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2026 में ब्रांड्स की असली पहचान बनेगी ईमानदार पर्यावरण जिम्मेदारी, दिखावे से नहींगाइड
2 घंटे पहले· 2

2026 में ब्रांड्स की असली पहचान बनेगी ईमानदार पर्यावरण जिम्मेदारी, दिखावे से नहीं

2026 में ग्राहक अब सिर्फ विज्ञापनों के दावों पर भरोसा नहीं करते, वे ब्रांड्स से असली सस्टेनेबिलिटी एक्शन चाहते हैं। जानिए ग्रीन मार्केटिंग क्या है, यह क्यों जरूरी है और इसे सही तरीके से कैसे लागू करें।

रविकाश गुप्तारविकाश गुप्तावरिष्ठ संवाददाता 10 मिनट पढ़ें AI के लिए
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2026 में किसी भी ब्रांड के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि वह पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार है, उसे यह साबित भी करना होगा। ग्रीन मार्केटिंग का मतलब है अपने प्रोडक्ट्स और सेवाओं को उनके असली पर्यावरणीय फायदों के आधार पर प्रमोट करना, न कि सिर्फ दिखावटी दावों के जरिए। भारत में उपभोक्ता और कंपनियां दोनों अब उम्मीद करते हैं कि ब्रांड्स सोर्सिंग, प्रोडक्शन, पैकेजिंग और अपनी कम्युनिकेशन तक, हर स्तर पर पर्यावरण को लेकर जिम्मेदारी दिखाएं। यह लेख बताता है कि ग्रीन मार्केटिंग असल में क्या है, यह 2026 में क्यों मायने रखती है, कौन सी रणनीतियां काम करती हैं और एक कारगर ग्रीन मार्केटिंग प्लान कैसे बनाया जाए।

ग्रीन मार्केटिंग असल में है क्या

ग्रीन मार्केटिंग का सीधा मतलब है अपने बिजनेस, प्रोडक्ट्स और सेवाओं को उनके पर्यावरणीय फायदों के आधार पर प्रमोट करना। इसका फोकस इस बात पर होता है कि आप पर्यावरण को होने वाला नुकसान कैसे कम करते हैं और संसाधनों का इस्तेमाल कितनी जिम्मेदारी से करते हैं, चाहे वह कम उत्सर्जन हो, कम कचरा हो, ऊर्जा की बचत हो या टिकाऊ सोर्सिंग।

ग्रीन मार्केटिंग सिर्फ विज्ञापन तक सीमित नहीं है। यह किसी भी प्रोडक्ट या सेवा के पूरे जीवनचक्र को कवर करती है, जैसे:

  • ऐसा प्रोडक्ट डिजाइन जिसमें कम या सुरक्षित मटीरियल इस्तेमाल हों
  • ऐसी पैकेजिंग जो प्लास्टिक कम करे या रीसाइक्लिंग को बढ़ावा दे
  • ऐसी प्रोडक्शन प्रक्रिया जो ऊर्जा या पानी की बचत करे
  • सस्टेनेबिलिटी को लेकर अपनी कोशिशों के बारे में ईमानदार और साफ बातचीत

असली मकसद यह है कि आप जो कहें और जो करें, दोनों में तालमेल हो। जब कोई ब्रांड ग्रीन मार्केटिंग को सही तरीके से अपनाता है, तो इससे ग्राहकों को सही फैसला लेने में मदद मिलती है, साथ ही ब्रांड की लंबे समय की पर्यावरणीय और बिजनेस परफॉर्मेंस भी बेहतर होती है।

2026 में ग्रीन मार्केटिंग इतनी जरूरी क्यों है

2026 में ग्रीन मार्केटिंग की अहमियत इसलिए बढ़ गई है क्योंकि पर्यावरण को लेकर जागरूकता अब सिर्फ एक अच्छी बात नहीं रह गई, यह एक साफ उम्मीद बन चुकी है। भारतीय उपभोक्ता अब यह भी सवाल पूछते हैं कि कोई ब्रांड अपना कच्चा माल कहां से लाता है, कचरे का प्रबंधन कैसे करता है और उत्सर्जन कैसे कम करता है। वे उन्हीं कंपनियों को तवज्जो देते हैं जो असली कोशिश और निरंतरता दिखाती हैं, सिर्फ मार्केटिंग के दावों को नहीं।

