भारतीय सिनेमा के इतिहास में आस्था और श्रद्धा से सराबोर कहानियों ने कई बार बॉक्स ऑफिस के पारंपरिक समीकरणों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। मौजूदा दौर में बेहद सीमित लागत में तैयार हुई फिल्म ‘हनुमान अंश’ टिकट खिड़की पर असाधारण प्रदर्शन करते हुए लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। सिनेमाई सफलता का यह दृश्य पांच दशक से भी पहले के उस अनूठे दौर की याद दिलाता है, जब ठीक 51 साल पहले वर्ष 1975 में पर्दे पर उतरी एक अन्य धार्मिक गाथा ‘जय संतोषी मां’ ने देश भर के सिनेमाघरों को भक्ति धाम में परिवर्तित कर दिया था। उस दौर में दर्शक केवल फिल्म देखने नहीं आते थे, बल्कि बड़े पर्दे के सामने अगरबत्ती और दीए जलाकर आरती उतारते, श्रद्धा भाव से पुष्प अर्पित करते और पूरे परिसर में प्रसाद का वितरण करते थे। इन दोनों कृतियों की अप्रत्याशित कामयाबी यह रेखांकित करती है कि जनमानस में गहरी बैठी आस्था जब कलात्मक अभिव्यक्ति से जुड़ती है, तो व्यावसायिक परिणाम कितने विस्मयकारी हो सकते हैं।
1975 में कम बजट की जय संतोषी मां ने रचा था इतिहास
साल 1975 में जब निर्देशक विजय शर्मा की अगुवाई और निर्माता सतराम रोहरा के संयोजन में ‘जय संतोषी मां’ बड़े पर्दे पर आई, तब किसी को इस बात का भान नहीं था कि यह साधारण लागत वाली रचना सिनेमाई इतिहास में मील का पत्थर बन जाएगी। इस पौराणिक आख्यान में अनीता गुहा, भारत भूषण, कन्नन कौशल और आशीष कुमार जैसे मंझे हुए कलाकारों ने विभिन्न भूमिकाओं को इतनी सहजता और निष्ठा से निभाया कि पर्दे पर उनके किरदार जीवंत प्रतीत होने लगे। पूरी कथा संतोषी माता की असीम अनुकंपा, उपासना के नियम और अपने आराध्य के प्रति भक्तों के अटूट समर्पण के ताने-बाने पर बुनी गई थी। हालांकि प्रदर्शन के शुरुआती दिनों में दर्शकों की तादाद सीमित रही, लेकिन धीरे-धीरे लोगों की जुबानी प्रशंसा यानी सकारात्मक प्रचार के बल पर इसने ऐसी गति पकड़ी कि सिनेमाघरों की कतारें अंतहीन होती चली गईं।
जब सिनेमाघर बन गए पूजा स्थल और बैलगाड़ियों से पहुंचे ग्रामीण
इस धार्मिक कृति की लोकप्रियता की गूंज देखते ही देखते सुदूर ग्रामीण अंचलों और कस्बों तक जा पहुंची। विशेषकर महिलाओं, माताओं और बुजुर्गों के भीतर इस फिल्म को देखने की ऐसी प्रबल लालसा जगी कि लोग पूरे के पूरे गांव से बैलगाड़ियों में सवार होकर निकटतम शहरों के टॉकीज तक पहुंचने लगे। श्रद्धा का आलम यह था कि दर्शक सिनेमा हॉल के मुख्य द्वार पर ही अपनी चप्पलें और जूते उतारकर नंगे पांव भीतर प्रवेश करते थे, मानो वे किसी पवित्र देवालय की दहलीज लांघ रहे हों। कई थियेटरों में फिल्म का प्रदर्शन शुरू होने से पहले बकायदा घंटियों की गूंज सुनाई देती, दर्शक पर्दे की तरफ फूल, अक्षत और सिक्के उछालते थे। शो की समाप्ति के उपरांत तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बाकायदा महाआरती संपन्न होती और समूचे प्रेक्षागृह में उपस्थित जनसमूह के बीच प्रसाद बांटा जाता था। सिनेमा और पूजा अनुष्ठान का ऐसा भावनात्मक संगम उस दौर से पहले कभी देखने को नहीं मिला था।
शोले जैसी महागाथा की प्रचंड आंधी में भी डटी रही संतोषी मां
इस ऐतिहासिक सफलता का सबसे विस्मयकारी पहलू यह था कि ‘जय संतोषी मां’ उसी वर्ष प्रदर्शित हुई थी, जिस वर्ष अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र के सशक्त अभिनय से सजी बहुचर्चित फिल्म ‘शोले’ सिनेमाघरों में उतरी थी। एक तरफ जहां भारी-भरकम बजट, शीर्ष सितारों और भव्य एक्शन से लैस शोले भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनकर उभरी, वहीं दूसरी तरफ बेहद विनम्र बजट वाली जय संतोषी मां ने भी उसके समानांतर अपने दर्शकों का अटूट आधार बनाए रखा। शोले की अपार लोकप्रियता के बावजूद यह धार्मिक रचना सप्ताह दर सप्ताह हाउसफुल चलती रही और बॉक्स ऑफिस पर अपनी स्वतंत्र पहचान दर्ज कराते हुए अप्रत्याशित कमाई करने में सफल रही।
51 साल बाद हनुमान अंश ने 431.85 करोड़ कमाकर किया चकित
पूरे 51 साल के लंबे अंतराल के बाद वर्ष 2026 में रिलीज हुई फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आधुनिक युग में भी सनातन आस्था और संत परंपरा पर आधारित कथानक दर्शकों को गहरे स्तर पर बांधने में सक्षम हैं। नीम करोली बाबा के प्रेरक जीवन और उनकी आध्यात्मिक चेतना पर केंद्रित इस फिल्म का निर्देशन विशाल चतुर्वेदी ने किया है। दिलचस्प बात यह है कि रिलीज के शुरुआती दो सप्ताह तक यह रचना बॉक्स ऑफिस पर कोई खास हलचल पैदा करने में नाकाम रही थी और दर्शक संख्या बेहद सामान्य थी।
शुरुआती दो हफ्तों के धीमेपन के बाद तीसरे हफ्ते से फिल्म ने अप्रत्याशित उछाल दर्ज किया और सफलता का ऐसा परचम लहराया जिसकी कल्पना स्वयं इसके निर्माताओं को भी नहीं थी। महज 2 करोड़ रुपये के सीमित बजट में निर्मित ‘हनुमान अंश’ ने दुनिया भर के सिनेमाघरों से अब तक लगभग 431.85 करोड़ रुपये से अधिक का विशाल ग्रॉस कलेक्शन दर्ज कर लिया है। फिल्म के कर्णप्रिय और भक्ति रस से ओतप्रोत गीतों ने भी आम जनमानस के बीच इसकी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। स्वयं फिल्म के रचनाकारों ने यह स्वीकार किया है कि वे भी 2 करोड़ की फिल्म से 431.85 करोड़ रुपये से ज्यादा के वैश्विक कारोबार की इतनी प्रचंड कमाई की आशा नहीं कर रहे थे।

















