बॉलीवुड के जाने-माने निर्देशक सुभाष घई की फिल्मों के गीत हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं, लेकिन उनकी फिल्म कर्ज से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया संगीत जगत में खास स्थान रखता है। ऋषि कपूर अभिनीत इस फिल्म के सभी गाने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफल रहे थे। हालांकि, इसके संगीत निर्माण के दौरान एक ऐसा मोड़ आया था जब फिल्म के निर्देशक को अपने ही करीबियों की सलाह के खिलाफ जाकर संगीतकारों पर भरोसा जताना पड़ा था। इस पूरी प्रक्रिया ने आखिरकार एक ऐसा ऐतिहासिक गीत दिया जो आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर रहता है।
गौतम गोविंदा से शुरू हुआ सफर
निर्देशक सुभाष घई और संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के बीच का यह सफर गौतम गोविंदा फिल्म से परवान चढ़ा था। इस फिल्म के लोकप्रिय गीत इक ऋतु आए इक ऋतु जाए को सुनने के बाद सुभाष घई इस जोड़ी की कला के कायल हो गए थे। उसी वक्त उन्होंने मन बना लिया था कि वे भविष्य में अपनी हर आने वाली फिल्म के लिए इसी जोड़ी को संगीत की कमान सौंपेंगे। जब उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म कर्ज की रूपरेखा तैयार की, तो संगीत के लिए उनका पहला और एकमात्र विकल्प यही जोड़ी थी।
पॉप संगीत को लेकर उठी थी शंकाएं
फिल्म कर्ज की कहानी एक पॉप स्टार के इर्द-गिर्द बुनी गई थी, जिसके चलते सुभाष घई के शुभचिंतकों और करीबियों ने उनकी पसंद पर सवाल खड़े कर दिए थे। उस दौर में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को पारंपरिक और देसी धुनों के लिए जाना जाता था, जबकि आधुनिक वेस्टर्न स्टाइल और पॉप धुनों के मामले में आरडी बर्मन का नाम सबसे आगे लिया जाता था। निर्देशक के करीबी लगातार यही दबाव बना रहे थे कि इस विशेष विषय के लिए उन्हें किसी अन्य संगीतकार का रुख करना चाहिए। लोगों की इन बातों ने कुछ समय के लिए निर्देशक को असमंजस में जरूर डाल दिया था।
जब निर्देशक ने साझा की अपनी दुविधा
करीबियों के तर्कों से घिरे सुभाष घई ने बिना कोई छिपाव किए अपनी सारी चिंताएं लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के सामने खुलकर रख दीं। उन्होंने संगीतकारों को समझाया कि फिल्म की मांग एक अलग तरह के म्यूजिकल ट्रीटमेंट की है। इस पर उन दोनों ने निर्देशक से आग्रह किया कि वे पहले उन्हें पूरी पटकथा विस्तार से सुनाएं। कहानी की गहराई को समझने के बाद इस दिग्गज जोड़ी ने फिल्म की मूल आत्मा को पकड़ा और निर्देशक की उम्मीदों के बिल्कुल अनुकूल धुनें तैयार करके उनके सामने पेश कर दीं।
दर्द-ए-दिल गाने का अनोखा वेस्टर्न प्रयोग
फिल्म के मशहूर गजलनुमा गीत दर्द-ए-दिल दर्द-ए-जिगर को जब पहली बार वेस्टर्न स्टाइल में ढाला गया, तो वहां मौजूद हर शख्स दंग रह गया। सुभाष घई ने एक पुराने साक्षात्कार में इस बात का जिक्र किया था कि उस धुन के शुरुआती प्रयोग पर किसी को आसानी से विश्वास ही नहीं हो रहा था। जब दिग्गज गायक मोहम्मद रफी इस खूबसूरत गीत को अपनी आवाज देने के लिए स्टूडियो पहुंचे, तो उन्हें शुरुआत में लगा कि इसे किसी सादगी भरे और सॉफ्ट अंदाज में रिकॉर्ड किया जाएगा।
ऑर्केस्ट्रा का जादू और रफी साहब की आवाज
स्टूडियो में मौजूद भारी-भरकम ऑर्केस्ट्रा के तामझाम और संगीतकारों की अनूठी शैली को देखकर मोहम्मद रफी साहब को अहसास हो गया कि मामला कुछ अलग ही है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की विलक्षण सूझबूझ और विशाल ऑर्केस्ट्रा के समन्वय ने इस गीत को एक ऐसा स्वरूप दिया जो गायक के पूरे करियर के सबसे उत्कृष्ट गीतों में शुमार हो गया। प्रसिद्ध गीतकार आनंद बक्शी के लिखे इन शब्दों को संगीत की उस जादुई प्रस्तुति ने अमर बना दिया। इस सफलता के साथ ही उस जोड़ी ने आलोचकों को करारा जवाब देते हुए साबित कर दिया कि वे किसी भी तरह की विधा में संगीत रचने में पूरी तरह सक्षम हैं।



















