सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति आभार प्रकट करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की अवधि को बेहद खास माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो लोग इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण जैसे अनुष्ठान करने से घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है और किसी भी तरह के पितृ दोष से राहत मिलती है। यह पूरा दौर कुल 16 दिनों तक चलता है और इसकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होने का नियम तय किया गया है। धार्मिक ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि इन विशेष दिनों में पूर्वज अपनी लोक से उतरकर पृथ्वी पर आते हैं और परिजनों द्वारा किए जाने वाले श्रद्धा कर्म को स्वीकार कर उन्हें सुरक्षित जीवन का आशीर्वाद देते हैं।
भाद्रपद पूर्णिमा से होती है शुरुआत
शुरुआती तिथियों और इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए पंडित श्रीधर शास्त्री ने लोकल 18 को बताया कि अक्सर लोगों के मन में यह गलतफहमी रहती है कि इन अनुष्ठानों का आरंभ आश्विन महीने से होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुल 16 दिनों की यह अवधि वास्तव में भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि से ही प्रारंभ हो जाती है। आश्विन कृष्ण पक्ष की पहली तिथि यानी प्रतिपदा से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक कुल 15 दिन श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। पंचांग के गणित के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा के दिन उन्हीं पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो। इसके अलावा शास्त्रों में यह नियम भी बताया गया है कि पूर्णिमा के दिन ननिहाल पक्ष यानी नाना-नानी के पितरों के निमित्त भी तर्पण और श्रद्धा कर्म किए जा सकते हैं।
जीव-जंतुओं के लिए भोजन का अंश
अनुष्ठानों और नियमों के बारे में आगे बताते हुए ज्योतिषी ने कहा कि पूर्वजों को तृप्त करने के लिए बलि कर्म का बहुत अधिक महत्व माना गया है। जब भी घर में भोजन तैयार किया जाता है, तो सबसे पहले गाय, कुत्ते और कौए के लिए एक निश्चित हिस्सा अलग निकाला जाता है जिसे ग्रास कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन जीवों के माध्यम से ही अर्पित किया गया भोजन सीधे पूर्वजों तक पहुंच जाता है।
श्राद्ध भोज में खीर की अनिवार्यता
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि पूर्वजों के लिए बनने वाले भोजन में दूध, घी और मुख्य रूप से चावल की खीर का होना बहुत जरूरी माना गया है। सात्विक और सफेद रंग की मिठाइयां पूर्वजों को सबसे ज्यादा पसंद आती हैं। पूरी विधि-विधान के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना, इसके अलावा कुशा और काले तिलों के साथ दी जाने वाली तिलांजलि घर के सभी पितृ दोषों को शांत करती है। पूर्णिमा से शुरू होकर अमावस्या पर समाप्त होने वाले इस धार्मिक अनुष्ठान से पूर्वज प्रसन्न होकर अपने परिजनों को सुख, समृद्धि और लंबी उम्र का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।



















