राजस्थान कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल और उनके परिजनों द्वारा अलवर जिले के अजबगढ़ में स्थित अनंता रिसॉर्ट परिसर में 20 विला खरीदे जाने का मामला इस समय प्रशासनिक और सार्वजनिक हलकों में खासी चर्चा बटोर रहा है। सरिस्का टाइगर रिजर्व की संकरी सीमाओं से सटे इस लग्जरी रिसॉर्ट की जमीन और निर्माण कार्य पहले भी विवादों के घेरे में रहे हैं। रिसॉर्ट के विकास, जमीन के उपयोग, प्राकृतिक जलधाराओं की स्थिति और भूजल दोहन को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी में बकायदा याचिका दायर कर कानूनी सवाल खड़े किए गए थे। वर्तमान में जब इस परिसर में निजी संपत्तियों की बड़ी खरीद को लेकर विवाद गहराया है, तब इस रिसॉर्ट से जुड़ी पर्यावरणीय जांच और ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड्स पर नए सिरे से रोशनी पड़ रही है।
हेमराज मीणा की याचिका में उठाए गए थे गंभीर पर्यावरणीय सवाल
अलवर के अजबगढ़ स्थित इस रिसॉर्ट के खिलाफ पर्यावरण नियमों के उल्लंघन की शिकायत करते हुए हेमराज मीणा ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था। इस याचिका में स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया गया था कि वन्यजीवों के संवेदनशील पर्यावास यानी सरिस्का टाइगर रिजर्व के बेहद करीब होने के बावजूद रिसॉर्ट निर्माण के लिए जरूरी पर्यावरणीय स्वीकृतियां हासिल नहीं की गईं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि परिसर में नियमों को ताक पर रखकर अंधाधुंध भूजल खींचा जा रहा है और राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज गैर मुमकिन नाले की सरकारी व प्राकृतिक जमीन पर अतिक्रमण कर अवैध निर्माण खड़ा किया गया है।
शिकायतकर्ता की प्राथमिक चिंता यह थी कि टाइगर रिजर्व के इकोलॉजिकल रूप से संवेदनशील क्षेत्र के निकट चल रही इतनी विशालकाय व्यावसायिक गतिविधियां वन्यजीवों और स्थानीय जल स्रोतों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। याचिका में रिसॉर्ट के कुल निर्मित क्षेत्रफल, बोरवेल के जरिए हो रहे पानी के दोहन और प्राकृतिक नाले के प्रवाह क्षेत्र में किए गए कथित निर्माण की स्वतंत्र जांच कराने की गुहार लगाई गई थी। इन आरोपों की संवेदनशीलता को देखते हुए एनजीटी ने मामले में सीधे दखल दिया और धरातल पर वास्तविक स्थिति की पड़ताल के लिए एक विशेष संयुक्त समिति का गठन करने का आदेश जारी किया।
संयुक्त समिति का निरीक्षण: 144 कमरों का ढांचा और क्षेत्रफल का गणित
एनजीटी के कड़े निर्देशों के बाद गठित संयुक्त जांच समिति ने अजबगढ़ पहुंचकर अनंता रिसॉर्ट का सघन स्थलीय निरीक्षण किया। समिति द्वारा मौके पर की गई पैमाइश और प्रशासनिक रिकॉर्ड्स की छानबीन में पाया गया कि रिसॉर्ट परिसर में कुल 144 कमरे बने हुए हैं। इसके साथ ही समिति ने अपनी आधिकारिक गणना में यह स्पष्ट किया कि रिसॉर्ट का कुल निर्मित क्षेत्रफल 19,377.91 वर्ग मीटर है।
जांच समिति की रिपोर्ट में पर्यावरणीय स्वीकृति के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू उजागर हुआ। नियमों के मुताबिक, किसी निर्माण परियोजना के लिए पर्यावरण स्वीकृति हासिल करने की वैधानिक बाध्यता तब लागू होती है जब कुल निर्मित क्षेत्र 20,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक हो। चूंकि अनंता रिसॉर्ट का निर्मित क्षेत्रफल 19,377.91 वर्ग मीटर आंका गया, जो निर्धारित 20 हजार वर्ग मीटर की लक्ष्मण रेखा से कम था, इसलिए समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि मौजूदा ढांचे के लिए अलग से पर्यावरणीय स्वीकृति लेना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं था। इस तकनीकी आधार पर बिना अनुमति निर्माण के आरोप का निस्तारण हुआ।