इसमें नियम कायदों की भूमिका भी बढ़ गई है। प्लास्टिक के इस्तेमाल, उत्सर्जन और ईएसजी यानी एनवायरनमेंटल, सोशल एंड गवर्नेंस रिपोर्टिंग को लेकर सख्त नियम कंपनियों को जिम्मेदारी से काम करने और उसे साफ तरीके से बताने के लिए मजबूर करते हैं। ग्रीन मार्केटिंग कंपनियों को नियमों का पालन करने में मदद करती है, साथ ही यह भी दिखाती है कि वे सस्टेनेबिलिटी को गंभीरता से लेती हैं।

ग्राहकों की पसंद भी लगातार बदल रही है। कई खरीदार अब उन्हीं ब्रांड्स को चुनते हैं जो उनकी अपनी सोच से मेल खाते हों और समाज के लिए सकारात्मक योगदान दें। ग्रीन मार्केटिंग अपनाने से कोई भी ब्रांड बाजार में प्रतिस्पर्धी बना रहता है, लंबे समय का भरोसा बनाता है और सिर्फ कीमत या सुविधा से आगे बढ़कर ग्राहकों से गहरा जुड़ाव बनाता है।

ग्रीन मार्केटिंग तभी काम करती है जब पर्यावरण को लेकर किए गए दावे असली हों। बढ़ा-चढ़ाकर या बिना सबूत के किए गए दावे, जिन्हें ग्रीनवॉशिंग कहा जाता है, ब्रांड की साख को नुकसान पहुंचा सकते हैं और नियामकों की कार्रवाई भी बुला सकते हैं।

ग्रीन मार्केटिंग के असली फायदे

  • जिम्मेदार व्यवहार से ग्राहकों का भरोसा बनता है: जब सस्टेनेबिलिटी को लेकर आपके दावे असल में आपकी गतिविधियों से मेल खाते हैं, तो ग्राहक आपके ब्रांड पर भरोसा करने लगते हैं। इससे उन्हें यह भरोसा मिलता है कि उनकी खरीदारी जिम्मेदार और नैतिक कारोबार का समर्थन कर रही है।
  • पर्यावरण के प्रति सजग ग्राहकों को आकर्षित करती है: साफ और ईमानदार सस्टेनेबिलिटी कोशिशें उन ग्राहकों से जोड़ती हैं जो सक्रिय रूप से इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट और सेवाएं ढूंढते हैं। ऐसे खरीदार उन्हीं ब्रांड्स को पसंद करते हैं जो पर्यावरण को लेकर सच में चिंतित दिखते हैं, सिर्फ प्रचार करने वाले नहीं।
  • ग्राहक वफादारी और दोबारा खरीदारी बढ़ाती है: ग्राहक उन्हीं ब्रांड्स के प्रति वफादार रहते हैं जो उनकी सोच से मेल खाते हैं। जब कोई ब्रांड लगातार अपनी सस्टेनेबिलिटी प्रतिबद्धताओं पर अमल करता है, तो ग्राहक बार-बार लौटते हैं क्योंकि वे खुद को उस ब्रांड के मकसद से जुड़ा महसूस करते हैं।
  • प्रोडक्ट और कामकाज में नई सोच को बढ़ावा देती है: सस्टेनेबिलिटी पर फोकस करने से कंपनियां प्रोडक्ट डिजाइन, मटीरियल और प्रोसेस को नए सिरे से सोचती हैं। इससे अक्सर कामकाज स्मार्ट बनता है, दक्षता बढ़ती है और लंबे समय में लागत भी घटती है।
  • पर्यावरण से जुड़े नियमों का पालन करने में मदद करती है: जब ग्रीन मार्केटिंग असली पर्यावरणीय गतिविधियों पर आधारित हो, तो बदलते पर्यावरणीय कानूनों और रिपोर्टिंग मानकों का पालन करना आसान हो जाता है, जिससे समय के साथ नियामकीय जोखिम भी घटता है।

2026 में कारगर ग्रीन मार्केटिंग रणनीतियां

टिकाऊ प्रोडक्ट और पैकेजिंग डिजाइन

किसी भी ग्रीन मार्केटिंग कोशिश की नींव प्रोडक्ट और पैकेजिंग से जुड़े फैसलों में होती है। ग्राहक यह भी नोटिस करते हैं कि आप क्या बनाते हैं और उसे कैसे पहुंचाते हैं।

