महाराष्ट्र की राजधानी में त्योहारों के मौसम से ठीक पहले पर्यावरण और परंपराओं को लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। हाल के दिनों में मुंबई के भीतर वायु गुणवत्ता के गंभीर स्तर पर पहुंचने के बाद प्रदूषण को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं। इसी बीच फिल्म अभिनेत्री दीया मिर्जा ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए लोगों से प्रदूषण मुक्त और पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से दीपोत्सव मनाने का आग्रह किया। अभिनेत्री की इस सार्वजनिक अपील पर मुंबई की मेयर रितु तावड़े ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए तीखा पलटवार किया है। मेयर ने इस पूरे अभियान को केवल पर्यावरण संरक्षण की सामान्य सलाह मानने से इनकार करते हुए इसे वैचारिक और हिंदुत्व विरोधी रुख से प्रेरित बताया है।
मेयर का तीखा बयान और पिछले रुख पर सवाल
मुंबई की प्रथम नागरिक रितु तावड़े ने मीडिया से संवाद करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि सनातन परंपराओं और धार्मिक पर्वों के तौर-तरीकों पर इस तरह के संदेश जारी करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं बनता। उन्होंने अभिनेत्री के सार्वजनिक जीवन और उनकी पिछली गतिविधियों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि उनके विरोध के केंद्र में हमेशा एक खास विचार ही रहा है। मेयर के मुताबिक जब भी कोई बड़ा सामाजिक या विकासात्मक विषय सामने आया है, अभिनेत्री का दृष्टिकोण एकतरफा देखने को मिला है।
मेयर रितु तावड़े ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमें दीया मिर्जा से यह सीखने की कतई जरूरत नहीं है कि दिवाली का पर्व किस तरह मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अभिनेत्री के पूरे प्रोफाइल को खंगालने पर यह स्पष्ट झलकता है कि वह नर्मदा परियोजना से लेकर समान नागरिक संहिता तक के मामलों में मुखर विरोध दर्ज कराती रही हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्यों पर भी उनकी प्रतिक्रियाएं नकारात्मक रही हैं। मेयर ने रेखांकित किया कि चाहे पर्यावरण संकट से निपटने की प्रशासनिक कोशिशें हों या व्यापक नीतिगत मुद्दे, यह रुख लगातार हिंदुत्व के विरोध की ओर ही इशारा करता है।
त्योहार मनाने के तौर-तरीकों पर दो टूक संदेश
सार्वजनिक रूप से अपनी आपत्ति को विस्तार देते हुए मेयर ने जोर देकर कहा कि हिंदू समुदाय भली-भांति जानता है कि उसे अपनी आस्था और परंपरा का निर्वहन कैसे करना है। उन्होंने कहा कि किसी भी बाहरी व्यक्ति या सेलिब्रिटी को यह निर्देश देने की पात्रता नहीं है कि त्योहार की खुशियां किस रूप में मनाई जाएं। मेयर ने नसीहत भरे लहजे में कहा कि चुनिंदा एजेंडे को लोगों पर थोपने के बजाय उसे अपने तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। प्रशासन अपनी ओर से पर्यावरण के संकट को दूर करने के लिए लगातार कार्यरत है, ऐसे में पर्व विशेष को केंद्र में रखकर नसीहतें देना अनुचित है।
सांस्कृतिक प्रतीकों पर बार-बार उठने वाला टकराव
दीपावली के आगमन के साथ ही पटाखों के उपयोग और वायु गुणवत्ता की स्थिति पर सेलिब्रिटीज और सामाजिक कार्यकर्ताओं के संदेशों के बाद इस प्रकार का वैचारिक मतभेद कोई नया नहीं है। पर्यावरण के प्रति सजग रहने वाले लोग और कला जगत के प्रतिनिधि अक्सर प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करने के उद्देश्य से पटाखों का कम इस्तेमाल करने की अपील करते हैं। उनका मुख्य तर्क महानगरों में गिरती हवा की गुणवत्ता को सुधारना और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना होता है।
इसके विपरीत, पारंपरिक सोच के संगठनों और राजनीतिक प्रतिनिधियों का मानना है कि इस प्रकार के जागरूकता अभियानों का दायरा बेहद संकुचित और एकतरफा रहता है। उनकी दलील रहती है कि पर्यावरण का हवाला केवल हिंदू त्योहारों के समय ही प्रमुखता से दिया जाता है, जबकि अन्य अवसरों पर ऐसे संदेश पूरी तरह नदारद रहते हैं। मुंबई की मेयर की यह तल्ख टिप्पणी इसी वैचारिक अंतर को सतह पर ले आई है। इससे यह साफ दिखता है कि सांस्कृतिक पहचान, त्योहारों के तौर-तरीकों और सार्वजनिक सलाह के बीच वैचारिक लकीरें अब बेहद गहरी हो चुकी हैं, जिसकी गूंज आने वाले समय में अन्य राजनीतिक मंचों पर भी सुनाई दे सकती है।



















