सनातन धार्मिक परंपरा में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। इस पावन तिथि को अहोई अष्टमी के रूप में मनाया जाता है, जिस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी आयु, बेहतर स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और जीवन में उन्नति की मंगलकामना के साथ निर्जला उपवास रखती हैं। वर्ष 2026 में यह तिथि 1 नवंबर यानी रविवार के दिन पड़ रही है। पंचांग के अनुसार सप्तमी तिथि रविवार को दोपहर 2 बजकर 52 मिनट तक प्रभावी रहेगी, जिसके तुरंत बाद अष्टमी तिथि का आरंभ हो जाएगा। यह व्रत न केवल पहले से मौजूद संतानों के कल्याण और उनके करियर की बाधाओं को समाप्त करने के लिए रखा जाता है, बल्कि संतान प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाली महिलाओं के लिए भी अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है।
इस पावन पर्व पर पूरे दिन श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन करने के उपरांत संध्याकाल में अहोई माता के स्वरूप की पूजा की जाती है। पूजा संपन्न होने के बाद शाम को आकाश में तारों के दर्शन करके उन्हें अर्घ्य दिया जाता है और उसी के बाद उपवास का पारण करने का विधान है। कई परिवारों और लोक परंपराओं में अपनी मान्यताओं के अनुसार रात में चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें जल अर्पित करने के पश्चात भी व्रत खोला जाता है। अहोई माता की विधिवत आराधना के अतिरिक्त इस दिन कुछ विशेष धार्मिक उपायों और नियमों का पालन करने से जीवन की विभिन्न समस्याओं से मुक्ति मिलने की मान्यता है।
संतान की आर्थिक संपन्नता और करियर में प्रगति के उपाय
यदि संतान के जीवन में निरंतर धन की कमी या आर्थिक रुकावटों का सामना करना पड़ रहा हो, तो अहोई अष्टमी के दिन 5 कौड़ियां लेकर संतान को देनी चाहिए। इसके बाद उससे कहें कि वह धूप और दीप प्रज्वलित कर इन कौड़ियों की विधिवत पूजा-अर्चना करे। पूजा संपन्न हो जाने के उपरांत उन पांचों कौड़ियों को संभालकर एक लाल रंग के कपड़े में लपेटकर अपने पास सुरक्षित रख लेना चाहिए। यदि किसी कारणवश संतान स्वयं यह पूजा करने में असमर्थ हो, तो माता-पिता स्वयं उन 5 कौड़ियों की धूप-दीप से पूजा कर सकते हैं और फिर लाल कपड़े में बांधकर संतान को सौंप सकते हैं, जिसे उसे संभालकर अपने पास रखना चाहिए।
संतान के करियर, व्यवसाय अथवा नौकरी में आ रही अड़चनों को दूर करने और उसे सफलता दिलाने के लिए भी इस दिन विशेष पूजन किया जाता है। अहोई अष्टमी के अवसर पर अहोई माता की पूजा के दौरान देवी को ताजे लाल फूल अर्पित करने चाहिए। इसके साथ ही दूध और चावल से तैयार की गई स्वादिष्ट खीर का नैवेद्य यानी भोग माता को लगाना चाहिए। भोग अर्पण करते समय देवी मां से अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और करियर की प्रगति के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करनी चाहिए। पूजा संपन्न होने के उपरांत इस खीर को प्रसाद के रूप में संतान को खिलाएं तथा देवी मां के चरणों में चढ़ाया गया लाल फूल बच्चे के हाथों में देकर उसे पूरे दिन अपने पास रखने को कहें।
वैवाहिक सुख, व्यवहार सुधार और नकारात्मक संगति से मुक्ति
यदि संतान के दांपत्य जीवन में तनाव, मतभेद या किसी प्रकार की वैवाहिक परेशानियां चल रही हों, तो इस दिन अहोई माता को शुद्ध गुड़ का भोग लगाना चाहिए। पूजा के बाद अपनी संतान को गले में चांदी की चेन धारण करने की सलाह देनी चाहिए, जिससे उसके पारिवारिक संबंधों में मधुरता आ सके।
