सनातन परंपरा में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि अत्यंत पावन और फलदायी मानी गई है। इस विशिष्ट तिथि को अनंत चतुर्दशी के रूप में जाना जाता है, जो धार्मिक दृष्टि से दोहरे उत्सव का संयोग लेकर आती है। इस दिन एक ओर जहां सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के अनंत रूप की उपासना की जाती है, वहीं दूसरी ओर घर-घर और सार्वजनिक पंडालों में विराजे प्रथम पूज्य भगवान गणेश का विसर्जन भी संपन्न होता है। गणेश उत्सव की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से होती है, जिसका विधिवत समापन चतुर्दशी तिथि को ही किया जाता है। श्रद्धालु अपनी-अपनी परंपरा व संकल्प के अनुसार बप्पा को एक दिन, ढाई दिन, पांच दिन, सात दिन अथवा ग्यारहवें दिन यानी अनंत चतुर्दशी तक विराजित रखकर विदाई देते हैं।
विष्णु आराधना और अनंत सूत्र धारण का पौराणिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष अनंत चतुर्दशी का पावन पर्व 6 सितंबर को मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर भक्तजन व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। पूजन के उपरांत कलाई पर चौदह गांठों वाला पवित्र अनंत डोरा बांधा जाता है, जिसे अनंत सूत्र भी कहा जाता है। मान्यता है कि यह व्रत रखने और अनंत रक्षासूत्र बांधने से जातक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन के बड़े से बड़े कष्ट व संकट स्वतः समाप्त हो जाते हैं। पौराणिक संदर्भों के अनुसार महाभारत काल में घोर संकटों से घिरे पांडवों ने भी भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर इस कल्याणकारी व्रत का पूरी निष्ठा से पालन किया था, जिसके शुभ प्रभाव से उनके दुखों का निवारण हुआ और खोया हुआ राज्य वापस पाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
चौघड़िया मुहूर्त में संपन्न करें गणेश विसर्जन
गणेशोत्सव के अंतिम दिन भगवान श्री गणेश की मंगलमयी विदाई अत्यंत श्रद्धा और नियमों के साथ की जाती है। अधिकांश श्रद्धालु अनंत चतुर्दशी के दिन ही बप्पा को विसर्जित करना सर्वोत्तम मानते हैं। शास्त्रसम्मत नियमों के अनुसार शुभ मुहूर्त में किया गया विसर्जन परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास कराता है। इस वर्ष अनंत चतुर्दशी की सुबह 7 बजकर 30 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 42 मिनट तक चौघड़िया का अत्यंत शुभ मुहूर्त रहेगा। श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे इसी समयावधि में भगवान गणेश की षोडशोपचार पूजा करें, आरती उतारें और फिर भक्तिभाव से प्रतिमा का जल में विसर्जन करें।



















