दक्षिण भारतीय सिनेमा के चर्चित कलाकारों विजय देवरकोंडा और उनकी पत्नी रश्मिका मंदाना की बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली एक्शन ड्रामा फिल्म 'रणबाली' 16 अक्टूबर 2026 को पूरे देश के सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। इस बड़े बजट के प्रोजेक्ट से दर्शकों और व्यापार विश्लेषकों को बेहद जोरदार शुरुआत की उम्मीद थी, लेकिन शुरुआती टिकट खिड़की के आंकड़ों से पता चलता है कि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षाकृत धीमी शुरुआत दर्ज की है। पूरे भारत में 1,300 से अधिक सिनेमाई पर्दों पर उतारे जाने के बावजूद, शुरुआती दिन का व्यापार अनुमानों की तुलना में काफी शांत रहा है।
शुरुआती प्रतिक्रियाओं में फिल्म प्रेमियों और समीक्षकों ने दोनों मुख्य कलाकारों के अभिनय समर्पण की खुलकर सराहना की है। विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना के बीच के दृश्यों को फिल्म का सबसे प्रभावी पक्ष माना जा रहा है। इसके विपरीत, कहानी की सुस्त रफ्तार, लंबी अवधि, औसत एक्शन दृश्य और कमजोर पार्श्व संगीत को लेकर दर्शकों के एक बड़े वर्ग ने निराशा भी जाहिर की है।
शुरुआती दिन के टिकट खिड़की के आंकड़े और क्षेत्रीय प्रदर्शन
प्रदर्शन के पहले दिन के आंकड़ों के अनुसार, 'रणबाली' देश भर के 1,392 सिनेमाई शो में दिखाई जा रही है। शुक्रवार के शुरुआती दौर में इस फिल्म ने पूरे देश से कुल 3.87 करोड़ रुपये का शुद्ध संग्रह दर्ज किया है। यह संपूर्ण शुद्ध संग्रह मुख्य रूप से तेलुगु संस्करण के 1,387 शो से निकलकर आया है। यदि सभी करों और अतिरिक्त शुल्कों को मिलाकर देशव्यापी ग्रॉस संग्रह की बात करें, तो यह आंकड़ा लगभग 4.57 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया है।
शुरुआती दिन के पूरे आंकड़े संकलित होने के बाद शुक्रवार देर रात तक अंतिम व्यापारिक रिपोर्ट सामने आएगी। अब तक फिल्म के हिंदी और तमिल डब संस्करणों के शुद्ध कारोबार का अंतिम विवरण सामने आना बाकी है। सिनेमा हॉलों में दर्शकों की मौजूदगी यानी ऑक्यूपेंसी के लिहाज से विभिन्न भाषाओं में भारी विषमता देखने को मिली है। तेलुगु शो में दर्शकों का रुख सबसे मजबूत रहा, जहां सिनेमाघरों में 52 प्रतिशत सीटें भरी रहीं। इसके बाद तमिल संस्करण में 36 प्रतिशत ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई। हालांकि, उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्र में फिल्म दर्शकों को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने में नाकाम रही है, जहां ऑक्यूपेंसी मात्र 8 प्रतिशत के बेहद निचले स्तर पर सिमट गई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अकाल के दौर का कथानक
फिल्म का निर्देशन राहुल सांकृत्यायन ने किया है, जबकि इसकी पटकथा और संवाद राहुल सांकृत्यायन तथा प्रमोद तम्मिननेनी द्वारा संयुक्त रूप से लिखे गए हैं। यह कहानी 1870 के दशक के दक्षिण भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान फैले भीषण अकाल के दौर पर आधारित है। मुख्य नायक रणबाली एक विद्रोही योद्धा है, जो अपने क्षेत्र और भुखमरी से जूझते आम लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक क्रूर ब्रिटिश कमिश्नर से सीधा लोहा लेता है।
कलाकारों की बात करें तो विजय देवरकोंडा ने मुख्य विद्रोही योद्धा रणबाली की भूमिका निभाई है, जबकि रश्मिका मंदाना ने जयम्मा का किरदार निभाया है। ब्रिटिश अधिकारियों के रूप में विदेशी कलाकारों को शामिल किया गया है, जिसमें अर्नोल्ड वोस्लू ने सर थियोडोर हेक्टर और ल्यूक मैकगिबनी ने रॉबर्ट मुल्थस का किरदार अदा किया है। दक्षिण भारत के सूखे और भुखमरी के दर्दनाक इतिहास को मुख्यधारा के सिनेमा में एक नए नजरिए से पेश करने का ईमानदार प्रयास किया गया है।
