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बल्लभगढ़-फरीदाबाद में ब्लूटूथ बैटरी ने बढ़ाई मुसीबत, बीच रास्ते में दगा दे गए ई-रिक्शे, चालकों की कमाई पर पड़ी मारहरियाणा
3 घंटे पहले· 4

बल्लभगढ़-फरीदाबाद में ब्लूटूथ बैटरी ने बढ़ाई मुसीबत, बीच रास्ते में दगा दे गए ई-रिक्शे, चालकों की कमाई पर पड़ी मार

फरीदाबाद और बल्लभगढ़ में दो दिन तक कई ई-रिक्शा चलते-चलते अचानक बंद होते रहे, जिससे कुछ चालकों को गाड़ी किलोमीटरों तक धक्का देकर घर ले जाना पड़ा और उन्हें आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा.

अर्शदीप अहलूवालियाअर्शदीप अहलूवालियावरिष्ठ संवाददाता 5 मिनट पढ़ें AI के लिए
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हरियाणा के फरीदाबाद और बल्लभगढ़ में पिछले दो दिनों में सड़कों पर अजीब नज़ारा देखने को मिला. कई ई-रिक्शा चालकों की गाड़ियां चलते-चलते अचानक बंद हो गईं. किसी को अपनी सवारियों को बीच रास्ते में ही उतारना पड़ा तो किसी को 7 से 8 किलोमीटर तक बंद पड़े ई-रिक्शे को धक्का देकर घर तक ले जाना पड़ा. जिस वाहन से रोज परिवार का खर्च चलता है, वही अचानक सड़क के बीचोंबीच रुक गया. दो दिन गाड़ी न चलने से किसी चालक को करीब 3 हजार रुपये का नुकसान झेलना पड़ा तो किसी को हर महीने भरी जाने वाली लोन की किस्त की चिंता सताने लगी. सोशल मीडिया पर इससे जुड़े वीडियो खूब वायरल हुए, लेकिन इन ई-रिक्शा चालकों के लिए बीते दो दिन किसी बुरे सपने की तरह रहे.

अचानक क्यों बंद हो रहे थे ई-रिक्शे

बल्लभगढ़ और फरीदाबाद के कई ई-रिक्शा चालकों ने बताया कि उनकी गाड़ियां मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए बंद हो रही थीं. चालकों का कहना है कि गाड़ी खरीदते वक्त एजेंसी की तरफ से उन्हें कभी यह नहीं बताया गया कि बैटरी ब्लूटूथ या मोबाइल एप से भी नियंत्रित की जा सकती है. बाद में जब एजेंसी ने बैटरी में पासवर्ड सुरक्षा लगाई, तब जाकर कई चालकों की परेशानी खत्म हुई.

धर्मेंद्र: एक ही दिन में तीन बार बंद हुई गाड़ी

बल्लभगढ़ में पिछले तीन हफ्तों से ई-रिक्शा चला रहे धर्मेंद्र ने बताया कि उन्होंने 12 जून को करीब 1 लाख 75 हजार रुपये में नया ई-रिक्शा खरीदा था. उनका कहना है कि एक ही दिन में उनकी गाड़ी दो से तीन बार बीच रास्ते में अचानक बंद हो गई. कई बार तो सवारियां गाड़ी में बैठी थीं और अचानक रिक्शा रुक जाने से उन्हें शर्मिंदा भी होना पड़ा. धर्मेंद्र के परिवार का पूरा खर्च इसी ई-रिक्शे की कमाई से चलता है. उनका कहना है कि गाड़ी खरीदते समय किसी ने यह नहीं बताया था कि इसमें पासवर्ड या मोबाइल से जुड़ा कोई सिस्टम भी है. अब एजेंसी ने पासवर्ड लगा दिया है, जिसके बाद गाड़ी सामान्य ढंग से चल रही है.

मनीष कुमार: चार-पांच बार एजेंसी के चक्कर, फिर सामने आई चीनी एप्लीकेशन की बात

करीब आठ महीने से बल्लभगढ़ में ई-रिक्शा चला रहे मनीष कुमार ने अपनी गाड़ी दो लाख रुपये में खरीदी थी. उनका कहना है कि जब भी गाड़ी किसी मोबाइल एप्लीकेशन से जुड़ती थी, ई-रिक्शा अचानक बंद हो जाता था. कई बार तो सड़क पर सवारियों के बीच ही गाड़ी रुक गई, जिससे दुर्घटना का खतरा भी पैदा हुआ. मनीष चार-पांच बार एजेंसी के चक्कर काटने के बाद ही समस्या से छुटकारा पा सके, जब बैटरी में पासवर्ड लगाया गया. उनका आरोप है कि एजेंसी ने शुरुआत में इस फीचर के बारे में कुछ नहीं बताया था और खरीद के वक्त यह जानकारी छुपाई गई कि गाड़ी किसी मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए बंद भी हो सकती है. इतना ही नहीं, हॉर्न और लाइट की खराबी ठीक कराने के एवज में भी उनसे 450 रुपये वसूले गए. मनीष के मुताबिक, उन्हें बाद में समाचारों से पता चला कि किसी चीनी एप्लीकेशन के जरिए यह गड़बड़ी हो रही थी.