  • जहां भी संभव हो, रीसाइकल्ड, रीसाइक्लेबल या बायोडिग्रेडेबल मटीरियल का इस्तेमाल करें
  • ज्यादा पैकेजिंग कम करें और साइज को इस तरह ऑप्टिमाइज़ करें कि कचरा और ट्रांसपोर्ट पर असर घटे
  • प्रोडक्ट के पूरे जीवनचक्र में हुए सुधारों को सामने लाएं, जैसे कम ऊर्जा खपत या ज्यादा टिकाऊपन

पारदर्शी संवाद और जागरूकता

यूगव के एक सर्वे के मुताबिक 71% भारतीय उपभोक्ताओं ने माना है कि उन्हें ग्रीनवॉशिंग का सामना करना पड़ा है, ऐसे में ग्राहकों का भरोसा बेहद नाजुक है। ईमानदार संवाद भरोसा बनाता है और ब्रांड को ग्रीनवॉशिंग के जोखिम से भी बचाता है।

  • पर्यावरणीय असर और सुधारों के बारे में साफ और खास जानकारी साझा करें
  • सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी कोशिशों के बारे में ग्राहकों को समझाने के लिए ब्लॉग, वीडियो और सवाल-जवाब का इस्तेमाल करें
  • ऐसे अस्पष्ट या बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों से बचें जो भ्रामक लग सकते हैं

इको-फोकस्ड ब्रांडिंग और मैसेजिंग

ब्रांड की आवाज को हमेशा उसकी सस्टेनेबिलिटी वैल्यूज को लगातार दिखाना चाहिए।

  • ब्रांड मैसेजिंग को जिम्मेदार और नैतिक कार्यप्रणाली से जोड़ें
  • विज्ञापनों और कैंपेन में सस्टेनेबिलिटी से जुड़े थीम शामिल करें
  • ऐसी सरल और भरोसेमंद कहानियां बताएं जो पर्यावरण को लेकर सोचने वाले ग्राहकों को छू जाएं

कम्युनिटी की भागीदारी और साझेदारी

ग्रीन मार्केटिंग तब बेहतर काम करती है जब ग्राहक खुद को इसका हिस्सा महसूस करें।

  • भरोसेमंद पर्यावरणीय पहलों या स्थानीय संगठनों के साथ साझेदारी करें
  • ग्राहकों को रीसाइक्लिंग या संरक्षण से जुड़ी कोशिशों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करें
  • पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा देने वाले कैंपेन या इवेंट आयोजित करें

डिजिटल-फर्स्ट, पर्यावरण के अनुकूल प्रमोशन

डिजिटल चैनल संसाधनों के इस्तेमाल को कम करते हुए पहुंच बढ़ाने में मदद करते हैं।

  • कागज आधारित प्रमोशन को कम करने के लिए डिजिटल मार्केटिंग की तरफ बढ़ें
  • इको-मैसेजिंग की असरदारता बेहतर बनाने के लिए एंगेजमेंट डेटा को ट्रैक करें
  • फोकस्ड और मापने लायक ग्रीन कैंपेन चलाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें

व्यवहार में ग्रीन मार्केटिंग कैसी दिखती है

  • कंपोस्टेबल पैकेजिंग का इस्तेमाल: कई ब्रांड्स परंपरागत प्लास्टिक पैकेजिंग की जगह कंपोस्टेबल या पेपर आधारित विकल्प अपना रहे हैं। इससे लैंडफिल कचरा और प्लास्टिक प्रदूषण घटता है, साथ ही ऐसे ग्राहकों को भी आकर्षित करता है जो जिम्मेदार पैकेजिंग सक्रिय रूप से तलाशते हैं।
  • सोलर पावर्ड ऑपरेशन की तरफ बदलाव: कई कंपनियां छत पर सोलर पैनल लगा रही हैं या रिन्यूएबल एनर्जी सप्लायर से बिजली ले रही हैं। इससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटती है, बिजली की खपत से जुड़ा कार्बन उत्सर्जन कम होता है और लंबे समय में ऊर्जा लागत भी घटती है।
  • पारदर्शी सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट प्रकाशित करना: कई कारोबार अब उत्सर्जन, पानी के इस्तेमाल और कचरा घटाने से जुड़ा साफ और मापने लायक डेटा साझा करते हैं। इस पारदर्शिता से ग्राहकों को ब्रांड के असली पर्यावरणीय असर को समझने में मदद मिलती है और साख भी मजबूत होती है।
  • रीसाइक्लेबिलिटी के लिए प्रोडक्ट का दोबारा डिजाइन: प्रोडक्ट्स को अब कम तरह के मटीरियल और आसान बनावट के साथ फिर से डिजाइन किया जा रहा है। इससे रीसाइक्लिंग सुविधाओं के लिए मटीरियल को अलग करना और प्रोसेस करना आसान हो जाता है। नतीजतन, प्रोडक्ट का ज्यादा हिस्सा लैंडफिल में जाने के बजाय रीसाइकल हो पाता है, और प्रोडक्ट लंबे समय तक इस्तेमाल लायक भी बना रहता है।

