भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के पावन संयोग में 4 सितंबर, शुक्रवार को देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस विशेष अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का जन्मोत्सव मनाने के लिए घरों और मंदिरों में व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जन्माष्टमी के दिन भक्तिभाव से व्रत रखने, मंत्रों का निरंतर जाप करने और मध्यरात्रि में कान्हा के अवतरण काल में विधि-विधान से पूजा करने से अनंत शुभ फलों की प्राप्ति होती है। यदि आप भी इस पावन तिथि पर उपवास रख रहे हैं, तो सुबह सूर्योदय के समय लिए जाने वाले संकल्प से लेकर रात 12 बजे की महापूजा और पारण तक के सभी नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना आवश्यक माना गया है।
जन्माष्टमी व्रत का संकल्प और प्रातः कालीन नियम
जन्माष्टमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होना चाहिए और स्वच्छ अथवा नए वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके उपरांत अपने पूजा घर की अच्छी तरह सफाई करके भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र के समक्ष बैठकर उनका ध्यान लगाएं। व्रत की शुरुआत हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपनी सामर्थ्य तथा श्रद्धा अनुसार निर्जला, फलाहारी अथवा जलाहार उपवास का संकल्प लेकर की जाती है। मंदिर में देसी घी का दीपक प्रज्वलित कर दिनभर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' अथवा श्रीकृष्ण के अन्य सिद्ध मंत्रों का मन ही मन जाप करते रहना चाहिए। ध्यान रहे कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होने की स्थिति में अति कठोर व्रत रखने से बचना चाहिए और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही नियमों का चयन करना चाहिए।
उपवास के प्रकार और आहार संबंधी नियम
जन्माष्टमी व्रत के दौरान खान-पान के विषय में विशेष शुद्धता का ध्यान रखना अनिवार्य होता है। जो श्रद्धालु फलाहार का विकल्प चुनते हैं, वे अपने आहार में ताजा दूध, दही, ताजे फल, मखाना, साबूदाना, तथा सिंघाड़े या कुट्टू के आटे से तैयार सात्विक व्यंजनों को शामिल कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त सूखे मेवे और फलाहारी भोजन में केवल सेंधा नमक का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। इस दिन साधारण अनाज जैसे गेहूं, चावल, दालों तथा आम रसोई में इस्तेमाल होने वाले सामान्य मसालों का सेवन पूर्णतः वर्जित माना गया है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में उपवास के खान-पान से जुड़ी परंपराएं भिन्न हो सकती हैं, इसलिए श्रद्धालुओं को अपने कुल और पारिवारिक मान्यताओं के अनुरूप ही फलाहार ग्रहण करना श्रेयस्कर होता है।
श्रीकृष्ण के लिए सात्विक भोग और तुलसी का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा में माखन-मिश्री का भोग मुख्य रूप से अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही भगवान को दूध, दही, पंचामृत, ताजे फल, शुद्ध मिठाइयां, पंजीरी तथा विशेष रूप से धनिया पंजीरी का भोग लगाने का विधान है। कान्हा को अर्पित किए जाने वाले प्रत्येक भोग में तुलसी दल यानी तुलसी का पत्ता रखना अत्यंत आवश्यक माना गया है, क्योंकि इसके बिना भगवान भोग स्वीकार नहीं करते। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान के लिए तैयार किया जाने वाला समस्त प्रसाद पूर्णतः सात्विक, स्वच्छ और शुद्ध वातावरण में ही बनाया गया हो।
मध्यरात्रि 12 बजे बाल गोपाल का जन्मोत्सव और पूजन विधि
शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि 12 बजे हुआ था, इसलिए रात के समय की जाने वाली पूजा का जन्माष्टमी पर सर्वाधिक महत्व होता है। पूजा की शुरुआत में बाल गोपाल की प्रतिमा को किसी सुंदर एवं स्वच्छ स्थान या झूले पर विराजमान करें। इसके पश्चात परंपरा के अनुसार पंचामृत जिसमें दूध, दही, घी, शहद और शक्कर शामिल हैं, तथा पवित्र गंगाजल से भगवान का अभिषेक करें। अभिषेक के बाद भगवान को नए वस्त्र पहनाएं तथा मुकुट, मोरपंख, वैजयंती माला और आभूषणों से उनका भव्य श्रृंगार करें। तत्पश्चात चंदन, अक्षत, सुगंधित पुष्प और तुलसी पत्र अर्पित करते हुए माखन-मिश्री का भोग लगाएं। अंत में धूप-दीप जलाकर बाल गोपाल की आरती उतारें और जन्माष्टमी व्रत कथा तथा श्रीकृष्ण के स्तोत्रों का पाठ करें।
व्रत पारण का सही समय और परंपराएं
मध्यरात्रि की पूजा और आरती संपन्न होने के उपरांत अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पारण किया जाता है। कुछ धार्मिक परंपराओं में रात 12 बजे जन्मोत्सव पूजन और आरती के तुरंत बाद भगवान का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। वहीं अन्य परंपराओं में अगले दिन सूर्योदय के पश्चात निर्धारित शुभ मुहूर्त अथवा तिथि समाप्ति पर ही पारण करने का विधान है। श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग, क्षेत्र और पारिवारिक मर्यादाओं के अनुसार ही पारण का समय और नियम तय करना चाहिए ताकि व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त हो सके।



















