श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व आते ही देश भर के भक्तों में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। पूरा दिन भगवान कृष्ण की आराधना और उनकी भक्ति में लीन रहने के बाद, जब रात के बारह बजते हैं और कान्हा के अवतरण का समय आता है, तो हर भक्त के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि अब व्रत कब खोला जाए। कई लोग रात में ही जन्मोत्सव के तुरंत बाद उपवास समाप्त कर लेते हैं, तो कुछ लोग अगले दिन सुबह सूर्योदय के पश्चात ही अन्न-जल ग्रहण करते हैं। इस विषय पर सनातन परंपरा और धार्मिक मान्यताओं में अलग-अलग विधान बताए गए हैं, जिन्हें समझकर व्रत का सही नियम से पारण किया जा सकता है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में भगवान श्रीकृष्ण का प्रकटय हुआ था। यही कारण है कि मध्यरात्रि के समय लड्डू गोपाल का विधि-विधान से पंचामृत स्नान कराया जाता है, उनका भव्य शृंगार होता है और फिर महाआरती की जाती है। इस विशेष अवसर पर कान्हा को माखन-मिश्री, पंजीरी, फल और विभिन्न प्रकार की मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। भगवान के जन्म की इस खुशी में पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है और भक्त अपनी परंपरा के अनुसार आगे की प्रक्रिया तय करते हैं।
रात में या सुबह कब खोलें उपवास
श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव और आधी रात की पूजा संपन्न होने के बाद कई श्रद्धालु तुरंत ही अपना व्रत खोल लेते हैं। हालांकि, परंपरा के अनुसार कुछ लोग अगले दिन सूर्योदय के बाद ही व्रत का पारण करना उचित मानते हैं। इस वर्ष 5 सितंबर 2026 को सुबह 6:08 बजे के बाद व्रत खोलने का समय निर्धारित किया गया है। जानकारों के अनुसार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के पूर्ण होने के बाद ही उपवास तोड़ना उत्तम फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपके परिवार में पीढ़ियों से कौन सी रीति चली आ रही है।
प्रसाद के साथ करें व्रत की शुरुआत
जब भी आप अपना उपवास खोलें, तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि सबसे पहले भगवान को अर्पित किया गया भोग ही ग्रहण करें। व्रत का पारण करते समय सबसे पहले चरणामृत या पंचामृत लिया जाता है, जिसके बाद माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, ताजे फल या कोई अन्य हल्का सात्विक आहार खाया जा सकता है। चूंकि उपवास के दौरान पेट लंबे समय तक खाली रहता है, इसलिए अचानक से बहुत भारी भोजन खाने से बचना चाहिए ताकि पाचन तंत्र पर कोई अतिरिक्त दबाव न पड़े।
भोजन और फलाहार से जुड़े नियम
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भक्त अपनी शारीरिक क्षमता, सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के आधार पर निर्जला या फलाहार उपवास रखते हैं। फलाहार के दौरान ताजे फल, दूध, दही, मखाना और सेंधा नमक जैसी सात्विक चीजों का सेवन किया जाता है, जबकि सामान्य अनाज और दालों से पूरी तरह परहेज किया जाता है। जो श्रद्धालु निर्जला व्रत रखते हैं, वे पूरे चौबीस घंटे बिना अन्न और जल के भगवान की आराधना में लीन रहते हैं। इन सभी नियमों का पालन करते हुए व्रत को सफलतापूर्वक पूरा किया जाता है।
रातभर जागकर मनाया जाता है उत्सव
भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव तक रात्रि जागरण करना जन्माष्टमी के अनुष्ठानों का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। इस पूरी रात भक्त भजन-कीर्तन करते हैं, भगवान की बाल लीलाओं का स्मरण करते हैं और धार्मिक धुनों में झूमते हैं। मध्यरात्रि में जैसे ही भगवान का जन्म होता है, वैसे ही नंद के आनंद भयो के जयकारों के साथ अभिषेक और आरती का सिलसिला शुरू होता है। इस पूरी रात जागने और भगवान के नाम का स्मरण करने से विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है, जो भक्तों के जीवन में सुख-शांति लेकर आती है।



















