1990 के दशक का मध्य हिंदी फिल्म संगीत के लिए एक स्वर्ण युग था, जिसमें ऐसी दर्दभरी और भावुक धुनें बनाई गईं जो दशकों बाद भी श्रोताओं के दिलों में बसी हुई हैं। इन सदाबहार गीतों में एक प्रमुख नाम 'परदेसियों से पूछ-पूछ' का है। साल 1995 में आई एक्शन-ड्रामा फिल्म 'कर्तव्य' का यह दर्दभरा गीत संजय कपूर और जूही चावला पर फिल्माया गया था। अपनी रिलीज के इतने सालों बाद भी यह गाना इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे रूहानी संगीत और पर्दे पर दिखाए गए सच्चे भाव दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ सकते हैं।
इस भावुक गीत को तैयार करने वाले मुख्य चेहरे
गीत 'परदेसियों से पूछ-पूछ' की भावनात्मक गहराई को जिंदा करने के पीछे एक बेहद प्रतिभाशाली टीम का हाथ था। इस खूबसूरत धुन को दिलीप सेन और समीर सेन की मशहूर संगीत जोड़ी ने तैयार किया था, जबकि इसके गहरे और मर्मस्पर्शी बोल दिग्गज गीतकार समीर ने लिखे थे। गायकी की बात करें तो इसे साधना सरगम और सुखविंदर सिंह की जादुई आवाजों से सजाया गया था। इन दोनों गायकों की सुरीली और दमदार आवाज ने इस गाने में जुदाई के दर्द और तड़प को इस कदर पिरोया कि यह हमेशा के लिए यादगार बन गया।
पर्दे पर जूही चावला और संजय कपूर का अभिनय
परदे पर इस गाने को जूही चावला और संजय कपूर पर बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया था। इस गाने का वीडियो इसके दर्दभरे बोलों के साथ पूरी तरह मेल खाता है। जूही चावला ने अपने बेहतरीन हाव-भाव और आंखों की नमी से दिल के दर्द को बखूबी बयां किया, वहीं संजय कपूर ने अपनी सादगी और सहज अभिनय से उनका पूरा साथ दिया। दोनों की ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री ने इस गाने के भावनात्मक दर्द को पर्दे पर जीवंत कर दिया, जिससे हर देखने वाला आज भी भावुक हो उठता है।
90 के दशक के संगीत का सुनहरा दौर
बॉलीवुड का यह दौर संगीत जगत में कई बड़े बदलावों और ऐतिहासिक मोड़ों का गवाह रहा। दिलीप सेन और समीर सेन की जोड़ी के अलावा, इस दशक में नदीम-श्रवण जैसे महान संगीतकारों का भी दबदबा था। संगीत जगत के दिग्गज गुलशन कुमार की दुखद हत्या के बाद फिल्म इंडस्ट्री को एक बड़ा झटका लगा था, लेकिन इसके बावजूद संगीतकारों ने अपनी कला से दर्शकों का दिल जीतना जारी रखा। नदीम-श्रवण ने उस कठिन दौर के बाद भी लगातार पांच फिल्मों में ब्लॉकबस्टर संगीत देकर अपनी कला का लोहा मनवाया। 'कर्तव्य' फिल्म का गाना 'परदेसियों से पूछ-पूछ' भी 90 के दशक की उसी समृद्ध विरासत का हिस्सा है, जहां मेलोडी, बोल और गायकी को सबसे ऊपर रखा जाता था, जिसे आज के रीमिक्स दौर में दोबारा बना पाना बेहद मुश्किल है।



