भूजल दोहन पर 1.44 करोड़ का हर्जाना और वर्तमान अनुमतियां
याचिका में भूमिगत जल के अनियंत्रित और गैरकानूनी दोहन का मसला भी प्रमुखता से उठाया गया था। संयुक्त समिति ने जब रिसॉर्ट के जल स्रोतों और प्रशासनिक मंजूरियों की जांच की, तो सामने आया कि रिसॉर्ट प्रबंधन के पास राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल की वैध संचालन सहमति मौजूद थी। इसके अलावा परिसर में वर्तमान समय में चार बोरवेल के जरिए सीमित भूजल निकालने की विधिवत प्रशासनिक अनुमति भी दस्तावेजों में दर्ज पाई गई।
हालांकि, जांच समिति की रिपोर्ट में यह तथ्य भी दर्ज हुआ कि पूर्व में रिसॉर्ट प्रबंधन ने बिना वैध अनुमति के भूजल का दोहन किया था। इस पुराने गैरकानूनी दोहन के एवज में रिसॉर्ट प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई थी और उससे करीब 1.44 करोड़ रुपये का भारी भरकम पर्यावरणीय मुआवजा और विनियामक शुल्क सरकारी खजाने में जमा कराया जा चुका था। इस तरह जांच रिपोर्ट ने साफ किया कि यद्यपि पूर्व में भूजल नियमों की अनदेखी हुई थी, लेकिन उस पर नियमानुसार पेनल्टी वसूली जा चुकी थी और वर्तमान में आवश्यक अनुमतियां ली जा चुकी थीं।
प्राकृतिक नाले पर अतिक्रमण के आरोपों की वस्तुस्थिति
शिकायतकर्ता हेमराज मीणा द्वारा अपनी याचिका में गैर मुमकिन नाले की जमीन पर अवैध कब्जे का मुद्दा बेहद जोर-शोर से उठाया गया था। अरावली की तलहटियों में प्राकृतिक नालों का विशेष पारिस्थितिक महत्व होता है क्योंकि वे बारिश के पानी के प्राकृतिक बहाव और भूजल पुनर्भरण का मुख्य जरिया होते हैं। संयुक्त समिति ने मौके पर राजस्व नक्शों और धरातलीय स्थिति का मिलान करते हुए इस बिंदु की बारीकी से जांच की।
समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि नाले की जमीन पर किसी भी तरह के पक्के या स्थायी निर्माण के भौतिक प्रमाण नहीं मिले हैं। इसके साथ ही जांच दल को ऐसे कोई पुख्ता सबूत भी नहीं मिले जिससे यह साबित हो सके कि रिसॉर्ट प्रबंधन द्वारा प्राकृतिक जलस्रोतों अथवा नाले के पानी का कोई प्रत्यक्ष व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा था। इस निष्कर्ष के साथ नाले की जमीन पर अतिक्रमण संबंधी शिकायत पर समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्थिति स्पष्ट कर दी।
16 अक्टूबर 2026 को याचिका का निपटारा, मगर विला खरीद पर सवाल बरकरार
संयुक्त समिति द्वारा सौंपे गए विस्तृत तकनीकी निष्कर्षों और जांच रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 16 अक्टूबर 2026 को इस याचिका का औपचारिक निस्तारण कर दिया। समिति के तथ्यों को स्वीकार करते हुए ट्रिब्यूनल ने इस विशिष्ट पर्यावरणीय वाद की न्यायिक सुनवाई समाप्त कर दी।
कानूनी और प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि इस पूरे मामले में तथ्यों का स्पष्ट विभाजन समझना आवश्यक है। एनजीटी द्वारा 16 अक्टूबर 2026 को दिया गया आदेश केवल और केवल अनंता रिसॉर्ट के पर्यावरणीय मानकों, बोरवेल, निर्मित क्षेत्रफल और जमीन संबंधी पुरानी याचिका के संदर्भ में था। ट्रिब्यूनल के इस तकनीकी निस्तारण का आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल अथवा उनके परिवार द्वारा उसी परिसर में 20 विला खरीदे जाने के हालिया विवाद या उसकी वित्तीय वैधता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, और न ही इसे विला खरीद प्रकरण में किसी भी तरह की क्लीन चिट के रूप में देखा जा सकता है।

















