छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजनों में अरसा का एक अलग ही मुकाम है। चावल और गुड़ के मेल से बनने वाली यह मिठाई न केवल खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है, बल्कि राज्य की समृद्ध खानपान संस्कृति की पहचान भी है। खास तौर पर त्योहारों के सीजन में इसकी मांग बाजार में काफी बढ़ जाती है। बालोद कलेक्टोरेट परिसर में चलने वाले बिहान समूह के कैंटीन में भी छत्तीसगढ़ी पारंपरिक मिठाई अरसा की भारी मांग बनी रहती है। लंबे समय से अरसा तैयार कर रहीं सेवती ठाकुर ने इस मिठाई को बनाने का बहुत ही आसान तरीका साझा किया है।
तैयार करने की पूरी विधि और सामग्री
सेवती ठाकुर के बताए अनुसार, इस पारंपरिक पकवान को बनाने की शुरुआत चावल को भिगोने से होती है। सबसे पहले चावल को लगभग तीन घंटे के लिए पानी में डुबोकर रखना पड़ता है। इसके बाद चावल को पानी से बाहर निकालकर पूरी तरह सुखाया जाता है। जब चावल अच्छी तरह सूख जाते हैं, तब उन्हें दरदरा पीस लिया जाता है। इसके साथ ही एक अलग बर्तन या कड़ाही में गुड़ को लेकर उसका पाक तैयार किया जाता है। एक किलो चावल से अरसा तैयार करने के लिए करीब आधा किलो गुड़ की आवश्यकता होती है। जब गुड़ का पाक सही तरह से तैयार हो जाता है, तब उसमें पिसे हुए चावल के पाउडर को मिलाया जाता है और दोनों सामग्रियों को अच्छी तरह गूंथ लिया जाता है।
पकाने का तरीका और स्वाद बढ़ाने के टिप्स
मिश्रण तैयार होने के बाद इसके छोटे-छोटे आकार के अरसे बनाए जाते हैं। इन टुकड़ों को गर्म तेल में डाला जाता है और लगभग पांच मिनट तक अच्छी तरह पकाया जाता है। इस तरह बेहद कम समय में लजीज अरसा बनकर पूरी तरह तैयार हो जाता है। इस पारंपरिक मिठाई के स्वाद और उसकी भीनी खुशबू को और बढ़ाने के लिए इसमें सौंफ और तिल भी मिलाए जा सकते हैं। इन अतिरिक्त सामग्रियों से पकवान का जायका और भी ज्यादा बढ़ जाता है। इस मिठाई की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सही ढंग से बनाए जाने और सुरक्षित रखे जाने पर अरसा करीब 10 से 15 दिनों तक बिल्कुल खराब नहीं होता है।
सांस्कृतिक महत्व और त्योहारों पर मांग
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में अरसा हर बड़े त्योहार का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। रक्षाबंधन, होली और दीपावली जैसे पावन पर्वों पर प्रदेश के तमाम परिवार इसे अपने घरों में खुद ही तैयार करते हैं। वहीं हरतालिका तीज जैसे आयोजनों के दौरान इसकी डिमांड में और भी इजाफा देखा जाता है। इस प्रकार अरसा केवल एक सामान्य मिठाई मात्र नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की पारंपरिक विरासत और उत्सवों की मिठास को जीवित रखने वाला एक खास पकवान है।



