आशीष की गाड़ी क्यों नहीं रुकी

फरीदाबाद और बल्लभगढ़ में सात-आठ महीने से ई-रिक्शा चला रहे आशीष के साथ यह दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि उनके वाहन में पानी वाली बैटरी लगी है जो ब्लूटूथ से कनेक्ट नहीं होती. उनके कई साथी परेशान रहे, लेकिन उनका ई-रिक्शा लगातार चलता रहा. आशीष के मुताबिक, जिन ई-रिक्शों में ब्लूटूथ आधारित लिथियम बैटरी लगी थी, उन्हीं में सबसे ज्यादा दिक्कतें सामने आईं.

दीपक: गुप्ता होटल के पास सड़क पर अटकी गाड़ी, दो दिन में करीब 3 हजार का नुकसान

दीपक की गाड़ी लगातार दो दिन तक बीच रास्ते में बंद होती रही. एक दिन बल्लभगढ़ के गुप्ता होटल के पास उनका ई-रिक्शा अचानक रुक गया, जिसे उन्हें धक्का लगाकर आगे बढ़ाना पड़ा. कंपनी को फोन करने पर कर्मचारी मौके पर पहुंचे और मोबाइल के जरिए ही गाड़ी दोबारा चालू की, बाद में बैटरी में पासवर्ड लगाया गया. दीपक ने बताया कि उन्होंने करीब चार महीने पहले 1 लाख 80 हजार रुपये में यह ई-रिक्शा खरीदा था. दो दिन गाड़ी न चल पाने से उन्हें करीब 3 हजार रुपये का नुकसान हुआ. वह रोजाना 1500 से 1600 रुपये तक कमा लेते हैं, इसलिए इन दो दिनों में उनका खासा नुकसान हुआ.

भारत: सेंसर और पासवर्ड ने बचाई गाड़ी, पर कुछ लोग जानबूझकर कर रहे शरारत

बल्लभगढ़ मेट्रो स्टेशन से घंटाघर तक पिछले आठ महीनों से ई-रिक्शा चला रहे भारत का वाहन इस दौरान बंद नहीं हुआ, क्योंकि उन्होंने पहले से ही सुरक्षा के लिए अपनी गाड़ी में एक सेंसर और पासवर्ड लगवा रखा था. जिन चालकों ने यह सुरक्षा फीचर नहीं लगवाए थे, उन्हें कहीं ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ी. भारत का कहना है कि कुछ लोग सिर्फ मजाक या शरारत के इरादे से मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए गरीब चालकों की गाड़ियां बंद कर रहे थे, जबकि इससे बीच सड़क पर हादसा होने का खतरा भी बना रहता है.

वेदपाल की सबसे दर्दनाक कहानी: सेक्टर-2 से 7 से 8 किलोमीटर धक्का

इन सभी में सबसे तकलीफदेह कहानी वेदपाल की रही. मूल रूप से पलवल के रहने वाले वेदपाल बल्लभगढ़ में किराए के मकान में रहते हैं और लोन पर खरीदे गए ई-रिक्शे की कमाई से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं. उन्होंने बताया कि 30 जून से उनकी गाड़ी चलते-चलते बंद होने लगी थी. एक दिन सेक्टर-2 से घर लौटते समय उन्हें अपनी सवारी को बीच रास्ते में ही उतारना पड़ा और करीब 7 से 8 किलोमीटर तक बंद पड़े ई-रिक्शे को धक्का देकर घर तक ले जाना पड़ा. वेदपाल ने यह वाहन लोन पर लिया है और हर महीने उन्हें 5500 रुपये की किस्त चुकानी पड़ती है. उनके तीन बच्चों का पूरा परिवार इसी कमाई पर निर्भर है. ई-रिक्शा खरीदने के बाद से उन्हें लगातार तकनीकी दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं, लेकिन एजेंसी में कई बार शिकायत करने के बावजूद उन्हें अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं मिल पाया है.

एक जैसी तकनीकी खामी, अलग-अलग मुश्किलें

इन तमाम चालकों की आपबीती से साफ है कि रिमोट से नियंत्रित होने वाली बैटरी से जुड़ी एक तकनीकी खामी ने रोजी-रोटी के लिए ई-रिक्शा पर निर्भर परिवारों के सामने आर्थिक और सुरक्षा, दोनों तरह की मुश्किलें खड़ी कर दीं. जिन चालकों ने पहले से सेंसर या पासवर्ड जैसी सुरक्षा लगवा रखी थी, उनकी गाड़ियां बची रहीं, जबकि बाकी को भारी नुकसान और शर्मिंदगी दोनों झेलनी पड़ी.

