मेघालय विधानसभा के चल रहे ऑटम सेशन के दौरान राजनीतिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई, जब एक प्रमुख विपक्षी दल ने भारी-भरकम जल परियोजना को लेकर सरकार से तीखे सवाल पूछे। वॉयस ऑफ द पीपूल पार्टी के नेता आर्डेंट मिलर बसाियावमोइत ने शून्यकाल के दौरान सदन में यह मुद्दा उठाया और 850 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली न्यू शिलांग वाटर सप्लाई स्कीम फेज-2 पर स्पष्टीकरण मांगा। उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि अनुबंध को अंतिम रूप देने से पहले जनता के पैसे के उपयोग में पूरी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए।
टेंडर प्रक्रिया और वित्तीय प्रतिबद्धता पर सवाल
आर्डेंट मिलर बसाियावमोइत ने सदन को बताया कि यह मामला केवल किसी सामान्य टेंडर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राज्य के खजाने से निकलने वाली 850 करोड़ रुपये की बड़ी रकम जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार की यह स्पष्ट जिम्मेदारी बनती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि जनता के एक-एक पाई का खर्च पारदर्शी तरीके से हो और इससे नागरिकों को सीधा लाभ मिले। उनके मुताबिक, चूंकि अभी टेंडर प्रक्रिया शुरुआती चरण में है और अनुबंध को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है, इसलिए विधानसभा के पास यह उचित अवसर है कि वह वित्तीय रूप से राज्य के बंधने से पहले जरूरी उत्तर हासिल कर ले।
एकमुश्त पैकेज और स्थानीय ठेकेदारों की भागीदारी
चर्चा के दौरान इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई कि पूरी फेज-2 परियोजना को एक ही बड़े पैकेज के रूप में टेंडर के लिए जारी कर दिया गया है। नेता ने दावा किया कि सरकार ने पहले स्थानीय ठेकेदारों को आश्वासन दिया था कि कार्यों को इस तरह से एकमुश्त नहीं बांटा जाएगा। इस नई स्थिति पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यदि ऐसा कोई आश्वासन दिया गया था, तो सरकार को आज देश और सदन के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस नीति में बदलाव क्यों किया गया।
प्रतियोगिता सीमित होने की आशंका
आर्डेंट मिलर बसाियावमोइत ने तर्क दिया कि पूरे प्रोजेक्ट को 850.58 करोड़ रुपये के सिंगल पैकेज में समेटने से मेघालय के स्थानीय ठेकेदारों की राह मुश्किल हो जाएगी। कई सक्षम स्थानीय फर्मों के पास इतने बड़े पैमाने के प्रोजेक्ट के लिए जरूरी वित्तीय और तकनीकी क्षमता नहीं होती, जिससे उनकी भागीदारी सीधे तौर पर सीमित हो जाती है। उन्होंने साफ किया कि यह मांग किसी खास वर्ग को प्राथमिकता देने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि टेंडर की संरचना स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का गला न घोटे।
फेज-1 की प्रगति और बिलों का भुगतान
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने परियोजना के पहले चरण यानी फेज-1 की मौजूदा स्थिति पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने जानना चाहा कि क्या फेज-1 का काम पूरी तरह संतोषजनक ढंग से पूरा हो चुका है और क्या वह वर्तमान में तय क्षमता के अनुसार पानी की आपूर्ति कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने पूछा कि आखिर किस आधार पर 850 करोड़ रुपये के भारी बजट वाले दूसरे चरण की इतनी जल्दी जरूरत आन पड़ी और कार्यों को छोटे तथा व्यावहारिक हिस्सों में क्यों नहीं विभाजित किया गया।
राज्य की मौजूदा वित्तीय सेहत को लेकर उन्होंने जल जीवन मिशन के तहत ठेकेदारों के लंबित बिलों का भी हवाला दिया। उनके अनुसार, सरकार खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि बकाए बिल 900 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुके हैं। ऐसे में यदि राज्य पहले से ही इतने बड़े वित्तीय दबाव से जूझ रहा है, तो सरकार को यह बताना चाहिए कि वह बिना अतिरिक्त आर्थिक संकट पैदा किए 850 करोड़ रुपये की इस नई परियोजना का वित्तपोषण कैसे करेगी। अंत में उन्होंने सरकार से मांग की कि अनुबंध फाइनल होने से पहले विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, बिल ऑफ क्वांटिटीज और वित्तीय खाका सदन के पटल पर रखा जाए।





