फिल्म का तकनीकी पक्ष और पटकथा की समीक्षा
सिनेमा विशेषज्ञों का मानना है कि 'रणबाली' एक गंभीर और ईमानदार कोशिश है, लेकिन इसका कुल प्रभाव सीमित रह जाता है। 1870 के अकाल की पृष्ठभूमि एक नया और अनछुआ विषय है, और फिल्म का पहला हिस्सा दर्शकों को बांधने में काफी हद तक सफल रहता है। हालांकि, मध्यांतर के बाद दूसरे हिस्से में कहानी अपनी पकड़ खो देती है और एक अनुमानित ढर्रे पर चलने लगती है। अनावश्यक रूप से लंबी अवधि और पटकथा के कुछ कमजोर फैसले इसे अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने से रोकते हैं। विजय देवरकोंडा का अभिनय खरा और निष्ठावान है, लेकिन फिल्म समग्र रूप से उस ऊंचाई को नहीं छू पाती जिसकी उम्मीद थी।
सोशल मीडिया मंच एक्स पर फिल्म के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण सामने आया है। वहां साझा किए गए एक दृष्टिकोण के अनुसार, ब्रिटिश हुकूमत की पुरानी पड़ चुकी पृष्ठभूमि में निर्देशक ने वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं को ईमानदारी से पिरोने की कोशिश की है, लेकिन बेहद सुस्त स्क्रीनप्ले और सपाट प्रस्तुति दर्शकों के धैर्य की कड़ी परीक्षा लेती है। इस समीक्षा के अनुसार, विजय और रश्मिका के दृश्य फिल्म की सबसे बड़ी जान हैं, लेकिन इस तरह के संवेदनशील विषय के लिए जिस गहरे भावनात्मक जुड़ाव की दरकार थी, वह लंबे हिस्सों में नदारद दिखता है।
प्रोडक्शन डिजाइन की तारीफ, संगीत पर निराशा
तकनीकी मोर्चे पर फिल्म के सेट निर्माण, सिंगनामाला गांव की संरचना और भव्य प्रोडक्शन डिजाइन की व्यापक प्रशंसा हुई है। 1870 के दशक के माहौल को जीवंत करने में की गई मेहनत स्क्रीन पर स्पष्ट दिखाई देती है। विजय देवरकोंडा के शारीरिक और अभिनय प्रयास साफ नजर आते हैं, हालांकि कुछ दृश्यों में उनके हाव-भाव और संवाद अदायगी थोड़े असहज महसूस होते हैं। इसके अलावा, पृष्ठभूमि संगीत को एक बड़ी कमजोरी बताया गया है और आलोचकों का मानना है कि संपादन की मेज पर फिल्म को छांटकर छोटा किए जाने की सख्त जरूरत थी।
वहीं, सोशल मीडिया पर सामने आई एक अन्य समीक्षा में फिल्म के सकारात्मक पहलुओं को रेखांकित किया गया है। उसके अनुसार, फिल्म एक ऐतिहासिक त्रासदी, तीखे संघर्ष और एक रक्षक नायक के आख्यान का प्रभावशाली मिश्रण प्रस्तुत करती है। इस विश्लेषण के मुताबिक, जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, दोनों मुख्य कलाकारों का अभिनय निखरता जाता है, खासकर जयम्मा और भद्रा मल्लाना के कथानक काफी मजबूत बन पड़े हैं। यह समीक्षा मानती है कि दूसरे हिस्से में गति की समस्याओं के बावजूद फिल्म का चरम दृश्य बेहद असरदार और प्रभावशाली है, जो सिनेमाघरों में एक यादगार अनुभव प्रदान करता है।
समीक्षकों की रेटिंग और एडवांस बुकिंग का हाल
अलग-अलग समीक्षकों और मंचों ने फिल्म को मिले-जुले से लेकर औसत अंक दिए हैं। समीक्षा मंचों पर फिल्म को 5 में से 2 स्टार, 5 में से 2.75 स्टार तथा 5 में से 3.25 स्टार तक की रेटिंग मिली है। अधिकांश समीक्षकों की राय इस बात पर सहमत है कि निर्देशक की मंशा भले ही नेक रही हो, लेकिन सुस्त रफ्तार ने फिल्म की धार को कमजोर कर दिया है।
टिकटों की अग्रिम बिक्री के मोर्चे पर शुक्रवार की सुबह थोड़ी तेजी देखने को मिली थी, जब प्रमुख ऑनलाइन टिकटिंग प्लेटफॉर्म बुकमाईशो पर तड़के के घंटों में प्रति घंटे 10 हजार से अधिक टिकटों की बिक्री दर्ज की गई थी। अब फिल्म का पूरा भविष्य शनिवार और रविवार को दर्शकों की संख्या में होने वाले संभावित सुधार और मौखिक प्रचार पर निर्भर करेगा।



















