सिनेमा जगत में अपनी मजबूत पहचान बना चुकीं यामी गौतम की नई फिल्म नई नवेली 16 अक्टूबर 2026 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो चुकी है। इस नई पेशकश में वह मोहिनी नाम की एक ऐसी दुल्हन की भूमिका में हैं, जो मेरठ के एक अफरातफरी से घिरे घराने में कदम रखती है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, परिवार को उसकी असामान्य गतिविधियों के चलते यह संदेह होने लगता है कि वह कोई आम इंसान नहीं बल्कि इंसान का वेश धारण किए एक डायन है। पर्दे पर अलग-अलग रंगों को जीवंत करने वाली इस अदाकारा ने हर शैली में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। इस खास मौके पर आइए उन सात चुनिंदा फिल्मों पर नजर डालते हैं, जिन्होंने उनके अभिनय सफर को मजबूती दी।
सख्त सोच को चुनौती देने वाली शुरुआत: विक्की डोनर
हिंदी सिनेमा में अपनी यात्रा का श्रीगणेश यामी गौतम ने शूजित सरकार के निर्देशन में बनी रोमांटिक कॉमेडी विक्की डोनर से किया था। आयुष्मान खुराना के साथ स्क्रीन साझा करते हुए उन्होंने इस फिल्म में आशिमा रॉय का सादगी भरा किरदार निभाया। स्पर्म डोनेशन और बांझपन जैसे संकोच भरे विषय पर आधारित होने के बावजूद कहानी ने सामाजिक वर्जनाओं को सहज हास्य और गहराई के साथ पेश किया। यामी के सहज अभिनय और सहज संवाद अदायगी ने आलोचकों के साथ दर्शकों को भी प्रभावित किया। इस पहली ही परियोजना ने यह साफ संकेत दे दिया था कि वह पारंपरिक नायिकाओं के ढर्रे से अलग एक लंबी पारी खेलने के इरादे से आई हैं।
मासूमियत और जज्बातों की गहराई: काबिल
ऋतिक रोशन के साथ आई सस्पेंस ड्रामा काबिल में यामी ने सुप्रिया नाम की एक दृष्टिबाधित महिला का कठिन रोल निभाया। एक गंभीर और दर्दनाक हादसे के इर्द-गिर्द घूमती इस कहानी में उनके चरित्र ने पूरी कथा को एक भावनात्मक आधार दिया। अपने सीमित दृश्यों में भी उन्होंने अपनी बेबसी, प्यार और अंतर्मन के डर को आंखों और चेहरे के भावों से बखूबी बयां किया। यह फिल्म उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, क्योंकि इसने यह प्रमाणित किया कि वह बड़े स्टार्स की मौजूदगी में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने में पूरी तरह सक्षम हैं।
गंभीर और डार्क सिनेमा में कदम: बदलापुर
श्रीराम राघवन द्वारा निर्देशित नियो-नोयर रिवेंज थ्रिलर बदलापुर में यामी गौतम एक बिल्कुल अप्रत्याशित भूमिका में सामने आईं। नैतिक द्वंद्वों, प्रतिशोध और मानवीय कमजोरियों से भरी इस हिंसक कहानी में भले ही उनका स्क्रीन टाइम बहुत अधिक नहीं था, मगर उनके हिस्से के दृश्यों ने मुख्य पात्र के बदले की आग को भड़काने में केंद्रीय भूमिका निभाई। इस किरदार के चयन ने दर्शाया कि वह पर्दे पर केवल ग्लैमरस या सुरक्षित भूमिकाएं चुनने के बजाय जटिल और प्रयोगधर्मी सिनेमा का हिस्सा बनने का जोखिम उठाने से नहीं हिचकिचाती हैं।
देशभक्ति और कड़ा अनुशासन: उरी द सर्जिकल स्ट्राइक
विक्की कौशल के मुख्य अभिनय से सजी उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक यामी के फिल्मी सफर की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलताओं में दर्ज है। इसमें उन्होंने खुफिया अधिकारी पल्लवी शर्मा का एक शांत, फोकस्ड और कड़क किरदार अदा किया। राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक रणनीति के ताने-बाने पर रची गई इस ऐतिहासिक एक्शन फिल्म में उनके काम को समीक्षकों ने खूब सराहा। बॉक्स ऑफिस पर नए कीर्तिमान स्थापित करने वाली इस फिल्म ने उन्हें मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में बेहद भरोसेमंद अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर दिया।
सोशल मीडिया की चमक और जमीनी हकीकत: बाला
अमर कौशिक की सामाजिक कॉमेडी बाला में यामी गौतम ने एक स्थानीय टिकटॉक स्टार परी मिश्रा के रूप में दर्शकों को अपनी कॉमिक टाइमिंग से दंग कर दिया। समाज में शारीरिक बनावट, गोरेपन के खोखले पैमानों और कम उम्र में गंजेपन की समस्या को केंद्र में रखकर बनाई गई इस फिल्म में उनका रोल बेहद वास्तविक लगा। छोटे शहर की महात्वाकांक्षाओं और सोशल मीडिया के दौर की चकाचौंध को उन्होंने जिस बेबाकी से पेश किया, उसने साबित किया कि वह गंभीर किरदारों के साथ-साथ व्यंग्य और हास्य में भी पूरी तरह निपुण हैं।
राष्ट्रीय सम्मान की ऐतिहासिक उपलब्धि: आर्टिकल 370
जम्मू-कश्मीर से संबंधित ऐतिहासिक संवैधानिक फैसले की पृष्ठभूमि पर बनी पॉलिटिकल थ्रिलर आर्टिकल 370 यामी के करियर का सबसे चमकता अध्याय साबित हुई। फिल्म में राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के जटिल मोर्चे पर तैनात खुफिया अधिकारी जूनी हक्सर के किरदार में उन्होंने जान फूंक दी। इस बेहद अनुशासित, तनावपूर्ण और गहन प्रदर्शन के लिए उन्हें साल 2026 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया। यह सम्मान उनके अभिनय कौशल की सबसे बड़ी आधिकारिक स्वीकृति बनकर उभरा।
अकेले दम पर खींची गई सस्पेंस की डोर: ए थर्सडे
एक गंभीर थ्रिलर के रूप में सामने आई ए थर्सडे में यामी गौतम ने स्कूल शिक्षिका नैना जयसवाल का अप्रत्याशित और खौफनाक रूप दिखाया। कहानी में जब एक शिक्षिका अचानक अपने ही नन्हे छात्रों को बंधक बना लेती है, तो पूरा तंत्र हिल जाता है। इस सघन मनोवैज्ञानिक थ्रिलर को यामी ने लगभग पूरी तरह अपने कंधों पर संभाला। तनाव, पीड़ा और छिपे हुए गुस्से के जटिल भावों को जिस तीव्रता से उन्होंने व्यक्त किया, उसने यह तय कर दिया कि वह एकल नेतृत्व वाली महिला-केंद्रित फिल्मों को भी मजबूती से आगे ले जा सकती हैं।



















