वडोदरा में नवरात्रि की रात नाबालिग से गैंगरेप, अदालत ने पांचों दोषियों को दी उम्रकैदत्रिपुरा विधानसभा से कांग्रेस विधायक सुदीप रॉय बर्मन एक दिन के लिए निलंबित, डीजीपी के सुसाइड नोट पर उठाया था सवालफिरोजाबाद में सीएम ग्रिड योजना की सुस्त रफ्तार, छह महीने बाद भी रसूलपुर सड़क निर्माण अधर मेंबेहतरीन मैगसेफ फोन ग्रिप्स जो आपके हाथ से फिसलने नहीं देंगे फोनअमेरिकी डॉलर इंडेक्स में 99.75 के करीब रुकावट, जानें EUR/USD, गोल्ड और डीजल के ताजा टेक्निकल संकेतजैक्सन होल में फेड के सख्त संकेत से एशियाई मुद्राओं पर बना दबाव, डॉलर में उछालराजस्थान के नाथद्वारा निकाय चुनाव में आप ने खेला ऐतिहासिक दांव, किन्नर प्रत्याशी सुनीता बाई मैदान में उतरींगृह मंत्रालय की साइबर इकाई ने फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर सक्रिय अश्लील APK मालवेयर को लेकर जारी की चेतावनीजापानी वायुसेना का ऐतिहासिक कदम, पहली बार भारत की धरती पर उतरेंगे F-2 लड़ाकू विमानफेड ब्याज दर में बढ़ोतरी की आशंका और AI मूल्यांकन जोखिम के बीच NRI निवेशकों को पोर्टफोलियो बदलने की सलाह
पेठा के शहर आगरा में सावन आते ही बढ़ा जालीदार घेवर का क्रेज, जानें इसके इतिहास से रेसिपी तक सबकुछखानपान
30 अग॰ 2026, 1:16 pm (1 दिन पहले)· 2

पेठा के शहर आगरा में सावन आते ही बढ़ा जालीदार घेवर का क्रेज, जानें इसके इतिहास से रेसिपी तक सबकुछ

ताज नगरी आगरा में पेठा के साथ ही तीज-सावन के महीनों में पारंपरिक मिठाई घेवर की जबर्दस्त मांग देखने को मिल रही है। राजस्थान से शुरू हुआ यह जालीदार मिष्ठान अब आगरा के त्योहारों का अहम हिस्सा बन चुका है।

ऐतिहासिक इमारतों के लिए दुनिया भर में मशहूर ताज नगरी आगरा अपने लज़ीज खानपान और अनूठे स्वादों के लिए भी जानी जाती है। आगरा की सबसे प्रमुख मिठाई पहचान पेठा है, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने जिले के एक प्रमुख पारंपरिक उत्पाद के रूप में आधिकारिक दर्जा दिया है। हालांकि, मानसून और त्योहारों की दस्तक के साथ ही शहर के मिठाई बाजारों का पूरा नजारा बदल जाता है। सावन, हरियाली तीज और रक्षाबंधन के आगमन के साथ ही आगरा में प्रसिद्ध जालीदार मिठाई 'घेवर' की मांग में भारी उछाल दर्ज किया जाता है। गोल आकार, जालीदार संरचना और चाशनी में डूबे इस मीठे व्यंजन का खुमार सिर्फ सावन तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि सितंबर और अक्टूबर के महीनों तक बाजारों में अपनी छाप छोड़े रहता है।

राजस्थान के तपते रेगिस्तान से आगरा के बाजारों तक का सफर

घेवर भले ही आज पूरे उत्तर भारत के त्योहारों की शान बन चुका है, लेकिन इसकी जड़ें मुख्य रूप से राजस्थान की पारंपरिक खानपान संस्कृति से जुड़ी हुई हैं। खाद्य विशेषज्ञों और इतिहासकारों के अनुसार, शुष्क और अत्यधिक गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में आसानी से मिलने वाली और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली सामग्री से इस खास मिठाई का निर्माण किया गया था। समय बीतने के साथ-साथ यह व्यंजन राजस्थान की सीमाओं को पार करता हुआ दिल्ली, पूरे उत्तर प्रदेश और खास तौर पर आगरा के पाक कला परिदृश्य में रच-बस गया।

ये भी पढ़ें

वर्तमान समय में घेवर महज एक क्षेत्रीय मिष्ठान न रहकर उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक और सामाजिक पर्वों का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सावन और हरियाली तीज के पावन अवसर पर विवाहित बेटियों और बहनों को घेवर भेजने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। सुहावने मानसूनी मौसम और बारिश की बूंदों के बीच मिठाई की दुकानों पर उठने वाली घेवर की भीनी खुशबू हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है, जिसके कारण मिठाई विक्रेता दिन-रात इस जालीदार मिठाई को तैयार करने में जुटे रहते हैं।

जालीदार घेवर बनाने की रेसिपी और विशेष तकनीक

एकदम सटीक और क्रिस्पी जालीदार घेवर तैयार करना किसी कला से कम नहीं है, जिसमें सही तापमान और तकनीक की सबसे बड़ी भूमिका होती है। घेवर बनाने की शुरुआत तीन बुनियादी चीजों यानी मैदा, शुद्ध घी और बर्फ जैसे ठंडे पानी से की जाती है। कारीगर सबसे पहले शुद्ध घी को किसी बड़े बर्तन में हाथों से तब तक फेंटते हैं, जब तक वह पूरी तरह चिकना और सफेद न हो जाए। इसके बाद इसमें बेहद सावधानी के साथ थोड़ा-थोड़ा करके मैदा और एकदम ठंडा पानी मिलाया जाता है। इस घोल की कंसिस्टेंसी न बहुत ज्यादा गाढ़ी होनी चाहिए और न ही अत्यधिक पतली, क्योंकि इसका संतुलन ही घेवर का भविष्य तय करता है।