कई बार बच्चे अत्यधिक हठी या जिद्दी स्वभाव के हो जाते हैं और माता-पिता की उचित सलाह को भी अनसुना कर देते हैं। ऐसे बच्चों के स्वभाव को शांत और अनुशासित बनाने के लिए अहोई अष्टमी पर अहोई माता की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। प्रार्थना पूरी होने के बाद एक तांबे का सिक्का लेकर उसे बहते हुए स्वच्छ जल में प्रवाहित कर देना चाहिए।
यदि किसी की संतान गलत संगत अथवा अवांछित आदतों का शिकार हो गई हो, तो उसे सन्मार्ग पर लाने के लिए अहोई अष्टमी की सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर अहोई माता का ध्यान करना चाहिए और तत्पश्चात सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना चाहिए। इसके साथ ही यदि संभव हो तो एक तांबे का सिक्का बहते जल में प्रवाहित करने का नियम पूरा करना चाहिए।
व्यापारिक अड़चनों का समाधान और व्यक्तिगत करियर संकट से मुक्ति
व्यापार या स्वरोजगार से जुड़ी संतान यदि अक्सर असमंजस में रहती हो, उसका चित्त अशांत रहता हो अथवा कार्यक्षेत्र के विस्तार को लेकर उचित निर्णय न ले पा रही हो, तो इस दिन एक चांदी का चंद्रमा बनवाकर उसे भेंट करना चाहिए। संतान से उस चांदी के चंद्रमा को गले में लॉकेट के रूप में पहनने का आग्रह करें। यदि वह इसे गले में धारण करने में सहज न हो, तो वह इसे सुरक्षित रूप से अपनी जेब या निजी स्थान पर अपने पास रख सकती है।
यदि कोई व्यक्ति स्वयं अपने कार्यक्षेत्र या आजीविका में गंभीर बाधाओं का सामना कर रहा हो, तो अहोई अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान करके देवाधिदेव भगवान शिव की विधिवत उपासना करनी चाहिए। शिवलिंग पर शुद्ध जल से जलाभिषेक करें, सुगंधित चंदन का लेप लगाएं और हाथ जोड़कर भगवान भोलेनाथ से अपने करियर और कार्यक्षेत्र की समस्त कठिनाइयों को दूर करने की प्रार्थना करें।
पारिवारिक समरसता, उत्तम स्वास्थ्य और नेतृत्व क्षमता का विकास
घर-परिवार में सुख, शांति और आपसी सामंजस्य बनाए रखने के लिए अहोई पूजा के समय एक पात्र या कटोरी में चावल भरकर रखना चाहिए। उन चावलों के ऊपर एक रुपये का सिक्का स्थापित करें। अहोई माता की संपूर्ण पूजा-अर्चना के बाद चावल के ऊपर रखे उस एक रुपये के सिक्के को अपनी संतान को आशीर्वाद स्वरूप दे दें और पात्र में रखे चावल को किसी धर्मस्थल या मंदिर में दान कर देना चाहिए।
संतान की शारीरिक आरोग्यता और बीमारियों से रक्षा के लिए अहोई पूजा के दौरान पांच साबुत हल्दी की गांठें देवी मां के समक्ष अर्पित करनी चाहिए। पूजा के समापन पर माता को नमन करके उन हल्दी की गांठों को उठाएं और किसी निकटतम मंदिर में ले जाकर दान कर दें।
संतान के उत्तम स्वास्थ्य के साथ उसकी दीर्घायु सुनिश्चित करने के लिए पूजा के समय बच्चे को अपने समीप बैठाकर अहोई माता का प्रत्यक्ष आशीर्वाद दिलाना चाहिए। यदि बच्चा अध्ययन, नौकरी अथवा किसी कार्यवश बाहर होने के कारण पूजा में उपस्थित न हो सके, तो उसके किसी पहने हुए वस्त्र को पूजा स्थल पर रखकर अहोई माता की पूजा करें। इसके बाद देवी के समक्ष प्रज्वलित दीपक की पवित्र लौ पर दोनों हाथ फेरकर बच्चे के उस वस्त्र पर स्पर्श कराएं।
इसके अतिरिक्त, अपने भीतर नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक गुणों को सुदृढ़ करने के इच्छुक जातकों को अहोई अष्टमी के दिन सूर्य नारायण को अर्घ्य देना चाहिए और किसी जरूरतमंद या निर्धन व्यक्ति को मीठा भोजन अथवा मिष्ठान का दान करना चाहिए।



















