फिल्म जगत के इतिहास में कई ऐसी फिल्में बनी हैं, जिनकी सफलता के किस्से आज भी सिनेप्रेमियों के बीच शौक से सुने जाते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा निर्देशक बीआर चोपड़ा की क्लासिक फिल्म साधना से जुड़ा हुआ है। इस प्रोजेक्ट में वैजयंतीमाला और सुनील दत्त ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं और यह सिनेमाघरों में 25 सप्ताह तक टिकी रही थी। फिल्म का संगीत एन दत्ता ने तैयार किया था, जबकि इसके खूबसूरत बोल प्रसिद्ध गीतकार साहिर लुधियानवी ने लिखे थे। हालांकि इस फिल्म को पर्दे पर उतारना निर्माता के लिए आसान नहीं रहा था, क्योंकि इसके निर्माण से पहले ही कई वितरकों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि वेश्यावृत्ति जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नाकाम हो चुकी हैं।
साहिर लुधियानवी का जुड़ाव और अमर गीत का निर्माण
पूर्णिमा, नर्तकी और राज नर्तकी जैसी पिछली फिल्मों के बॉक्स ऑफिस पर खराब प्रदर्शन को देखने के बाद भी बीआर चोपड़ा ने अपने फैसले से पीछे हटने से इंकार कर दिया था। जब पटकथा पर काम पूरा हो गया, तो उन्होंने साहिर लुधियानवी से इस प्रोजेक्ट के लिए गाने लिखने का आग्रह किया। जब गीतकार ने कहानी सुनी, तो वे इससे बहुत प्रभावित हुए। निर्माता ने उन्हें एक विशिष्ट दृश्य की स्थिति समझाई, जिसके जवाब में साहिर लुधियानवी ने एक ऐसा गीत सुनाया जिसे उन्होंने पहले ही लिख रखा था। उस रचना को सुनते ही बीआर चोपड़ा बेहद प्रसन्न हो गए क्योंकि उन्हें लगा कि वह कलाकृति विशेष रूप से इसी कहानी के लिए रची गई थी। इस तरह वह अमर गाना तैयार हुआ जिसके बोल औरत ने जन्म दिया मर्दों को हैं, और इसे अपनी जादुई आवाज से लता मंगेशकर ने सजाया था।
सिनेमाघरों में बुर्का पहनकर पहुंचती थीं महिलाएं
बीआर चोपड़ा ने एक इंटरव्यू के दौरान इस गाने से जुड़ा एक मार्मिक संस्मरण साझा किया था। जब यह फिल्म रिलीज हुई और इसे जनता का भारी समर्थन मिलने लगा, तब निर्माता खुद मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमाहॉल में इसे देखने पहुंचे थे। जब पर्दे पर वह प्रसिद्ध गीत चल रहा था, तब उन्होंने अपने आसपास बैठी कई ऐसी महिलाओं को देखा जो बुर्का पहने हुए थीं और जिनकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। फिल्मकार यह दृश्य देखकर हैरान रह गए थे और उन्हें लगा कि शायद यह इत्तेफाक हो सकता है। लेकिन जब उन्होंने कुछ समय बाद उसी थिएटर में दोबारा फिल्म देखने का निर्णय किया, तो उन्होंने वही नजारा फिर से अपनी आंखों से देखा।
समाज की झिझक और पर्दे पर बयां हुआ दर्द
समाज की रूढ़िवादी सोच के कारण महिलाएं इस संवेदनशील विषय पर बनी फिल्म को देखने में संकोच करती थीं, लेकिन इसके मजबूत कथानक और प्रभावशाली संगीत ने उन्हें सिनेमाघरों तक खींच लिया था। महिलाएं अपनी पहचान छुपाकर थिएटर के अंदर पहुंचती थीं और पर्दे पर गीत के बजते ही अपनी भावनाएं रोक नहीं पाती थीं। इस पूरी रचना ने उस दौर की महिलाओं के भीतर छिपे दर्द को बेहद प्रभावशाली तरीके से उजागर कर दिया था, जिसे दर्शकों से भरपूर सराहना मिली।
एक भावनात्मक और दमदार क्लाइमैक्स
इस मेलोड्रामा का अंत भी बेहद असरदार रखा गया था, जिसने देखने वालों को अंदर तक झकझोर दिया था। फिल्म की कथा के अनुसार एक महिला वेश्यावृत्ति के दलदल से निकलकर पारिवारिक जीवन में प्रवेश करती है, लेकिन कुछ ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि उसे लगने लगता है कि उसका असली स्थान वही कोठा है। जब वह वापस लौटने का मन बना लेती है, तो पर्दे पर एक ऐसा भावुक मोड़ आता है जो देखने वालों की आंखें नम कर देता है। अंत में मुख्य किरदार निभाने वाली अभिनेत्री से उसकी सास कहती है कि वह इस घर में बहू बनकर आई थी और उसे वहां से एक वेश्या के रूप में नहीं जाने दिया जाएगा। इसी मजबूत और मानवीय संदेश के साथ यह प्रस्तुति दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ने में कामयाब रही थी।


