घेवर की प्रसिद्ध जालीदार बनावट पूरी तरह से घोल के सही गाढ़ेपन और गर्म तेल या घी में उसके गिरने के तरीके पर निर्भर करती है। हलवाई इसके लिए एक गहरे और गोल बर्तन का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें पर्याप्त मात्रा में शुद्ध घी या रिफाइंड तेल को बहुत तेज आंच पर गर्म किया जाता है। जब तेल पूरी तरह गर्म हो जाता है, तब पतले घोल को काफी ऊंचाई से धीरे-धीरे तेल के ठीक बीचों-बीच धारा बनाकर डाला जाता है।

जैसे ही ठंडा घोल उबलते हुए गर्म घी में गिरता है, उसमें तुरंत उभार आता है और वह चारों तरफ फैलकर छोटे-छोटे बारीक छेद बनाने लगता है। यही प्रक्रिया लगातार कई बार दोहराई जाती है, जिससे घेवर की परत दर परत जालीदार संरचना तैयार होती है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान घेवर के बीचों-बीच एक लकड़ी की मदद से खाली जगह बनाई रखी जाती है, जो इसे इसका पारंपरिक चक्र जैसा आकार देती है।

चाशनी का स्वाद और घेवर के आधुनिक रूप

जब घेवर का ढांचा सुनहरा और कुरकुरा हो जाता है, तो उसे तेल से बाहर निकालकर चीनी से तैयार की गई एक तार की चाशनी में डुबोया जाता है। कई जगह इसके ऊपर से गरम चाशनी डाली जाती है और फिर इसे कुछ देर के लिए जालीदार स्टैंड पर रख दिया जाता है ताकि मिठास इसके हर बारीक छेद के अंदर तक अच्छी तरह समा जाए। इसके बाद इसके ऊपरी हिस्से को बारीक कटे बादाम, पिस्ता और केसर की पत्तियों से सजाया जाता है। यही पारंपरिक सादा घेवर है, जिसकी बिक्री त्योहारों के दौरान सबसे ज्यादा होती है।

बदलते समय के साथ मिठाई कारीगरों ने घेवर के स्वाद में भी कई नए प्रयोग किए हैं। मिठाई कारीगर सचिन ने बताया कि आधुनिक दौर में ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए चॉकलेट घेवर, पनीर घेवर और तरह-तरह के ड्राई फ्रूट्स टॉपिंग वाले घेवर बाजार में उतारे गए हैं। इनके अलावा पारंपरिक प्रयोगों में मलाई घेवर बेहद खास है, जिसमें घेवर के ऊपर मीठी मलाई की एक मोटी परत लगाई जाती है। वहीं रबड़ी घेवर में गाढ़ी पकी हुई रबड़ी की परत इसके स्वाद को कई गुना बढ़ा देती है।

बाजार में मावा घेवर, केसर घेवर और पूरी तरह मेवों से ढके ड्राई फ्रूट घेवर भी लोगों के बीच बेहद पसंद किए जा रहे हैं। जहां रबड़ी और मलाई वाले घेवर युवाओं और मिठाई प्रेमियों की पहली पसंद बने हुए हैं, वहीं चॉकलेट और पनीर जैसे नए स्वाद भी अपनी जगह बना रहे हैं। आगरा में पेठा बेशक शहर की सबसे बड़ी मिठाई पहचान के रूप में स्थापित है, लेकिन मानसून आते ही घेवर अपनी खास मिठास से पूरे बाजार पर छा जाता है।

सवाल-जवाब

घेवर की शुरुआत कहां से हुई थी?
घेवर की शुरुआत राजस्थान की पारंपरिक खानपान संस्कृति से हुई थी, जिसे वहां की शुष्क और गर्म जलवायु के अनुकूल तैयार किया गया था।
घेवर की जालीदार बनावट कैसे बनती है?
बर्फ जैसे ठंडे पानी, मैदा और घी के सही कंसिस्टेंसी वाले घोल को बहुत तेज गर्म घी या तेल में ऊंचाई से धीरे-धीरे गिराने पर यह जालीदार बनावट बनती है।
सावन में आगरा के बाजारों में घेवर की कौन-कौन सी वैरायटी मिलती हैं?
बाजारों में पारंपरिक सादा, मलाई, रबड़ी, मावा, केसर, ड्राई फ्रूट के साथ-साथ चॉकलेट और पनीर घेवर जैसी नई वैरायटी भी मिलती हैं।
आगरा में घेवर की मांग कब से कब तक रहती है?
घेवर की मांग सावन, हरियाली तीज और रक्षाबंधन से शुरू होकर सितंबर और अक्टूबर तक बनी रहती है।
तीज के मौके पर घेवर से जुड़ी क्या परंपरा है?
हरियाली तीज के अवसर पर कई परिवारों में अपनी विवाहित बेटियों और बहनों के घर घेवर भेजने की पुरानी परंपरा रही है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR