मेघालय में साल 2008 के दौरान लोअर प्राइमरी स्कूल शिक्षकों की बहाली में सामने आई कथित गड़बड़ी को लेकर कानूनी लड़ाई अब देश की शीर्ष अदालत पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय की पूर्व शिक्षा मंत्री अंपारीन लिंगदोह के साथ राज्य शिक्षा विभाग के दो सेवानिवृत्त उच्च अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। यह कदम केंद्रीय जांच ब्यूरो की उस विशेष अनुमति याचिका पर उठाया गया है, जिसमें मेघालय हाईकोर्ट के आपराधिक मामले को खारिज करने के फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने पहले इस मामले में चल रहे मुकदमे को पूरी तरह खत्म कर दिया था, जिसे अब केंद्रीय जांच एजेंसी ने शीर्ष अदालत में चुनौती दी है।
शीर्ष अदालत द्वारा जारी किए गए नोटिसों के दायरे में पूर्व शिक्षा मंत्री के अलावा प्राथमिक एवं जन शिक्षा के पूर्व निदेशक जे.डी. संगमा तथा विभाग की पूर्व उपनिदेशक अमेका आई. लिंगदोह शामिल हैं। इन तीनों लोगों के खिलाफ इस भर्ती प्रक्रिया में गंभीर आपराधिक साजिश और अंकों की हेराफेरी के आरोप लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष केंद्रीय जांच एजेंसी ने दलील दी कि जिस मामले की तहकीकात खुद अदालती आदेशों के तहत कराई गई थी, उसकी पूरी सुनवाई को बीच में ही निरस्त कर देने का निर्णय कानूनी मानकों पर उचित नहीं ठहरता।
हाईकोर्ट के फैसले पर केंद्रीय एजेंसी के प्रमुख सवाल
केंद्रीय जांच एजेंसी ने अपनी याचिका में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया है कि मेघालय हाईकोर्ट ने निचली अदालत के पूरे मूल रिकॉर्ड को तलब किए बिना ही एफआईआर और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। जांच एजेंसी के अनुसार किसी भी आपराधिक मामले में कार्यवाही खत्म करने से पहले ट्रायल कोर्ट के सामने पेश किए गए दस्तावेजों और साक्ष्यों का परीक्षण किया जाना बेहद जरूरी होता है, लेकिन इस प्रक्रिया की अनदेखी की गई।
इसके साथ ही याचिका में यह भी उठाया गया है कि हाईकोर्ट ने मुकदमे को पूरी तरह खत्म करने की जगह दूसरे विकल्पों पर गौर नहीं किया। उदाहरण के लिए अदालत निचली अदालत को सुनवाई तेज करने का निर्देश दे सकती थी या फिर मुख्य साक्ष्यों को प्रभावित किए बिना गवाहों की संख्या को सीमित करने का आदेश दे सकती थी। अचानक पूरी न्यायिक प्रक्रिया को समाप्त कर देने से जांच के जरिए जुटाए गए साक्ष्यों का न्यायिक मूल्यांकन नहीं हो सका।
हाईकोर्ट की एकल पीठ का रुख और डिस्चार्ज का आधार
यह पूरा कानूनी विवाद उस समय नए सिरे से गर्मा गया था जब मेघालय हाईकोर्ट की एकल पीठ, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आई.पी. मुखर्जी कर रहे थे, ने अपने सेवानिवृत्त होने से ठीक पहले तीनों आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक प्रक्रिया को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई ठोस आपराधिक मामला साबित करने में असमर्थ रहा है।
अदालत ने सुनवाई की अत्यधिक धीमी गति और लंबी अवधि को लेकर भी गहरी चिंता जाहिर की थी। एकल पीठ ने टिप्पणी की थी कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की लंबी सूची को देखते हुए यदि सभी गवाहों के बयान दर्ज कराए जाते, तो इसमें आरोपियों का शेष जीवनकाल बीत सकता था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 227 और धारा 482 के तहत अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुए विशेष सीबीआई न्यायाधीश द्वारा 23 अगस्त 2022 को दिए गए उस आदेश को पलट दिया था, जिसमें आरोपियों की उन्मोचन याचिका खारिज कर दी गई थी, और तीनों को मामले से बरी कर दिया था।