ग्रीन मार्केटिंग में मुश्किलें और कमियां

  • टिकाऊ मटीरियल और प्रोसेस की लागत: इको-फ्रेंडली कच्चा माल, रिन्यूएबल एनर्जी और साफ-सुथरी प्रोडक्शन तकनीक में अक्सर शुरुआत में ज्यादा खर्च आता है। इससे कम बजट में काम करने वाले कारोबारों का शॉर्ट टर्म मार्जिन प्रभावित हो सकता है, भले ही लंबे समय में इससे बचत हो।
  • पर्यावरणीय दावों की पुष्टि करना जटिल: उत्सर्जन, कचरे में कमी या प्रोडक्ट के जीवनचक्र पर असर को सही तरीके से मापने के लिए भरोसेमंद डेटा, आंतरिक ट्रैकिंग सिस्टम और कभी-कभी थर्ड-पार्टी ऑडिट की जरूरत पड़ती है। कई कारोबार इस स्तर की मापतौल और दस्तावेजीकरण में संघर्ष करते हैं।
  • ग्राहकों के शक करने का जोखिम: आज के ग्राहक सस्टेनेबिलिटी से जुड़े दावों को पहले से ज्यादा गंभीरता से परखते हैं। अगर आपकी मैसेजिंग में स्पष्टता, डेटा या सबूत की कमी हो, तो ग्राहक आपकी नीयत पर शक कर सकते हैं और आपकी कोशिशों को ग्रीनवॉशिंग मान सकते हैं।
  • इको-ट्रांजिशन के लिए कामकाजी बदलाव जरूरी: हरित कार्यप्रणाली की तरफ बढ़ने के लिए अक्सर सोर्सिंग, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और आंतरिक कामकाज में बदलाव करने पड़ते हैं। इन बदलावों में समय, ट्रेनिंग और अलग-अलग टीमों के बीच तालमेल लगता है।

2026 के लिए ग्रीन मार्केटिंग प्लान कैसे बनाएं

  1. पर्यावरणीय लक्ष्य और मापदंड तय करें: शुरुआत साफ और हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्यों से करें, जैसे कचरा घटाना, ऊर्जा की खपत कम करना या रीसाइक्लेबिलिटी बढ़ाना। पहले से तय करें कि प्रगति कैसे मापी जाएगी, ताकि आपकी कोशिशें ट्रैक करने लायक और जवाबदेह रहें।
  2. मौजूदा कामकाज और प्रोडक्ट जीवनचक्र के असर का आकलन करें: अपनी सोर्सिंग, मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग और वितरण प्रक्रियाओं की समीक्षा करें ताकि पता चले कि आपका कारोबार सबसे ज्यादा पर्यावरणीय असर कहां डालता है। इस आकलन से आपको सबसे जरूरी बदलावों को प्राथमिकता देने में मदद मिलती है।
  3. प्रोडक्ट और प्रोसेस में टिकाऊ बदलाव लागू करें: ऐसे व्यावहारिक सुधार लाएं जो मुख्य कामकाज को बाधित किए बिना संसाधनों के इस्तेमाल, उत्सर्जन या कचरे को घटाएं। ऐसे बदलावों पर फोकस करें जो आपके कारोबार के लिए स्केलेबल और यथार्थवादी हों।
  4. पारदर्शी संवाद और इको-मैसेजिंग तैयार करें: बताएं कि आप कौन से कदम उठा रहे हैं, वे क्यों मायने रखते हैं और कहां सुधार अभी भी जारी है। भ्रम या बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों से बचने के लिए सरल और ईमानदार भाषा का इस्तेमाल करें।
  5. ग्राहकों की प्रतिक्रिया और सस्टेनेबिलिटी परफॉर्मेंस पर नजर रखें: पर्यावरणीय डेटा के साथ-साथ ग्राहकों की प्रतिक्रियाओं को नियमित रूप से ट्रैक करें। समय के साथ अपनी रणनीति को बेहतर बनाने और असर व साख दोनों मजबूत करने के लिए इन जानकारियों का इस्तेमाल करें।