इसका आप पर असर

  • भारत में: जो लोग भी ब्लूटूथ या मोबाइल एप से जुड़ी लिथियम बैटरी वाले ई-रिक्शा या इलेक्ट्रिक वाहन खरीद रहे हैं, उन्हें डीलर से यह जरूर पूछना चाहिए कि क्या बैटरी रिमोट से नियंत्रित या बंद की जा सकती है, और उसमें पासवर्ड सुरक्षा जरूर लगवानी चाहिए.
  • फरीदाबाद-बल्लभगढ़ में: यहां रोज कमाई पर निर्भर ई-रिक्शा चालकों को गाड़ी में सेंसर और पासवर्ड लगवाकर अचानक बंद होने और सड़क पर होने वाले हादसे तथा आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है.

सवाल-जवाब

फरीदाबाद और बल्लभगढ़ में ई-रिक्शा चालकों को क्या समस्या हुई?
पिछले दो दिनों में कई ई-रिक्शा चलते-चलते अचानक बीच रास्ते में बंद हो गए, जिससे चालकों को सवारियां उतारनी पड़ीं और गाड़ी को किलोमीटरों तक धक्का देकर घर ले जाना पड़ा.
ई-रिक्शे अचानक बंद क्यों हो रहे थे?
चालकों के मुताबिक गाड़ियां मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए बंद हो रही थीं क्योंकि बैटरी ब्लूटूथ या मोबाइल एप से नियंत्रित हो सकती थी, जिसकी जानकारी खरीद के समय नहीं दी गई थी.
वेदपाल को कितने किलोमीटर तक ई-रिक्शा धक्का देना पड़ा?
वेदपाल को सेक्टर-2 से घर लौटते समय करीब 7 से 8 किलोमीटर तक बंद पड़े ई-रिक्शे को धक्का देकर ले जाना पड़ा.
धर्मेंद्र ने कब और कितने में नया ई-रिक्शा खरीदा था?
धर्मेंद्र ने 12 जून को करीब 1 लाख 75 हजार रुपये में नया ई-रिक्शा खरीदा था.
मनीष कुमार को हॉर्न और लाइट ठीक कराने के लिए कितने रुपये देने पड़े?
मनीष कुमार से हॉर्न और लाइट की खराबी ठीक कराने के लिए 450 रुपये लिए गए.
समस्या का समाधान कैसे निकला?
जिन चालकों की गाड़ियां बंद हो रही थीं, उनकी बैटरी में एजेंसी ने पासवर्ड सुरक्षा लगाई, जिसके बाद ज्यादातर की समस्या खत्म हो गई.
आशीष और भारत की गाड़ियां क्यों नहीं रुकीं?
आशीष के वाहन में पानी वाली बैटरी थी जो ब्लूटूथ से कनेक्ट नहीं होती, जबकि भारत ने पहले से ही अपनी गाड़ी में सुरक्षा के लिए सेंसर और पासवर्ड लगवा रखा था.
दीपक को दो दिनों में कितना नुकसान हुआ?
दीपक को दो दिन गाड़ी न चल पाने से करीब 3 हजार रुपये का नुकसान हुआ, जबकि वह रोजाना 1500 से 1600 रुपये तक कमाते हैं.
अर्शदीप अहलूवालिया
लेखक के बारे मेंअर्शदीप अहलूवालियावरिष्ठ संवाददाता चंडीगढ़
विशेषज्ञताक्षेत्रीय समाचार, पंजाब समाचार, हरियाणा समाचार, हिमाचल प्रदेश समाचार, उत्तराखंड समाचार, राजनीति, शासन, बुनियादी ढाँचा, कृषि, सामाजिक मुद्दे, ब्रेकिंग न्यूज़

अर्शदीप अहलूवालिया एक क्षेत्रीय संवाददाता हैं जो पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को कवर करते हैं। वे उत्तर भारत की ब्रेकिंग न्यूज़, क्षेत्रीय राजनीति, सामाजिक मुद्दों, बुनियादी ढाँचे और सांस्कृतिक घटनाक्रमों पर रिपोर्ट करते हैं।

अर्शदीप अहलूवालिया एक क्षेत्रीय संवाददाता हैं जो पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की ख़बरों की कवरेज में विशेषज्ञता रखते हैं। वे उत्तर भारत के ब्रेकिंग क्षेत्रीय घटनाक्रम, राजनीति, शासन, कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं, कृषि, मौसम के असर और सांस्कृतिक आयोजनों पर रिपोर्ट करते हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग और तथ्यपरक कहानी कहने पर मज़बूत ज़ोर के साथ अर्शदीप स्थानीय समुदायों और राज्य-स्तरीय नीतियों को प्रभावित करने वाले मुद्दों की समय पर व गहन कवरेज देते हैं। उनकी रिपोर्टिंग क्षेत्रीय शासन, जनकल्याण पहलों, आर्थिक घटनाक्रमों और सामाजिक बदलाव को उजागर करती है और पाठकों को उत्तर भारत की घटनाओं की स्पष्ट व भरोसेमंद समझ देती है।

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