बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा इन दिनों अपने अभिनय सफर और फिल्मों में लगातार मिल रहे छोटे तथा साइड रोल्स को लेकर चर्चा में बनी हुई हैं। वह जल्द ही ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स की आने वाली सीरीज ‘सफेद सागर’ में दर्शकों के सामने नजर आने वाली हैं। इस साल का उनका फिल्मी सफर काफी व्यस्त रहा है, क्योंकि वह इससे पहले ‘इक्का’ और ‘ऐल्फा’ जैसी चर्चित फिल्मों का भी हिस्सा रह चुकी हैं। आलिया भट्ट और शरवरी की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘ऐल्फा’ हो या फिर ‘इक्का’, दोनों ही प्रोजेक्ट्स में दीया मिर्जा का किरदार काफी सीमित दायरे में बंधा हुआ था। इन दोनों फिल्मों में उनकी मौजूदगी महज कुछ ही मिनटों की थी और अब आगामी सीरीज ‘सफेद सागर’ में भी उनका स्क्रीन टाइम केवल कुछ ही मिनटों का रहने वाला है।
छोटे रोल्स और स्क्रीन टाइम पर क्या बोलीं दीया मिर्जा
अपने करियर में लगातार छोटे और साइड रोल्स मिलने की बात पर अभिनेत्री ने एक इंटरव्यू के दौरान खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ किया कि वह अपने पूरे फिल्मी करियर को इस सीमित नजरिए से बिल्कुल नहीं देखती हैं। उनके अनुसार, जब भी वह किसी नए प्रोजेक्ट या भूमिका को चुनती हैं, तो उनका ध्यान इस बात पर बिल्कुल नहीं होता है कि पर्दे पर उन्हें कितने मिनट या सेकंड के लिए दिखाया जाएगा। उनके लिए मुख्य पैमाना यह होता है कि वह किरदार कितना दमदार और असरदार है। दीया मिर्जा का मानना है कि कलाकारों के लिए यह सोचना जरूरी है कि उनकी भूमिका कहानी को कितना मजबूत बनाती है और दर्शकों तक उसकी सच्चाई कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है।
किरदार की लंबाई से ज्यादा गहराई है अहम
दीया मिर्जा का यह साफ कहना है कि किसी भी भूमिका की लंबाई उनके लिए कभी भी प्राथमिक चिंता का विषय नहीं रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होता है कि कोई पात्र कथा के ताने-बाने में कितना योगदान दे रहा है। अपने अभिनय सफर और सिनेमा के बदलते दौर पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि कई बार एक छोटा-सा और संक्षिप्त किरदार भी पूरी कहानी को एक गहरी भावनात्मक और वैचारिक गहराई प्रदान कर सकता है। यदि किसी भूमिका में सच्ची भावनाएं, संवेदनशीलता और अभिनय करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश मौजूद हो, तो वह उसे स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार रहती हैं। उनके मुताबिक एक कलाकार का असली उद्देश्य सिर्फ लंबे समय तक कैमरे के सामने दिखना नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने अभिनय के जरिए पूरी कहानी को मजबूती देना होना चाहिए।
करियर की शुरुआत की गलतियों से सीखा सबक
अपने शुरुआती दौर को याद करते हुए अभिनेत्री ने खुलासा किया कि जब उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा था, तब उनकी सोच आज से काफी अलग थी। उस समय वह सिर्फ बड़े और लंबे रोल्स ही करना चाहती थीं। ‘इक्का’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकीं अभिनेत्री ने बताया कि अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने कई बेहतरीन और शानदार प्रस्ताव सिर्फ इसलिए ठुकरा दिए थे, क्योंकि उन प्रोजेक्ट्स में उनका स्क्रीन टाइम बहुत कम था। हालांकि, समय बीतने के साथ और अनुभव मिलने पर जब उन्हें इस बात का सही एहसास हुआ कि फिल्मों में प्रभाव लंबाई से नहीं बल्कि गुणवत्ता से बनता है, तब उन्होंने छोटे लेकिन अहम और प्रभावशाली किरदार निभाने की शुरुआत की।
सफलता और कहानी की संवेदनशीलता का महत्व
दीया मिर्जा ने अपने अभिनय करियर के दौरान की कई अन्य फिल्मों का हवाला देते हुए यह बात दोहराई कि उन्होंने कभी भी इस मिथक को नहीं माना कि ज्यादा स्क्रीन टाइम ही किसी किरदार की सफलता या असफलता तय करता है। उनके अनुभव के अनुसार, सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे पात्र रहे हैं जो पर्दे पर बहुत कम समय के लिए आते हैं, लेकिन दर्शकों के दिलों और दिमाग पर अपनी एक गहरी और कभी न मिटने वाली छाप छोड़ जाते हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी फिल्म या वेब सीरीज के साथ जुड़ने से पहले वह निर्देशक की दूरदर्शिता और सोच को बहुत अधिक महत्व देती हैं। जब कोई कहानी संवेदनशीलता और संतुलन के साथ पेश की जाती है, तभी वह दर्शकों के साथ एक गहरा जुड़ाव बना पाती है। यही कारण है कि वह ऐसे रचनात्मक प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनना ज्यादा पसंद करती हैं, जो केवल मनोरंजन तक सीमित न रहकर मानवीय भावनाओं और संवेदनशीलता को पूरी ईमानदारी के साथ पर्दे पर उतारते हैं।



