पेमेंट प्लेटफॉर्म सस्टेनेबल ब्रांड्स की कैसे मदद करते हैं

रेज़रपे जैसे पेमेंट प्लेटफॉर्म भी कारोबारों को अपने कागज आधारित कामकाज को घटाने में मदद कर रहे हैं।

  • एक ही जगह पर सभी तरह के पेमेंट स्वीकार करने की सुविधा: रेज़रपे कारोबारों को कार्ड, यूपीआई, नेट बैंकिंग और वॉलेट के जरिए एक ही प्लेटफॉर्म पर पेमेंट स्वीकार करने देता है, जिससे कैश आधारित या कागज पर निर्भर प्रक्रियाओं पर निर्भरता घटती है।
  • ऑटोमेटेड इनवॉइसिंग और डिजिटल रिकॉर्ड: डिजिटल इनवॉइस और ऑटोमेटेड रिकंसिलिएशन से प्रिंटेड बिल कम होते हैं, साथ ही सटीक और ऑडिट के लिए तैयार रिकॉर्ड भी बने रहते हैं।
  • सेल्स और सस्टेनेबिलिटी ट्रैकिंग के लिए डैशबोर्ड इनसाइट्स: केंद्रीकृत डैशबोर्ड ट्रांजैक्शन और ट्रेंड्स पर नजर रखने की सुविधा देते हैं, जिससे कारोबार अपनी ग्रोथ ट्रैक करने के साथ-साथ डेटा आधारित सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों को भी सपोर्ट कर पाते हैं।
  • कागजी बिलिंग की जगह इको-फ्रेंडली पेमेंट लिंक: पेमेंट लिंक और डिजिटल चेकआउट प्रक्रियाएं भौतिक इनवॉइस की जगह लेती हैं, जिससे कलेक्शन तेज, साफ और पर्यावरण के प्रति ज्यादा जिम्मेदार बनता है।

निष्कर्ष

2026 में उन ब्रांड्स के लिए ग्रीन मार्केटिंग अब कोई विकल्प नहीं रह गई है जो प्रासंगिक और भरोसेमंद बने रहना चाहते हैं। ग्राहक अब सतही दावे नहीं, असली एक्शन चाहते हैं। असली ग्रीन मार्केटिंग की शुरुआत जिम्मेदार प्रोडक्ट डिजाइन, कुशल कामकाज और ईमानदार संवाद से होती है। पारदर्शिता साख बनाती है, वहीं लगातार नई सोच समय के साथ पर्यावरणीय असर घटाने में मदद करती है। इन कोशिशों के साथ-साथ रेज़रपे जैसे स्मार्ट डिजिटल टूल कागज का इस्तेमाल घटाकर, दक्षता बढ़ाकर और साफ-सुथरे वित्तीय कामकाज को संभव बनाकर टिकाऊ ग्रोथ में मदद करते हैं। जब सस्टेनेबिलिटी से जुड़े एक्शन और मैसेजिंग एक-दूसरे से मेल खाते हैं, तभी ग्रीन मार्केटिंग एक अस्थायी ट्रेंड नहीं बल्कि लंबे समय का बिजनेस फायदा बन जाती है।

इसका आप पर असर

  • व्यापारियों और ब्रांड्स के लिए: अगर आप कोई कारोबार चलाते हैं तो अब सिर्फ पैकेजिंग पर 'इको-फ्रेंडली' लिखना काफी नहीं, क्योंकि 71% ग्राहक पहले ही ग्रीनवॉशिंग का सामना कर चुके हैं और सख्त होते नियम व सजग ग्राहक बिना असली सबूत वाले दावों को अब आसानी से नकार सकते हैं।

