बरसाना के प्रसिद्ध लाड़लीजी मंदिर में सुबह के पहर से ही श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ रहा है। समूचे देश में भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा रानी के प्राकट्य दिवस के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। भक्तजन इस पावन अवसर पर उपवास रखकर युगल सरकार यानी राधा और कृष्ण की विशेष आराधना में लीन हैं। आमतौर पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के उपवास का समापन मध्यरात्रि की अर्चना के तुरंत बाद हो जाता है, किंतु राधाष्टमी के उपवास को पूरा करने की व्यवस्था उससे भिन्न मानी जाती है।
पारण का सटीक समय और पंचांगीय नियम
राधाष्टमी के उपवास समापन की व्यवस्था विभिन्न संप्रदायों और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार थोड़ी अलग देखने को मिलती है। सनातन परंपरा के अधिकांश मतों में यह विधान है कि भक्त पूरे दिन निराहार या फलाहार रहकर अगले दिन नवमी तिथि के सूर्योदय पर ही अन्न ग्रहण करें। इस शास्त्रीय मान्यता के आधार पर वर्ष 2026 में 20 सितंबर, रविवार की सुबह 6 बजकर 8 मिनट के पश्चात व्रत खोलना सर्वाधिक फलदायी और उत्तम माना गया है।
इसके विपरीत कई वैष्णव कुलों तथा गृहस्थ परिवारों में एक अन्य परंपरा भी निभाई जाती है। इस व्यवस्था के तहत अष्टमी के दिन दोपहर की मुख्य पूजा संपन्न होने के उपरांत सात्विक फलाहार ग्रहण कर संकल्प को विराम दिया जाता है। इस प्रकार भक्त अपनी पारिवारिक परंपरा और शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार सही समय का चयन कर सकते हैं।
उपवास समाप्त करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
पारण के दिन सवेरे जल्दी उठकर नित्यकर्म और स्नान से शुद्ध हो जाना चाहिए। इसके बाद धुले हुए स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को सजाएं। राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत अर्चना करें और उन्हें भोग अर्पित करें। प्रभु को अर्पित किए जाने वाले सात्विक पकवानों या मिष्ठान में तुलसी का पत्ता डालना अनिवार्य माना जाता है। ठाकुरजी को भोग लगाने के पश्चात उसी दिव्य प्रसाद को सबसे पहले ग्रहण करके अपना उपवास खोलना चाहिए।
धार्मिक ग्रंथों में यह निर्देश मिलता है कि पारण के पूरे दिन भोजन सर्वथा सात्विक होना चाहिए। वैष्णव मर्यादा के अनुसार इस दिन के भोजन में प्याज, लहसुन और तामसिक द्रव्यों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित रहता है। उपवास संपन्न करने के उपरांत अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार निर्धन अथवा जरूरतमंद लोगों को फल, अनाज अथवा वस्त्र दान करना बहुत पुण्यकारी माना गया है।
जप के लिए प्रमुख मंत्र और साधना विधि
उपवास का पारण करने से ठीक पूर्व साधक को तुलसी की माला लेकर कम से कम 108 बार राधा रानी के विशिष्ट मंत्रों का जाप करना चाहिए। शास्त्रों में वर्णित प्रमुख मंत्र इस प्रकार हैं
- मूल महामंत्र: ॐ ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा
- बीज मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः
- प्रिया मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमो भगवते राधाप्रियाय
- श्री राधा गायत्री मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै विद्महे गान्धर्विकायै विधीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात्
राधाष्टमी का आध्यात्मिक महत्व और ब्रज की छटा
सनातन धर्म की आस्था में राधा रानी को भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति और परम भक्ति का साक्षात स्वरूप स्वीकार किया गया है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण की साधना तब तक अपूर्ण रहती है जब तक उसमें राधारानी की कृपा सम्मिलित न हो। वे विशुद्ध प्रेम, करुणा, ममता और पूर्ण आत्मसमर्पण की अधिष्ठात्री देवी हैं।
इस पुण्य तिथि पर समूचे ब्रजमंडल में अलौकिक दृश्य उपस्थित होता है। मथुरा, वृंदावन और विशेषकर बरसाना के देवालयों में विग्रहों का मनमोहक श्रृंगार किया जाता है। दिनभर संकीर्तन मंडलियों के मधुर भजनों की गूंज वातावरण को भक्तिमय बनाए रखती है और दूर-दराज से आए श्रद्धालु राधा नाम के जयकारों के साथ कृतार्थ होते हैं।



