सफेद स्याही और अंकों में हेराफेरी के आरोप
केंद्रीय जांच एजेंसी ने हाईकोर्ट के इस तर्क का पुरजोर विरोध किया है और कहा है कि उसकी चार्जशीट पूरी जांच और ठोस वैज्ञानिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित थी। जांच के दौरान यह पाया गया था कि उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया में मनपसंद आवेदकों को लाभ पहुंचाने के लिए स्कोर शीट में पहले से दर्ज अंकों पर सफेद स्याही लगाकर नए अंक दर्ज किए गए थे। एजेंसी का कहना है कि यह सीधी धांधली और रिकॉर्ड में हेरफेर का मामला था।
जांच एजेंसी ने शीर्ष अदालत को यह भी अवगत कराया कि सीबीआई की विशेष अदालत ने साल 2022 में तीनों आरोपियों की डिस्चार्ज याचिकाओं को विस्तृत सुनवाई के बाद खारिज कर दिया था। उस समय विशेष अदालत ने माना था कि प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। जब निचली अदालत में नियमित ट्रायल शुरू हो चुका था और गवाहों के बयान दर्ज किए जा रहे थे, तभी हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप कर पूरी कार्यवाही पर रोक लगा दी और उसे निरस्त कर दिया।
शिलांग से तुरा तक फैली शिक्षक भर्ती धांधली का पूरा घटनाक्रम
यह समूचा प्रकरण वर्ष 2008 में मेघालय के विभिन्न शिक्षा केंद्रों में लोअर प्राइमरी स्कूल सहायक शिक्षकों की नियुक्ति से जुड़ा हुआ है। इस भर्ती अभियान का संचालन शिलांग, जोवाई, अमलारेम, तुरा और दादेंग्रे में किया गया था। पूरी चयन प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर मनमाने तरीके से अंक बदलने और चहेते उम्मीदवारों को मेरिट लिस्ट में ऊपर लाने के गंभीर आरोप लगे थे। जांच का मुख्य केंद्र यह था कि किस तरह पात्र उम्मीदवारों को बाहर कर दूसरों को गलत ढंग से लाभ पहुंचाया गया।
इस मामले में पहली आधिकारिक एफआईआर वर्ष 2011 में दर्ज की गई थी। शुरुआत में इस मामले की जांच राज्य पुलिस द्वारा की जा रही थी, लेकिन आरोपों की गंभीरता और व्यापकता को देखते हुए जांच का जिम्मा केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया गया था। केंद्रीय एजेंसी ने वर्ष 2018 में औपचारिक मामला दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू की और जून 2020 में अपनी चार्जशीट दाखिल की।
आईपीसी की गंभीर धाराएं और गवाहों का गणित
केंद्रीय एजेंसी द्वारा दाखिल चार्जशीट में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र), धारा 420 (धोखाधड़ी), धारा 467, 468 एवं 471 (जालसाजी से संबंधित अपराध) तथा धारा 201 (सबूत मिटाना) के तहत आरोप तय किए गए थे। शिक्षक चयन प्रक्रिया में 500 से अधिक उम्मीदवार शामिल हुए थे, जिनमें से व्यापक जांच के बाद 246 उम्मीदवारों की उम्मीदवारी को दागी करार देते हुए रद्द कर दिया गया था।
मुकदमे की शुरुआत में अभियोजन पक्ष ने अपनी गवाह सूची में 300 से अधिक गवाहों के नाम शामिल किए थे, जिसे बाद में घटाकर 181 कर दिया गया था। जब हाईकोर्ट ने पूरी कार्यवाही को रद्द किया, तब तक ट्रायल कोर्ट के समक्ष केवल 28 गवाहों के बयान ही दर्ज हो पाए थे। आरोपियों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और के. पॉल ने पैरवी की थी और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न पुराने फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि अभियोजन पक्ष की सामग्री में उनके मुवक्किलों की संलिप्तता का कोई प्रत्यक्ष लिंक नहीं मिलता है। हाईकोर्ट ने उनके तर्कों को स्वीकार करते हुए आरोपियों को मुक्त कर दिया था, जिसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इस मामले में नए सिरे से न्यायिक समीक्षा शुरू हो गई है।
