सवाल-जवाब

ग्रीन मार्केटिंग किसे कहते हैं?
ग्रीन मार्केटिंग किसी प्रोडक्ट, सेवा या कारोबार को उसके असली पर्यावरणीय फायदों के आधार पर प्रमोट करने की प्रैक्टिस है।
ग्रीन मार्केटिंग से कारोबार को क्या फायदा होता है?
इससे ग्राहकों का भरोसा बनता है, पर्यावरण को लेकर सजग ग्राहक जुड़ते हैं और ब्रांड लॉयल्टी बढ़ती है, साथ ही यह नियमों के पालन और नई सोच को भी बढ़ावा देती है।
2026 में कौन सी ग्रीन मार्केटिंग रणनीतियां आम हैं?
टिकाऊ प्रोडक्ट व पैकेजिंग डिजाइन, पारदर्शी सस्टेनेबिलिटी कम्युनिकेशन, इको-फोकस्ड ब्रांडिंग, कम्युनिटी एंगेजमेंट और संसाधनों की बचत के लिए डिजिटल-फर्स्ट प्रमोशन आम रणनीतियां हैं।
कंपनियां ग्रीनवॉशिंग से कैसे बच सकती हैं?
सिर्फ वे ही दावे करें जो सत्यापित किए जा सकें, साफ डेटा का इस्तेमाल करें और मार्केटिंग मैसेज को असली कामकाज के साथ मिलाकर रखें।
क्या ग्रीन मार्केटिंग पारंपरिक मार्केटिंग से महंगी होती है?
इसमें शुरुआत में ज्यादा खर्च आ सकता है, लेकिन अक्सर यह दक्षता, मजबूत ग्राहक वफादारी और कम नियामकीय जोखिम के जरिए लंबे समय में बचत भी लाती है।
क्या छोटे कारोबार असरदार तरीके से ग्रीन मार्केटिंग अपना सकते हैं?
हां, छोटे कारोबार सरल और किफायती सस्टेनेबिलिटी कदमों से शुरुआत करके और अपने ग्राहकों को ईमानदारी से बताकर ग्रीन मार्केटिंग को कारगर तरीके से अपना सकते हैं।
भारत में कितने ग्राहकों ने ग्रीनवॉशिंग का सामना किया है?
यूगव के एक सर्वे के मुताबिक 71% भारतीय उपभोक्ताओं ने माना है कि उन्हें ग्रीनवॉशिंग का सामना करना पड़ा है।
रेज़रपे जैसे पेमेंट प्लेटफॉर्म सस्टेनेबिलिटी में कैसे मदद करते हैं?
रेज़रपे डिजिटल इनवॉइस, ऑटोमेटेड रिकंसिलिएशन और पेमेंट लिंक जैसी सुविधाएं देता है, जिससे कागज आधारित बिलिंग घटती है और वित्तीय कामकाज साफ-सुथरा बनता है।
रविकाश गुप्ता
लेखक के बारे मेंरविकाश गुप्तावरिष्ठ संवाददाता लखनऊ
विशेषज्ञताभारत समाचार, वैश्विक बिज़नेस, वित्तीय बाज़ार, क्रिप्टोकरेंसी, ब्लॉकचेन, शेयर बाज़ार विश्लेषण, कॉर्पोरेट न्यूज़, स्टार्टअप, आर्थिक रुझान, डिजिटल एसेट्स, निवेश अंतर्दृष्टि

रविकाश गुप्ता एक वरिष्ठ संवाददाता एवं संपादक हैं जो भारत की ख़बरों, वैश्विक बिज़नेस, वित्तीय बाज़ार और क्रिप्टोकरेंसी को कवर करते हैं। वे आर्थिक रुझानों, क्रिप्टो घटनाक्रमों और दुनियाभर की बड़ी बाज़ार-हलचल वाली घटनाओं पर रिपोर्ट करते हैं।

रविकाश गुप्ता एक वरिष्ठ संवाददाता एवं संपादक हैं जो भारत-केंद्रित रिपोर्टिंग और बिज़नेस, वित्तीय बाज़ार व क्रिप्टोकरेंसी की वैश्विक कवरेज में विशेषज्ञता रखते हैं। वे ब्रेकिंग न्यूज़, आर्थिक घटनाक्रम, कॉर्पोरेट मामले, शेयर बाज़ार, ब्लॉकचेन नवाचार और आधुनिक वित्तीय तंत्र को आकार देने वाले डिजिटल एसेट रुझान कवर करते हैं। स्पष्टता, विश्लेषण और समय पर रिपोर्टिंग पर मज़बूत ज़ोर के साथ रविकाश वैश्विक आर्थिक बदलावों, उभरती तकनीकों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और बदलते क्रिप्टो परिदृश्य की अंतर्दृष्टि देते हैं। उनका काम व्यापक आर्थिक रुझानों को वास्तविक बाज़ार असर से जोड़ता है और पाठकों को पारंपरिक वित्त व डिजिटल एसेट्स की तेज़ी से बदलती दुनिया — दोनों समझने में मदद करता है।

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हेनली पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत की रैंकिंग सुधरी, चीन से पीछे लेकिन पाकिस्तान से काफी आगे
22 घंटे पहले