बाज़ार हमेशा उन्हें इनाम देता है जो सबसे पहले कदम बढ़ाते हैं। निवेश और उद्यमिता की दुनिया में, खासकर टेक्नोलॉजी में, यह बात किसी से छिपी नहीं है। डील की रफ्तार में हम इसे देखते हैं, और भीड़ के पहुंचने से पहले अपना झंडा गाड़ देने की होड़ में भी। लेकिन एक ऐसा फर्स्ट मूवर एडवांटेज है जो खुलेआम सामने पड़ा है और फिर भी इसे रणनीति की तरह कोई नहीं अपनाता। मज़े की बात यह है कि इसकी कीमत बस एक कप कॉफी जितनी है।
नियम सीधा है, हर बार बिल आप उठाइए। इसे किसी इत्तेफाक की तरह नहीं, बल्कि एक पक्के उसूल की तरह निभाइए।
वो एक शांत वाक्य जो सब बदल देता है
जब टेबल पर बिल आता है और सब लोग बटुआ निकालने का छोटा सा नाटक शुरू करते हैं, तब आप बस धीरे से एक लाइन कहिए, यह मेरी तरफ से। न इसका ऐलान कीजिए, न कोई भाषण दीजिए। और सबसे ज़रूरी, वो लाइन कभी मत जोड़िए जो सारा असर मिट्टी में मिला देती है, यानी अगली बार तुम्हारी बारी। जिस पल आपने हिसाब रखना शुरू किया, उसी पल आपने एक तोहफे को वापस लेन देन में बदल दिया, और पूरा जादू टूट गया।
देना, बदले की उम्मीद के बिना
गैरी वेनरचुक सालों से इसी सोच का एक रूप हर सुनने वाले को समझाते आए हैं। जितना लेते हो, उससे ज़्यादा दो। बिना कोई बिल थमाए सामने वाले की कीमत बढ़ाओ। उन्होंने लाखों लोगों की एक ऑडियंस इसी सीधी सी, पर ज़माने के उलट चलने वाली सोच पर खड़ी की कि लंबी रेस उन्हीं की होती है जो पहले दूसरों में निवेश करते हैं और भरोसा रखते हैं कि रिटर्न बाद में, अक्सर ऐसी शक्ल में लौटेगा जिसका अंदाज़ा भी नहीं था। उनके इस संदेश की सबसे अजीब बात यही है कि बहुत कम लोग इसे सच में एक सिस्टम की तरह जीते हैं। लोगों को यह बात पसंद आती है, पर वे इस आदत को अपनाते नहीं।
यह सिर्फ अच्छा बर्ताव नहीं, असली बढ़त है
अब समझिए कि यह महज़ शिष्टाचार क्यों नहीं, बल्कि एक सच्चा फर्स्ट मूवर एडवांटेज क्यों है। पहली वजह, इसे जान बूझकर लगभग कोई नहीं कर रहा। मैदान बिलकुल खाली पड़ा है। दूसरी वजह, यह चक्रवृद्धि की तरह बढ़ता है। एक बार किसी को डिनर कराना एक सुहावनी शाम भर है। लेकिन दो साल में सही लोगों के बीच पचास बार बिल उठाना एक ऐसी साख बना देता है जो किसी भी मीटिंग में आपसे पहले अंदर पहुंच जाती है। तीसरी वजह, और यही वो बात है जो हिसाब किताब में उलझे लोग चूक जाते हैं, यह स्केलेबल है। चाहे आप किसी इंटर्न को कॉफी पिला रहे हों या उस शख्स को लंच करा रहे हों जिसके हाथ में वो मैंडेट है जिसके पीछे आप पूरे साल भागते रहे, इशारा एक ही रहता है। हर बार की लागत छोटी ही रहती है, मगर रिश्ते की कीमत छोटी नहीं रहती।
शुक्रिया का जवाब कैसे दें
एक आखिरी बारीकी उन लोगों को बाकी सबसे अलग कर देती है जो इसे सच में समझते हैं और जो बस नकल कर रहे होते हैं। जब सामने वाला आपका शुक्रिया अदा करे, तो जवाब में कोई बात नहीं मत कहिए। कोई बात नहीं कहने का मतलब है कि कोई बात हो ही सकती थी, यानी थोड़ी तकलीफ तो हुई। इसके बजाय इटैलियन शब्द इस्तेमाल कीजिए, उन प्याचेरे, यानी खुशी हुई। यह जवाब उससे कहीं हल्का है। यह ऐसे है जैसे कह रहे हों, इसका ज़िक्र भी मत करो, मुझे तो अच्छा लगा। आप शुक्रिया को यूं हवा में उड़ा देते हैं जैसे यह कुछ था ही नहीं, क्योंकि आपके लिए वाकई यह कुछ नहीं था, और यही सहजता सामने वाले को सबसे ज़्यादा याद रह जाती है।
इसे इस हफ्ते एक सौदे की तरह आज़माइए
तो इस वीकेंड इसे एक ऐसे सौदे की तरह देखिए जो आप लगा रहे हैं। छोटा, असंतुलित, जिसमें घाटे की गुंजाइश न के बराबर है, पर जिसका फायदा दिनों में नहीं बल्कि सालों में मिलता है। पहले हाथ बढ़ाइए, वो शांत लाइन कहिए, और शुक्रिया को हल्के से उड़ा दीजिए।
फिर वक्त के साथ देखिए कि कौन कौन खुद आपकी तरफ हाथ बढ़ाने लगता है।
किसकी सोच है यह
एंड्रिया ज़ैनन को डिज़ास्टर रिस्क मैनेजमेंट, सस्टेनेबिलिटी और उद्यमिता के विशेषज्ञ के तौर पर 20 साल का पेशेवर अनुभव है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और मिडिल ईस्ट तथा नॉर्थ अफ्रीका के देशों को सलाह दी है।













