष्ट्र यूनिवर्सिटीज एक्ट 1994 के तहत सीधे और प्रतिस्पर्धी चुनावों पर रोक लगा दी गई।
कानूनी प्रयास और बीच में आई रुकावटें
छात्र राजनीति को दोबारा पटरी पर लाने की पहली गंभीर राजनीतिक कोशिश वर्ष 2010 के दशक में शुरू हुई। इस दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच इस संवेदनशील मुद्दे पर कई दौर की चर्चाएं हुईं और चुनाव की संभावनाओं को टटोला गया। इसके बाद वर्ष 2016 में तत्कालीन फडणवीस सरकार के कार्यकाल के दौरान महाराष्ट्र पब्लिक यूनिवर्सिटीज एक्ट के माध्यम से निर्वाचित छात्र परिषदों के गठन का रास्ता साफ किया गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्रों को अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार देना था। चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने और उसमें धन और बाहुबल के प्रभाव को रोकने के लिए लिंगदोह समिति की तमाम सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए कई कड़े सुरक्षा उपाय भी प्रस्तावित किए गए थे। इनमें उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता, न्यूनतम उपस्थिति, चुनावी खर्च की एक निश्चित सीमा, सख्त आचार संहिता और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल थे। वर्ष 2018 में इस अधिनियम के लिए विस्तृत नियमों को अंतिम रूप दिया गया और वर्ष 2019 आते-आते विश्वविद्यालयों ने चुनाव कराने की प्रशासनिक तैयारियां भी शुरू कर दी थीं।
क्यों टल गए थे वर्ष 2019 के चुनाव
वर्ष 2019 में करीब पच्चीस साल के लंबे अंतराल के बाद महाराष्ट्र के परिसरों में मतदान होने की पूरी उम्मीद बंध चुकी थी। लेकिन ठीक मतदान से कुछ समय पहले अगस्त 2019 में सरकार ने इन चुनावों को स्थगित करने का बड़ा निर्णय लिया। इसके पीछे मुख्य तर्क कानून-व्यवस्था की स्थिति और उसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ समय-सारणी का टकराव दिया गया था। इसके बाद कोरोना महामारी के लंबे दौर और राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण यह मुद्दा पृष्ठभूमि में चला गया और चुनाव दोबारा कभी निर्धारित नहीं हो सके।
हालिया छात्र आंदोलन और नए सिरे से सुगबुगाहट
वर्तमान समय में छात्र संघ चुनावों की चर्चा ऐसे वक्त में जोर पकड़ रही है जब राज्य के अलग-अलग हिस्सों में युवा विभिन्न शैक्षणिक और व्यवस्थागत मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर चुके हैं। बीते जुलाई महीने में नीट परीक्षा से जुड़े विवाद को लेकर महाराष्ट्र के कई इलाकों में छात्रों और युवाओं ने जोरदार प्रदर्शन किए थे। इसके कुछ समय बाद सितंबर महीने में आईआईटी बॉम्बे के बीस वर्षीय छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या की दुखद घटना के बाद संस्थान के परिसर में भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। छात्रों ने संस्थान की शिकायत और अनुशासन से जुड़ी कार्यप्रणाली में तत्काल बदलाव की मांग उठाई थी। हालांकि इन सभी आंदोलनों का सीधा संबंध छात्र संघ चुनावों से नहीं था, लेकिन इनसे यह साफ जरूर हो गया कि औपचारिक छात्र प्रतिनिधित्व के अभाव के बावजूद परिसरों में छात्रों की राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता कम नहीं हुई है। इसी पृष्ठभूमि में विभिन्न छात्र संगठनों ने एक बार फिर चुनाव बहाल करने की मांग को जोर-शोर से उठाया है।
समिति के सामने क्या हैं मुख्य चुनौतियां
प्रोफेसर सुहास पेडणेकर की अध्यक्षता वाली इस समिति का दायरा केवल चुनाव की तारीख तय करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे एक पूरी चुनावी व्यवस्था का ब्लूप्रिंट तैयार करना है। समिति के एजेंडे में यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि चुनाव में बाहरी राजनीतिक ताकतों का हस्तक्षेप किस प्रकार न्यूनतम किया जाए। इसके साथ ही छात्र परिषद के मिलने वाले फंड का प्रबंधन, उसका नियमित ऑडिट, चुने गए छात्र प्रतिनिधियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, नामांकन और उनकी जांच के लिए पूरी तरह डिजिटल व्यवस्था तथा शिकायतों के त्वरित निपटारे के वास्ते तकनीकी मंच विकसित करने जैसे अहम मुद्दे भी शामिल हैं। समिति में महिला छात्राओं, आरक्षित वर्गों के छात्रों के साथ-साथ एनसीसी, एनएसएस, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले विद्यार्थियों के उचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के तौर-तरीकों पर भी विचार किया जाएगा। इस उच्चस्तरीय समिति में पूर्व कुलपति, प्रति-कुलपति, कॉलेज प्राचार्य, विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी और एक अनुभवी कानून अधिकारी को शामिल किया गया है, जबकि मुंबई विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. प्रसाद करांडे इस समिति के सदस्य-सचिव की भूमिका निभा रहे हैं।
राजनीति से मुक्त कैंपस की राह
छात्र संघ चुनाव बहाल करने की पूरी प्रक्रिया के सामने सबसे बड़ा और पेचीदा सवाल यही है कि परिसरों की चुनावी राजनीति को मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के प्रभाव से किस हद तक अलग रखा जा सकेगा। लिंगदोह समिति के दिशा-निर्देशों में भी छात्र चुनावों में बाहरी राजनीति के प्रवेश को रोकने पर विशेष जोर दिया गया था, लेकिन धरातल पर इसे लागू करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। अब देखना यह होगा कि यह समिति अपनी रिपोर्ट में ऐसे कौन से प्रभावी उपाय सुझाती है जिससे छात्र राजनीति अपनी मूल भावना के साथ परिसरों में लौट सके और छात्र कल्याण के मुद्दों पर ही पूरी तरह केंद्रित रह सके।



















