हिंदी सिनेमा के लंबे और समृद्ध इतिहास में कई ऐसी मूवीज बनी हैं जिन्होंने अपनी दमदार कहानियों और शानदार किरदारों के जरिए दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी है। इंडस्ट्री का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा है कि अलग-अलग दशकों में एक ही टाइटल से ऐसी फिल्में बनी हैं जिनकी स्टोरीलाइन लगभग एक जैसी ही रही है। पुरानी और मशहूर क्लासिक्स को नई तकनीक, आधुनिक युग की सोच और नई पीढ़ी के एक्टर्स के साथ दोबारा बड़े पर्दे पर जीवंत किया गया है। आज हम ऐसी ही पांच चर्चित फिल्मों की चर्चा कर रहे हैं जहां एक ही नाम और विषय ने नए दौर में भी अपनी पुरानी कहानी के जादू को पूरी तरह बरकरार रखा है।
देवदास: कालजयी प्रेम कहानी के दो अलग दौर
भारतीय साहित्य और सिनेमा की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कहानियों में शुमार ‘देवदास’ पर अलग-अलग दौर में एक ही नाम से दो बेहतरीन फिल्में बनाई गईं। साल 1955 में बिमल रॉय के निर्देशन में आई इस फिल्म में दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। इसके बाद साल 2002 में संजय लीला भंसाली ने ठीक इसी टाइटल और कहानी के साथ इस क्लासिक को बड़े पैमाने पर भव्य रूप से दोबारा बनाया, जिसमें शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित नजर आए। दोनों ही फिल्मों का कथानक काफी हद तक एक जैसा ही था। बचपन के घनिष्ठ मित्र देवदास और पारो का अटूट प्रेम, समाज की रूढ़िवादी मजबूरियों और पारिवारिक प्रतिष्ठा के कारण उनका अलग होना तथा अंततः देवदास का शराब के दलदल में धंस जाना, यह दर्दनाक सफर दोनों ही युगों के दर्शकों को गहराई से छू गया। जहां 1955 के ओरिजिनल वर्जन में सादगी और दिल को छू लेने वाली बेहतरीन एक्टिंग देखने को मिली, वहीं 2002 के आधुनिक वर्जन में भव्य सेट, शानदार संगीत और बेहतरीन तकनीकी पक्ष का इस्तेमाल किया गया। हालांकि दोनों ही संस्करणों में मूल कहानी और उसका दुखद अंत बिल्कुल एक समान रहा।
अग्निपथ: पिता के इंतकाम की खौफनाक दास्तान
मुकुल आनंद की साल 1990 में रिलीज हुई फिल्म ‘अग्निपथ’ और करण मल्होत्रा द्वारा साल 2012 में इसी नाम से बनाई गई फिल्म ‘अग्निपथ’ इस बात का सबसे बेहतरीन उदाहरण पेश करती हैं। दोनों ही फिल्मों में मुख्य नायक विजय दीनानाथ चौहान अपने पिता की सरेआम हुई बेरहम हत्या का बदला लेने के लिए मुंबई के खतरनाक अंडरवर्ल्ड की दुनिया में कदम रखता है और अंत में अपने सबसे बड़े दुश्मन कांचा चीना को मौत के घाट उतार देता है। हीरो का मूल उद्देश्य, उसके इरादे और प्रतिशोध की आग दोनों ही फिल्मों में एक जैसी ही थी। साल 1990 की फिल्म में अमिताभ बच्चन के दमदार डायलॉग्स और ताबड़तोड़ गनफाइट एक्शन ने दर्शकों को दीवाना बना दिया था। वहीं साल 2012 के रीमेक में ऋतिक रोशन और संजय दत्त के जरिए इन सभी किरदारों को और अधिक डार्क, खूंखार और इंटेंस तरीके से पर्दे पर उकेरा गया। दोनों फिल्मों के निर्माण और उनके सिनेमैटिक ट्रीटमेंट में पूरे 22 साल का लंबा अंतराल होने के बावजूद, कहानी का बुनियादी ढांचा और उसका भावनात्मक पहलू आपस में काफी हद तक मेल खाता है।
पति पत्नी और वो: पारिवारिक उलझन और कॉमेडी
