बचपन के दिनों में स्कूल की घंटी बजते ही बाहर बिकने वाली छोटी-मोटी खाने-पीने की चीजें किसी बड़े तोहफे से कम नहीं लगती थीं। टोकरी में रखे छोटे और बेहद प्यारे समोसे पर नजर पड़ते ही मुंह में पानी आ जाता था। कुरकुरे स्वाद और जेब के अनुकूल कीमत के चलते यह नाश्ता दिल और पेट दोनों को खुश कर देता था। समय के साथ भले ही कई पुरानी चीजें बाजार से गायब हो चुकी हैं, लेकिन बिहार की राजधानी पटना में आज भी एक ऐसा ठिकाना है जहां यह जायका पूरी शान से जिंदा है।
तीन पीढ़ियों का सफर और पारिवारिक परंपरा
पटना में राजेश कुमार का परिवार आज भी इसी पारंपरिक अंदाज में मिनी समोसे तैयार करता है। इस खानदानी कारोबार की शुरुआत उनके दादाजी के दौर में हुई थी। दादाजी के बाद उनके पिता ने इस काम को आगे बढ़ाया और अब राजेश खुद इस विरासत को संभाल रहे हैं। यह परिवार इस व्यवसाय को चलाने वाली तीसरी पीढ़ी है, जिसमें अब राजेश के बेटे भी हाथ बंटाते हैं। इस तरह दशकों से यह स्वाद पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।
कीमत का सफर और छोटा आकार
मौजूदा समय में इस एक मिनी समोसे की कीमत पांच रुपये है, लेकिन यह सफर इस आंकड़े से शुरू नहीं हुआ था। राजेश बताते हैं कि शुरुआती दौर में यह समोसा महज दस पैसे प्रति पीस के हिसाब से बिकता था। वक्त बीतने के साथ इसकी कीमत बीस पैसे हुई और धीरे-धीरे बढ़ती हुई आज पांच रुपये तक पहुंच गई है। बाजार में भारी-भरकम और बड़े आकार के समोसों की भरमार के बीच इस मिनी समोसे का छोटा रूप ही इसकी सबसे बड़ी यूनीक पहचान है। राजेश का मानना है कि आकार छोटा होने की वजह से इसका जायका बिल्कुल अलग और अनोखा आता है, जिसे ग्राहक चाव से खाते हैं।
घर का बना मसाला और पारिवारिक मेहनत
इस लजीज समोसे की खूबी इसके मसालों में छिपी है, जिन्हें परिवार खुद अपने हाथों से तैयार करता है। इन मसालों में मुख्य रूप से हरी मिर्च और हींग का इस्तेमाल किया जाता है। खास बात यह है कि स्वाद की एकरूपता बनाए रखने के लिए बाहर से किसी मजदूर को नहीं रखा जाता है। करीब दस से बारह सदस्यों के इस परिवार में से चार-पांच लोग मिलकर समोसे बनाने के काम को संभालते हैं। इस टीम में राजेश के साथ उनकी मां और उनके बेटे भी पूरी मुस्तैदी से शामिल रहते हैं।
स्कूल के दिनों से जुड़ा पुराना नाता
इस छोटे समोसे की सबसे बड़ी पहचान स्कूली बच्चों और शैक्षणिक संस्थानों से जुड़ी हुई है। राजेश की दुकान से तैयार होने वाले समोसे विशेष रूप से अलग-अलग स्कूलों के बाहर बेचे जाते हैं। चूंकि यह दुकान सेंट जोसेफ कॉन्वेंट स्कूल के नजदीक स्थित है, इसलिए स्कूल के बाहर इसकी बिक्री का इतिहास बहुत पुराना है। राजेश के मुताबिक उनके दादाजी भी इसी तरह स्कूलों के बाहर यह नाश्ता बेचा करते थे, जिसे बाद में उनके पिता ने और अब उनकी खुद की पीढ़ी आगे बढ़ा रही है।
दिग्गजों और आम लोगों की पसंद
राजेश का दावा है कि उनके यहां का समोसा केवल आम बच्चों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि पटना के कई बड़े डॉक्टर, नेता और प्रतिष्ठित लोग इसका लुत्फ उठा चुके हैं। जब राजनीतिक हस्तियों की बात आती है, तो उनका कहना है कि लालू यादव की बेटियां जब सेंट जोसेफ कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाई करती थीं, तब वे भी इस मिनी समोसे का स्वाद चख चुकी हैं। इसके अलावा आज भी शहर के कई नामी लोग जब अपनी बेटियों को स्कूल से लेने आते हैं, तो वे इस जायके को जरूर चखते हैं।
दही की चटनी और दुकान का पता
राजेश की इस दुकान पर समोसा सुबह दस बजे से लेकर शाम चार बजे तक उपलब्ध रहता है। इस समोसे के साथ मिलने वाली दही की चटनी इसका स्वाद कई गुना बढ़ा देती है। यदि कोई भी इस पारंपरिक मिनी समोसे का स्वाद लेना चाहे, तो उसे अशोक राजपथ पर पिलर नंबर ग्यारह के सामने वाली गली में जाना होगा। यहीं पर राजेश जी की यह प्रसिद्ध दुकान स्थित है, जहां हर उम्र के लोग इसका आनंद उठाने पहुंचते हैं।



















