जन्माष्टमी नजदीक आते ही शहरों और कस्बों की गलियों में एक जाना-पहचाना नजारा लौट आता है, ऊंचाई पर बंधी मटकी और उसे फोड़ने के लिए कंधे पर कंधा रखकर चढ़ती गोविंदा की टोली। हर साल की तरह इस बार भी सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल यही रहता है कि आखिर उस मटकी के भीतर रखा क्या जाता है। बहुत से लोग मान लेते हैं कि नाम से ही जाहिर है कि उसमें सिर्फ दही भरा होगा, लेकिन हकीकत इससे थोड़ी अलग और दिलचस्प है। अलग-अलग शहरों, राज्यों और आयोजनों में मटकी का सामान बदलता रहता है, और इसकी वजह सीधे कृष्ण जन्म की पुरानी कथाओं से जुड़ी है।
कृष्ण की माखनचोरी से निकली है मटकी बांधने की रीत
दही हांडी की पूरी परंपरा भगवान कृष्ण के बचपन की शरारतों से निकली मानी जाती है। लोककथाओं के मुताबिक बाल कृष्ण अपने साथियों के साथ मिलकर पड़ोस के घरों में रखी ऊंची मटकियों से मक्खन चुराकर खाया करते थे। घर वाले मक्खन और दही को कृष्ण की पहुंच से बचाने के लिए मटकी को छत में ऊंचाई पर लटका देते थे, फिर भी कृष्ण और उनके दोस्त किसी न किसी तरह उस तक पहुंच ही जाते थे। इसी कथा को यादगार बनाने के लिए आज भी दही हांडी में मटकी को जानबूझकर ऊंचाई पर बांधा जाता है, ताकि गोविंदा की टोली मानव पिरामिड बनाकर ठीक उसी तरह मटकी तक पहुंचे और उसे फोड़े। परंपरागत रूप से इस मटकी में दही, मक्खन, दूध या मिश्री जैसी चीजें भरी जाती हैं, और कई जगह इसमें प्रसाद भी मिलाया जाता है। जैसे ही मटकी टूटती है, यह सारा सामान सीधे नीचे खड़ी भीड़ पर गिरता है और उत्सव का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। हालांकि आज के दौर में इस आयोजन का रूप काफी बदल चुका है, फिर भी मटकी के भीतर दही और मक्खन रखने की यह पुरानी रीत ज्यादातर जगहों पर आज भी कायम है।
क्या मटकी में नकद इनाम भी रखा जाता है
आधुनिक दौर में दही हांडी सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रह गई, बल्कि यह एक बड़ी प्रतियोगिता का रूप ले चुकी है, खासकर महाराष्ट्र में जहां इसे बेहद बड़े स्तर पर आयोजित किया जाता है। यहां मटकी फोड़ने वाली टीमों के लिए मोटी रकम के इनाम रखे जाते हैं, इसलिए बहुत से लोग सोचते हैं कि मटकी के अंदर ही नकद पैसे रखे होते हैं। असल में ऐसा हर जगह जरूरी नहीं। ज्यादातर बड़े आयोजनों में नकद इनाम मटकी के अंदर नहीं, बल्कि आयोजकों की तरफ से मटकी फोड़ने वाली विजेता टीम को अलग से दिया जाता है। कुछ खास आयोजनों में जरूर मटकी के भीतर पुरस्कार राशि या उपहार रखने की परंपरा देखने को मिलती है, लेकिन यह पूरी तरह उस इलाके की स्थानीय परंपरा और आयोजकों के अपने नियमों पर निर्भर करता है। कहीं जीतने वाली टीम को सिर्फ ट्रॉफी देकर सम्मानित किया जाता है, तो कहीं लाखों रुपये तक के नकद इनाम की घोषणा कर दी जाती है। यही वजह है कि अब दही हांडी को केवल भक्ति भाव से जुड़ा आयोजन नहीं, बल्कि जोश और प्रतिस्पर्धा से भरा एक बड़ा मुकाबला भी माना जाने लगा है।
दही-मक्खन के अलावा मटकी में और क्या मिलता है
कई आयोजनों में मटकी के भीतर केवल दही और मक्खन तक ही बात नहीं रुकती। मिश्री, फल, मिठाई और तरह-तरह के प्रसाद भी इसमें शामिल किए जाते हैं, ताकि आयोजन का धार्मिक और पारंपरिक रंग बरकरार रहे। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर जगह की मटकी में एक जैसी चीजें ही भरी जाएं। इलाके की रीति-रिवाज, आयोजकों की व्यवस्था और कार्यक्रम के स्वरूप के हिसाब से मटकी के अंदर की सामग्री बदलती रहती है। आज के आयोजनों में मटकी को सिर्फ भरा ही नहीं जाता, बल्कि उसे रंग-बिरंगे कपड़ों, ताजे फूलों और तरह-तरह की सजावटी चीजों से सजाया भी जाता है, जिससे वह देखने में और आकर्षक लगे। नीचे जमा भीड़ गोविंदा की टोली का हौसला बढ़ाती रहती है, और जैसे ही मटकी फूटती है, पूरा इलाका जयकारों और तालियों की गूंज से भर उठता है।
सिर्फ मटकी फोड़ना नहीं, टीमवर्क और सुरक्षा भी अहम
दही हांडी की जान उसका मानव पिरामिड ही है। किसी एक व्यक्ति के लिए इतनी ऊंचाई पर बंधी मटकी तक पहुंचना नामुमकिन है, इसलिए पूरी टोली मिलकर एक-दूसरे का सहारा बनती है। सबसे नीचे खड़े मजबूत सदस्य पूरे पिरामिड की बुनियाद तैयार करते हैं, जबकि उनके ऊपर एक के बाद एक सदस्य चढ़ते हुए धीरे-धीरे सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंचते हैं। आखिर में सबसे ऊपर मौजूद सदस्य मटकी को फोड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में संतुलन, आपसी तालमेल और टीमवर्क की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है, क्योंकि जरा सी चूक पूरे पिरामिड को गिरा सकती है। यही वजह है कि बदलते वक्त के साथ अब आयोजकों का ध्यान सुरक्षा इंतजामों पर भी उतना ही रहने लगा है जितना जोश और जीत पर। आयोजन स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था, गिरने की स्थिति में चोट से बचाने वाली मैट और अन्य एहतियाती कदम अब आम बात हो गए हैं, ताकि उत्सव का उत्साह बना रहे और साथ ही गोविंदा की टोली की सुरक्षा से समझौता न हो।



















