लोकप्रिय फूड डिलीवरी ऐप्स के जरिए खाना ऑर्डर करते समय अक्सर आसमान छूते दाम और तरह-तरह के शुल्क जेब पर भारी पड़ते हैं। प्रमुख कंपनियां रेस्टोरेंट से हर ऑर्डर पर तगड़ा कमीशन वसूलती हैं, जिसका बोझ अंततः ग्राहकों पर पड़ता है और खाने-पीने की चीजों के दाम काफी बढ़ जाते हैं।
जो प्लेटफॉर्म कभी सुविधा का जरिया लगते थे, वे अब महंगे सौदे जैसे प्रतीत होने लगे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए ओलो नाम का एक नया फूड डिलीवरी ऐप एंड्रॉइड और आईओएस प्लेटफॉर्म पर आज देश भर में अपनी शुरुआत करने जा रहा है।
ओलो के संस्थापक और सीईओ नोआ ग्लास का कहना है कि रेस्टोरेंट मार्केटप्लेस को 20 से 30 प्रतिशत तक कमीशन दे रहे हैं और इसी भरपाई के लिए वे मेनू के दाम बढ़ा देते हैं। इस नए ऐप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह इस तरह के बढ़े हुए मेनू प्राइज मॉडल पर काम नहीं करता है।
ओलो पर रेस्टोरेंट ग्राहकों से वही कीमत वसूलते हैं जो उनके स्टोर पर लागू होती है, और इस ऐप का सर्विस चार्ज केवल फ्लैट 5 प्रतिशत है। हालांकि, ग्राहकों को डिलीवरी के लिए अलग से शुल्क का भुगतान करना जारी रखना होगा।
भले ही आप सीधे रेस्टोरेंट से ऑर्डर करके कुछ पैसे बचा सकते हैं, लेकिन नोआ ग्लास ओलो को उन लोगों के लिए एक बेहतर विकल्प के रूप में देखते हैं जो बिना छिपे हुए शुल्कों और inflated कीमतों के एक आसान फूड-डरिलवरी अनुभव चाहते हैं। लॉन्च के वक्त इस ऐप पर 250 ब्रांड्स उपलब्ध हैं और आने वाले समय में इसे और विस्तार देने की योजना है।
यह नया ऐप आधुनिक फूड-ऑर्डरिंग प्लेटफॉर्म्स की एक और बड़ी झुंझलाहट यानी लगातार आने वाले विज्ञापनों से भी मुक्ति दिलाता है। स्पॉन्सरड लिस्टिंग के जरिए खोजबीन में बाधा आने के बजाय, ओलो आपके आस-पास के रेस्टोरेंट की एक साफ-सुथरी सूची और आपके पिछले पसंदीदा ऑर्डर्स को दोबारा मंगाने का आसान विकल्प दिखाता है।
ओलो नाम भले ही नया लगे, लेकिन इस कंपनी के सॉफ्टवेयर से आपका पाला पहले भी पड़ चुका होगा। भले ही कंज्यूमर-फेसिंग फूड डिलीवरी ऐप नया हो, लेकिन नोआ ग्लास इस डिजिटल ऑर्डरिंग स्पेस में दो दशकों से अधिक समय से सक्रिय हैं। उन्होंने 2005 में आईफोन के आने से पहले मोबो नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया था, जो टेक्स्ट मैसेज के जरिए कॉफी शॉप के ऑर्डर लेने में काफी इनोवेटिव था।
समय के साथ मोबो का नाम बदलकर ओलो कर दिया गया क्योंकि यह धीरे-धीरे रेस्टोरेंट के लिए एक पर्दे के पीछे काम करने वाला सॉफ्टवेयर प्रदाता बन गया, जो उनके डिजिटल मेनू को मैनेज करने में मदद करता था। आज ओलो का दावा है कि इसके जरिए हर दिन 3.5 मिलियन से अधिक ऑर्डर प्रोसेस किए जाते हैं। ये ऑर्डर डेस्कटॉप साइट्स, स्मार्टफोन और कियोस्क टचस्क्रीन के माध्यम से पूरे होते हैं।
बाजार में जमे-जमाए दिग्गजों को छोड़कर ग्राहकों को ओलो पर लाना आसान नहीं होगा, क्योंकि लोग वर्षों से उन्हीं पुराने ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके बावजूद, नोआ ग्लास रेस्टोरेंट इंडस्ट्री में अपनी मजबूत पकड़ और प्रमुख डिलीवरी ऐप्स की सबसे बड़ी कमजोरी यानी बढ़े हुए दामों पर निशाना साधने के इरादे के साथ मैदान में उतरे हैं।


















