भारत में खेती-किसानी हमेशा से मौसम की मार, बाजार में फसलों के उतार-चढ़ाव और खेती की बढ़ती लागत के बीच एक मुश्किल संतुलन रही है। फरीदाबाद जिले के दयालपुर गांव के किसानों के लिए यह संघर्ष प्रशासनिक लापरवाही के कारण और भी गंभीर हो गया है। जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और कम पानी लेने वाली फसलों को उगाने में अपना दिन-रात का पसीना बहाने के बावजूद, यहां के किसान सरकारी फाइलों और दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। सरकार द्वारा किसानों को आर्थिक राहत देने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई योजनाएं सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज बड़ी गलतियों की वजह से दम तोड़ रही हैं। यह समस्या नीति निर्माण और जमीनी स्तर पर उसके क्रियान्वयन के बीच की बड़ी खाई को दर्शाती है। यह स्पष्ट करता है कि जब मानवीय निरीक्षण को हटा दिया जाता है, तो केवल डिजिटल पहलों पर निर्भर रहने से किस तरह जमीनी स्तर पर नुकसान हो सकता है।
सरकारी सब्सिडी और इसका आर्थिक गणित
पानी की भारी खपत वाली धान जैसी फसलों पर निर्भरता कम करने और कम पानी में उगने वाली फसलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने एक प्रोत्साहन योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत बाजरा और ज्वार जैसी फसलों की खेती करने वाले किसानों को लगभग 7,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से सब्सिडी देने का प्रावधान है। यह आर्थिक मदद किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है ताकि वे फसल विविधीकरण को अपना सकें। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह राशि बेहद महत्वपूर्ण है, जो उनकी पूरी उत्पादन लागत को कवर करने के साथ-साथ थोड़ा मुनाफा भी सुनिश्चित कर सकती है।
दयालपुर गांव के रहने वाले किसान संजीव कुमार बैंसला बताते हैं कि अगर सरकारी व्यवस्था सही तरीके से काम करे, तो बाजरे की खेती किसानों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है। संजीव कुमार बैंसला के अनुसार, एक एकड़ में बाजरे के बीज का खर्च लगभग 500 से 700 रुपये के बीच आता है। यदि इसमें जुताई, बुवाई, मजदूरी और खाद की कुल लागत को भी जोड़ दिया जाए, तो एक एकड़ बाजरे की खेती का कुल खर्च 2,500 से 3,000 रुपये के आसपास रहता है। यदि सरकार की ओर से घोषित 7,000 रुपये की सब्सिडी बिना किसी रुकावट के समय पर मिल जाए, तो इससे किसानों को बड़ी राहत मिलेगी और वे ऐसी फसलों को उगाने के लिए आगे आएंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर रिकॉर्ड की गड़बड़ी के कारण किसानों को खेतों में काम करने के बजाय सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। बाजरा और ज्वार को बढ़ावा देना केवल एक क्षेत्रीय आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय प्राथमिकता भी है, क्योंकि भारत मोटे अनाज को सुपरफूड के रूप में स्थापित करने के वैश्विक प्रयासों का नेतृत्व कर रहा है। सरकारें किसानों को धान जैसी फसलों से दूर करने के लिए भारी बजट आवंटित कर रही हैं, जिन्होंने हरियाणा जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में भूजल स्तर को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है। सब्सिडी न देकर प्रशासन अनजाने में किसानों को इन पर्यावरण-अनुकूल फसलों से दूर कर रहा है।
सरकारी रिकॉर्ड में फसल की गलत एंट्री से खड़ी हुई परेशानी
किसानों को उनकी वाजिब सब्सिडी न मिलने के पीछे सबसे बड़ा कारण सरकारी डिजिटल डेटाबेस में फसलों की गलत जानकारी दर्ज होना है। हालांकि सरकार ने फसलों के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था अनिवार्य कर दी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी जांच की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। किसानों का आरोप है कि उन्होंने अपने खेतों में बाजरा या ज्वार की बुवाई की है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसे धान दर्ज कर दिया गया है। चूंकि धान की फसल इस पर्यावरण-अनुकूल प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत नहीं आती, इसलिए सिस्टम स्वचालित रूप से इन किसानों को 7,000 रुपये प्रति एकड़ की सब्सिडी पाने से अयोग्य घोषित कर देता है।
यह समस्या केवल बाजरा और धान तक ही सीमित नहीं है। किसानों का कहना है कि कई बार खेतों में भिंडी जैसी सब्जियां उगाई गई होती हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनके स्थान पर कोई दूसरी फसल दर्ज कर दी जाती है। एक बार गलत डेटा ऑनलाइन दर्ज होने के बाद किसानों को उसे ठीक कराने के लिए एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। उन्हें बार-बार पटवारी के पास जाना पड़ता है, मंडियों में चक्कर लगाने पड़ते हैं और अपनी शिकायतें दर्ज करानी पड़ती हैं। इसके बावजूद समय पर सरकारी रिकॉर्ड दुरुस्त नहीं हो पाता और किसान अपने हक से वंचित रह जाते हैं। इस प्रशासनिक उदासीनता की वजह से किसानों का डिजिटल पोर्टल्स से भरोसा उठ रहा है। डिजिटल माध्यमों का उद्देश्य प्रक्रिया को आसान बनाना था, लेकिन जमीनी स्तर पर गलत प्रविष्टियों के कारण ये किसानों के लिए सिरदर्द बन गए हैं। एक बार सिस्टम में गलत फसल दर्ज होने के बाद उसे ठीक कराने के लिए कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे पूरी डिजिटल प्रणाली का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
खेतों के निरीक्षण की जगह दफ्तरों से ही अपडेट हो रहे रिकॉर्ड
स्थानीय किसानों के अनुसार, व्यवस्था में यह गिरावट पिछले कुछ वर्षों में आई प्रशासनिक शिथिलता का परिणाम है। संजीव कुमार बैंसला बताते हैं कि आज से लगभग 10 साल पहले यह पूरी व्यवस्था बहुत पारदर्शी और भरोसेमंद थी। उस समय पटवारी खुद खेतों में जाकर फसलों की जमीनी जांच करते थे। वे किसानों से बातचीत करते थे और मौके पर सत्यापन करने के बाद ही रिकॉर्ड तैयार करते थे। इस शारीरिक जांच की वजह से सरकारी आंकड़े और खेतों की वास्तविक स्थिति में कोई अंतर नहीं होता था।
लेकिन पिछले करीब 10 सालों से यह जमीनी सत्यापन पूरी तरह बंद हो चुका है। किसानों का आरोप है कि अब पटवारी खेतों में आकर फसलों की जांच करने की जहमत नहीं उठाते। वे अपने दफ्तरों में बैठकर ही मनमाने तरीके से ऑनलाइन रिकॉर्ड को अपडेट कर देते हैं। इस वजह से सरकारी रिकॉर्ड में बड़ी गलतियां हो रही हैं और पर्यावरण के अनुकूल फसलों को अपनाने वाले ईमानदार किसान सजा भुगत रहे हैं। फरीदाबाद के किसान अब मांग कर रहे हैं कि सरकार दोबारा से खेतों की भौतिक जांच की व्यवस्था शुरू करे ताकि सरकारी रिकॉर्ड को सही बनाया जा सके और पात्र किसानों को समय पर सब्सिडी का लाभ मिल सके।