वैवाहिक जीवन में किसी तीसरे इंसान के प्रवेश और उससे उपजे हास्य-व्यंग्य तथा नाटक पर आधारित ‘पति पत्नी और वो’ एक ही शीर्षक और विषय पर बनी दो शानदार फिल्मों में से एक है। साल 1978 में बीआर चोपड़ा ने संजीव कुमार, विद्या सिन्हा और रंजीता को लेकर यह हल्की-फुल्की कॉमेडी फिल्म बनाई थी। ठीक 41 साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद, साल 2019 में मुदस्सर अजीज ने इसी टाइटल से इस फिल्म का आधुनिक रीमेक दर्शकों के सामने पेश किया, जिसमें कार्तिक आर्यन, भूमि पेडनेकर और अनन्या पांडे ने मुख्य किरदार निभाए। इसकी मूल कहानी असल में वही थी जिसमें एक सामान्य शादीशुदा इंसान अपनी उबाऊ दिनचर्या से तंग आकर अपनी ऑफिस की कलीग या सेक्रेटरी की तरफ आकर्षित होने लगता है और उसका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए अपनी पत्नी की किसी गंभीर बीमारी का झूठा नाटक करता है। साल 1978 की फिल्म के सहज पारिवारिक हास्य को आज के युवाओं और आधुनिक सोशल मीडिया के दौर के अनुकूल ढालते हुए साल 2019 के रीमेक में पेश किया गया, लेकिन फिल्म की मूल आत्मा और कहानी वही पुरानी रही।
जुड़वा 2: जुदा हुए भाइयों का अनोखा कनेक्शन
जुड़वां भाइयों के जन्म के बाद बिछड़ जाने और उनके बीच एक अजीब से शारीरिक जुड़ाव पर आधारित कहानियों का बॉलीवुड में एक अलग ही दौर देखने को मिला है। साल 1997 में निर्देशक डेविड धवन ने सलमान खान के साथ ‘जुड़वा’ फिल्म बनाई थी जिसमें करिश्मा कपूर और रंभा मुख्य अभिनेत्रियों के रूप में नजर आई थीं। इसके पूरे बीस साल बाद, साल 2017 में डेविड धवन ने अपने ही बेटे वरुण धवन को लेकर ‘जुड़वा 2’ में बिल्कुल वही पुरानी कहानी दोबारा बड़े पर्दे पर उतारी, जिसमें जैकलीन फर्नांडीज और तापसी पन्नू ने अभिनय किया। दोनों ही फिल्में राजा और प्रेम नाम के दो जुड़वां भाइयों के इर्द-गिर्द घूमती हैं जो बचपन में ही एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं, जिसमें एक सीधा-साधा लड़का होता है और दूसरा दबंग किस्म का स्ट्रीट फाइटर। जब भी एक भाई को चोट लगती है या गुस्सा आता है, तो दूसरे भाई का शरीर भी बिल्कुल वैसा ही शारीरिक रिएक्शन देता है। विलेन से बदला लेने की जिद से लेकर दोनों भाइयों के अपने-अपने प्रेम संबंधों के कारण पैदा होने वाली हास्यप्रद गफलतों तक, पूरी पटकथा साल 1997 की मूल फिल्म की लगभग एक सटीक नकल जैसी थी।
परिणीता: शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की क्लासिक कृति
महान साहित्यकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास ‘परिणीता’ पर आधारित फिल्में भी एक ही नाम और समान कथानक का एक बेहतरीन संयोजन पेश करती हैं। बिमल रॉय के बैनर तले साल 1953 में बनी फिल्म ‘परिणीता’ में अशोक कुमार और मीना कुमारी ने मुख्य किरदार निभाए थे। इसके कई दशकों के लंबे अंतराल के बाद, साल 2005 में निर्देशक प्रदीप सरकार ने इसी टाइटल और कहानी पर एक नई फिल्म बनाई जिसमें सैफ अली खान और विद्या बालन ने मुख्य भूमिकाओं में जान फूंकी। यह पूरी कहानी बचपन के दो गहरे दोस्तों, ललिता और शेखर के बीच धीरे-धीरे पनपने वाले शांत लेकिन बेहद गहरे प्रेम संबंध के इर्द-गिर्द घूमती है। उनका यह प्यारा रिश्ता तब एक नाजुक मोड़ पर आ जाता है जब शेखर के धनवान और अहंकारी पिता उनके बीच दूरियां और गलतफहमियां पैदा करने की साजिश रचते हैं। साल 1953 और साल 2005 की दोनों ही फिल्मों में मुख्य किरदारों का भावनात्मक संघर्ष, संगीत का विशेष महत्व और कहानी का अंत बिल्कुल एक जैसा ही है, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि सच्ची और असरदार कहानियों का जादू कभी फीका नहीं पड़ता।



















