दीपावली महापर्व से ठीक एक दिन पूर्व छोटी दिवाली का पावन पर्व उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग और धार्मिक परंपराओं में इस दिन को नरक चतुर्दशी, नरक चौदस, रूप चतुर्दशी तथा रूप चौदस जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशिष्ट तिथि पर यम देवता की आराधना करने और शाम के समय दीपदान करने का विधान प्रचलित है। इसके साथ ही भगवान श्री कृष्ण की विशेष उपासना भी की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा और दीप प्रज्वलित करने से समस्त पापों का क्षय होता है तथा नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। वर्ष 2026 में इस पर्व की तिथि, समय और पूजा से जुड़े विभिन्न मुहूर्तों को लेकर लोग उत्सुक हैं।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि का समय और छोटी दिवाली की तारीख
पंचांग गणना के आधार पर, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 7 नवंबर को प्रातःकाल 10 बजकर 47 मिनट पर हो रही है। इस चतुर्दशी तिथि का समापन अगले दिन यानी 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 47 मिनट पर होगा। उदयातिथि और संध्याकालीन दीपदान के नियमों को ध्यान में रखते हुए छोटी दिवाली यानी नरक चतुर्दशी का मुख्य पर्व 7 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन संध्याकाल में दीपदान करने की विशेष महत्ता बताई गई है, इसलिए श्रद्धालु 7 नवंबर को ही घरों में यम के नाम का दीप जलाएंगे।
अभ्यंग स्नान, चंद्रोदय और शाम के दीपदान का शुभ मुहूर्त
नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पूर्व उबटन लगाकर अभ्यंग स्नान करने की पुरातन परंपरा है। वर्ष 2026 में अभ्यंग स्नान के लिए सबसे शुभ समय 8 नवंबर की सुबह 05 बजकर 41 मिनट से लेकर सुबह 06 बजकर 38 मिनट तक निर्धारित है। इसके अतिरिक्त, इस पावन अवसर पर चंद्रोदय का समय शाम 5 बजकर 41 मिनट रहने वाला है। शाम के समय दीप प्रज्वलित करने के लिए गोधूलि वेला और सायाह्न संध्या का समय सर्वोत्तम माना गया है। गोधूलि मुहूर्त शाम 5 बजकर 31 मिनट से आरंभ होकर शाम 5 बजकर 57 मिनट तक प्रभावी रहेगा। वहीं, सायाह्न संध्या पूजन का समय शाम 5 बजकर 31 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 50 मिनट तक रहेगा, जिसमें भक्त श्रद्धापूर्वक दीपदान कर सकते हैं।
भगवान कृष्ण और नरकासुर वध से जुड़ी पावन कथा
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में नरकासुर नाम का एक अत्यंत क्रूर दैत्य हुआ करता था। उसने अपने अपार बल और आतंक से तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था और लगभग 16 हजार स्त्रियों को बंदी बनाकर अपनी कारागार में डाल दिया था। नरकासुर के निरंतर बढ़ते अत्याचारों और आतंक से त्रस्त होकर समस्त देवताओं तथा तपस्वी ऋषि-मुनियों ने भगवान श्री कृष्ण के समक्ष रक्षा की गुहार लगाई थी। भक्तों की प्रार्थना सुनकर भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर पर आक्रमण किया और उसका संहार करके देवताओं और साधु-संतों को उसके भय से मुक्ति दिलाई।
नरकासुर का वध करने के उपरांत श्री कृष्ण ने कारागार में बंद सभी 16 हजार स्त्रियों को सकुशल मुक्त कराया। इस विजय और मुक्ति के उल्लास में जनमानस ने घी और तेल के असंख्य दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। मान्यता है कि तभी से अधर्म पर धर्म की विजय के इस दिन को छोटी दिवाली और नरक चतुर्दशी के रूप में दीप जलाकर मनाने की परंपरा आरंभ हुई।



















