मानसून के महीने शुरू होते ही सिरोही जिले में त्योहारी मिठास का दौर चरम पर पहुंच जाता है। जुलाई से सितंबर के बीच पड़ने वाले प्रमुख त्योहारों के अवसर पर पूरे क्षेत्र में रबड़ी घेवर की मांग सबसे ज्यादा देखी जा रही है। विशेष रूप से रक्षाबंधन, जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर हर घर में इस पारंपरिक मिठाई को बेहद पसंद किया जाता है। सिरोही जिला मुख्यालय के साथ-साथ आबू रोड और माउंट आबू की सैर पर आने वाले गुजराती पर्यटक भी इस राजस्थानी स्वाद का आनंद लेने से पीछे नहीं हटते हैं।
सिरोही और आबू क्षेत्र में रबड़ी घेवर की भारी मांग
त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही सिरोही शहर की तमाम मिष्ठान दुकानों पर घेवर की विविध वैरायटी सजा दी गई हैं। स्थानीय हलवाई मोहनलाल के अनुसार इस पूरे इलाके में राजस्थानी रबड़ी घेवर की लोकप्रियता सबसे अधिक रहती है। इस खास मिठाई की खासियत इसका दोहरा टेक्सचर है। इसके निचले हिस्से में करकरी जालीदार परत होती है, जिसके ऊपर गाढ़ी मलाईदार रबड़ी की परत बिछाई जाती है। इसके उपरांत काजू, बादाम और अन्य सूखे मेवों की टॉपिंग इस मिठाई के स्वाद और आकर्षण को कई गुना बढ़ा देती है।
पारंपरिक रबड़ी और केसरिया चाशनी तैयार करने की प्रक्रिया
रबड़ी घेवर को तैयार करने के लिए सबसे पहले विशेष प्रकार की रबड़ी बनाई जाती है। इसके लिए ताजा दूध को बड़ी कढ़ाई में डालकर लगातार उबाला जाता है। उबालने के दौरान बर्तन के किनारों पर जमने वाली मलाई को खुरचकर अलग किया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि दूध उबलकर अपनी मूल मात्रा का महज एक तिहाई न रह जाए। इसके बाद इसमें स्वादानुसार चीनी और कुटी हुई इलायची मिलाई जाती है। पूरी तरह तैयार होने के पश्चात रबड़ी को ठंडा करने के लिए फ्रिज में रख दिया जाता है।
घेवर का आधार तैयार करने से पहले चीनी की चाशनी बनाई जाती है। इसके लिए चीनी की कुल मात्रा से ठीक आधा पानी मिलाकर मिश्रण को तब तक पकाया जाता है जब तक चीनी पानी में पूरी तरह घुल न जाए। चाशनी के अच्छी तरह उबल जाने के बाद इसमें बेहतरीन सुगंध और रंग के लिए इलायची पाउडर तथा केसर की पंखुड़ियां मिलाई जाती हैं।
जालीदार घेवर की सिकाई और रबड़ी की परत चढ़ाने का तरीका
घेवर का मुख्य घोल तैयार करना एक विशेष कला मानी जाती है। इसके लिए सबसे पहले शुद्ध देसी घी को बर्फ के टुकड़ों के साथ अच्छी तरह फेंटा जाता है ताकि वह मक्खन जैसी मुलायम स्थिति में आ जाए। इसके बाद इसमें मैदा और एकदम ठंडा दूध मिलाया जाता है। बाद में आवश्यकतानुसार पानी और थोड़ा सा नींबू का रस डालकर पतला घोल तैयार किया जाता है। इस घोल को गर्म देसी घी या तेल की कढ़ाई में सांचे की मदद से चम्मच अथवा सॉस बोतल की धार बनाकर गोल आकार में डाला जाता है।
जब घेवर चारों तरफ से अच्छी तरह सिक जाता है और सांचे के किनारों को छोड़कर सुनहरा दिखाई देने लगता है, तब इसे सावधानीपूर्वक कढ़ाई से बाहर निकाल लिया जाता है। इसके पश्चात इस पर हल्की गुनगुनी चाशनी डाली जाती है ताकि चाशनी भीतर तक समा जाए। अंत में इसके ऊपर पहले से तैयार ठंडी रबड़ी की एक समान लेयर लगाई जाती है। रबड़ी की परत हल्की सूखने के बाद इस पर बारीक कटे काजू और बादाम सजाकर बिक्री के लिए पेश किया जाता है।
बाजार में ₹400 से ₹900 प्रति किलोग्राम तक के दाम
सिरोही जिले में इस सीजन के दौरान रबड़ी घेवर की मांग इतनी व्यापक होती है कि लगभग हर छोटी-बड़ी मिष्ठान दुकान पर यह आसानी से उपलब्ध हो जाता है। जुलाई से सितंबर तक बिकने वाली मिठाइयों में यह प्रमुख स्थान रखता है। वर्तमान में स्थानीय बाजारों में रबड़ी घेवर की बिक्री ₹400 से ₹900 प्रति किलोग्राम के भाव से हो रही है। कीमत अलग-अलग गुणवत्ता, रबड़ी की सघनता और इस्तेमाल की गई सामग्री के आधार पर तय होती है। हालांकि दाम अधिक होने के बावजूद लोग इस पारंपरिक राजस्थानी मिठाई को उत्साहपूर्वक खरीद रहे हैं।



















