अक्टूबर के महीने में टमाटर की बुवाई करने वाले किसानों के लिए नर्सरी प्रबंधन और पौधों की शुरुआती देखभाल बेहद अहम मानी जाती है। डॉ. सुषमा सरोज ने बताया है कि इस मौसम में फसल को रोगों से बचाने के लिए बुनियादी स्तर पर ही पुख्ता कदम उठाने चाहिए। शुरुआती दिनों में नर्सरी स्तर पर गलन रोग का खतरा सबसे अधिक रहता है। यह समस्या मिट्टी या बीज के जरिए फैलती है और इसके पीछे फफूंद या बैक्टीरिया मुख्य कारण बनते हैं। अंकुरण के बाद पौधों को इस सड़न से सुरक्षित रखने के लिए सही कृषि तकनीक अपनाना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
नर्सरी की ऊंचाई और जल निकासी पर विशेष ध्यान
नर्सरी तैयार करते समय खेत की सतह से लगभग 15 सेंटीमीटर ऊंचाई पर क्यारियां बनाई जानी चाहिए। डॉ. सुषमा सरोज के अनुसार, जमीन से उठी हुई नर्सरी होने से अतिरिक्त सिंचाई का पानी जड़ों के आसपास जमा नहीं होता। खेत में जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था होने से पानी के भराव की स्थिति नहीं बनती, जिससे मिट्टी में नमी अधिक होने पर पनपने वाली फफूंदी और जीवाणुओं का खतरा काफी घट जाता है। अगर क्यारियों में पानी ठहरा रहेगा तो युवा कोमल पौधे गलकर नष्ट हो सकते हैं।
बीज शोधन की सटीक मात्रा और रोपाई के नियम
टमाटर की स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार करना अनिवार्य कदम है। बीजों को फफूंदजनित संक्रमण से बचाने के लिए कैप्टान, थिराम या कार्बेन्डाजिम जैसी उपयुक्त दवाओं का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, एक किलोग्राम टमाटर के बीज के शोधन के लिए 2 से 2.5 ग्राम दवा पर्याप्त होती है। बीजों को इस दवा से अच्छी तरह उपचारित करने के बाद ही क्यारी में बोना चाहिए। जब पौधे नर्सरी में तैयार होकर मुख्य खेत में रोपाई के लायक हो जाएं, तब कतारों और पौधों के बीच पर्याप्त दूरी बनाई रखनी चाहिए ताकि हवा और धूप सही तरीके से मिल सके।
झुलसा और धब्बा रोगों की समय पर रोकथाम
फसल बढ़ने के साथ उस पर अगेती झुलसा, पिछेती झुलसा और पत्तों पर धब्बे बनने की शिकायत आ सकती है। इन फफूंदजनित विकारों से बचाव के लिए मैनकोजेब और मेटलैक्सिन का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के अनुपात में घोल बनाकर छिड़काव करना प्रभावी साबित होता है। इसके अलावा पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे उभरना और बाद में उनका दरारों में बदल जाना जीवाणु धब्बा रोग का संकेत होता है। इस जीवाणु संक्रमण से निपटने के लिए किसान संक्रमित पत्तों और प्रभावित फलों को तुरंत तोड़कर खेत से दूर ले जाकर नष्ट करें।
खेत में पानी भरने से रोकना इस रोग के फैलाव को थामने के लिए जरूरी है। पौधों पर ऊपर से पानी की बौछार करने से बचना चाहिए क्योंकि पानी की छींटों के साथ यह जीवाणु आसपास के स्वस्थ पौधों तक तेजी से पहुंचता है। संक्रमण की शुरुआती अवस्था में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.2 से 0.3 प्रतिशत की दर से छिड़कना चाहिए।
पत्ती कुंचन और सफेद मक्खी पर नियंत्रण
टमाटर की फसल में कुंचन रोग लगने पर पत्तियां ऊपर अथवा नीचे की तरफ मुड़ने लगती हैं, उनका आकार छोटा रह जाता है और वे सिकुड़ जाती हैं। इस स्थिति के चलते पौधे की सामान्य बढ़वार पूरी तरह रुक जाती है। इस रोग के प्रसार को रोकने के लिए खेत में सफेद मक्खी के प्रकोप पर लगातार नजर रखना जरूरी है, क्योंकि यही कीट इस विषाणु को फैलाता है। समय रहते जैविक दवाओं का छिड़काव कर सफेद मक्खी की आबादी को नियंत्रित किया जा सकता है। कृषि वैज्ञानिक ने सलाह दी है कि नर्सरी से लेकर मुख्य खेत तक हर चरण में पौधों का नियमित निरीक्षण करें, ताकि कोई भी लक्षण दिखते ही तुरंत उपचार हो सके।



















