भारत की सांस्कृतिक विविधता में लोकपर्वों का एक अलग ही स्थान है। कुछ उत्सव पूरे देश में एक साथ मनाए जाते हैं, तो वहीं कई पर्व ऐसे होते हैं जो खास क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों की लोक आस्था से गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक प्रमुख और अनूठा लोकपर्व गोगा नवमी है, जिसे लेकर राजस्थान से लेकर हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश तक के इलाकों में भारी उत्साह देखने को मिलता है। इस दिन नागों के देवता की पूजा की जाती है और लोग अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
लोकदेवता गोगाजी का स्वरूप और महत्व
पंचांग के अनुसार, गोगा नवमी का यह पावन पर्व हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 5 सितंबर, शनिवार को पड़ रही है, जिस दिन भक्त गोगा नवमी के शुभ मुहूर्त भी जानिए। गोगाजी को नागों के देवता के रूप में पूजा जाता है और उन्हें जाहरवीर गोगा राणा तथा जाहरपीर गोगाजी के नाम से भी पुकारा जाता है। योग साधना, तपस्या और मंत्र बल से प्राप्त सिद्धियों की वजह से उन्हें राजस्थान के सबसे प्रमुख लोकदेवताओं में ऊंचा स्थान प्राप्त हुआ है।
गोगा नवमी की विस्तृत पूजा विधि
गोगा नवमी के दिन सुबह उठकर स्नान किया जाता है और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके वीर गोगाजी का स्मरण करते हुए व्रत और पूजन का संकल्प लिया जाता है। इस दिन कई तरह की पारंपरिक विधियों से पूजा संपन्न की जाती है
- घर की रसोई की दीवार पर हल्दी और चंदन के प्रयोग से गोगाजी का प्रतीक चिन्ह बनाया जाता है।
- इस प्रतीक में तवे की कालिख या फिर कोयले से रंग भरने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है।
- कई स्थानों पर महिलाएं अपने हाथों से मिट्टी की वीर गोगाजी की प्रतिमा तैयार करती हैं, तो कहीं घोड़े पर सवार गोगाजी की मूर्ति की पूजा होती है।
- जांटी के पेड़ की टहनी या फिर गोगा नाम से पहचाने जाने वाले विशेष पौधे की विधि-विधान से पूजा की जाती है।
- गोगादेव को खीर, चूरमा और गुलगुले जैसे पारंपरिक पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है।
- इस विशेष अवसर पर नागों की पूजा करने का भी विधान है ताकि परिवार की हर बुरी बला से रक्षा हो सके।
- जिन जगहों पर घोड़े पर सवार गोगाजी के स्वरूप की आराधना होती है, वहां घोड़े को दाल खिलाने की भी प्रथा है।
- एक अन्य लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, रक्षाबंधन पर भाई की कलाई में बांधी गई राखी को इस दिन उतारकर गोगाजी को समर्पित कर दिया जाता है।
- इसके बाद भाई और पूरे परिवार की लंबी उम्र और सुरक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है।
- पूजन कार्य संपन्न होने के बाद शाम के वक्त जांटी की टहनी या गोगा पौधे को किसी नदी या तालाब में प्रवाहित कर दिया जाता है।
- हरियाणा में गोगा के पौधे को आमतौर पर अपामार्ग, लटजीरा या चिरचिटा के नाम से पहचाना जाता है, जिसमें कई तरह के औषधीय गुण भी मौजूद होते हैं।
- इन औषधीय गुणों के कारण ही स्थानीय संस्कृति में इस पौधे को गोगा नवमी से जोड़कर देखा जाता है और इसकी पूजा की जाती है।
संतान प्राप्ति और दीर्घायु के लिए व्रत
गोगा नवमी के दिन व्रत रखने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और पारिवारिक समृद्धि की कामना करते हुए उपवास रखती हैं। इसके अलावा जिन दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति की इच्छा होती है, वे भी गोगाजी के दरबार में हाजिरी लगाकर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। ऐसी गहरी लोक मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन और पूरी श्रद्धा के साथ वीर गोगाजी का पूजन करता है, उसकी हर मुराद अवश्य पूरी होती है।
ऐतिहासिक गोगामेड़ी मेला और लोक आस्था
गोगा नवमी मूल रूप से लोक आस्था का एक ऐसा पर्व है जो समाज को आपस में जोड़ता है। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित गोगामेड़ी में गोगाजी का बेहद प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर बना हुआ है। गोगा नवमी के खास अवसर पर इस स्थान पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दौरान गोगाजी की छड़ी का भी बहुत महत्व माना जाता है, जिसे भक्त अपने कंधों पर उठाकर पूरे नगर में प्रभातफेरी निकालते हैं और यही इस उत्सव की सबसे बड़ी पहचान है। हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व वहां की स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार ही मनाया जाता है।



















