नोविग के बोल्ड विज्ञापन पर महिला खिलाड़ियों में भारी आक्रोश, सिडनी स्वेनी पर खेल को कामुक बनाने का आरोपपेट में छिपे खरबों सूक्ष्मजीव कैसे नियंत्रित करते हैं आपका दिमाग, वजन और संपूर्ण सेहतनाना पाटेकर ने रद्द की 1.5 करोड़ की गाड़ी की खरीद, संकटग्रस्त किसान परिवारों में बांटे चेकहार्मोन और मेटाबॉलिज्म के असंतुलन से बढ़ रही PCOS की समस्या, विशेषज्ञों ने बताए शुरुआती लक्षण और बचावऐप्पल का नया लाइनअप: कौन सा आईफोन खरीदना समझदारी है और किन मॉडलों से दूरी बनाना बेहतरअमेरिकी संसद के निचले सदन में ईरान सैन्य कार्रवाई पर लगाम लगाने का प्रस्ताव पारित, रिपब्लिकन पार्टी के सात सांसदों ने दिया विपक्षी खेमे का साथसनातन परंपरा में शिखा बांधने के पीछे क्या हैं आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और मानसिक रहस्यराज कपूर के निर्देशन में बने झरने वाले दृश्य पर मंदाकिनी ने तोड़ी चुप्पी, बोलीं पवित्रता ही फिल्म का असल संदेश थाकिचन वेस्ट से तैयार करें पौधों के लिए ताकतवर लिक्विड खाद, चावल के पानी में मिलाएं ये तीन चीजेंउम्र बढ़ने के साथ शरीर को चुस्त रखने के वैज्ञानिक तौर-तरीके
फरीदाबाद के नवादा गांव में स्थित है 5 हजार साल पुराना मंदिर, जहां परिक्रमा करने से पूरी होती है हर मुरादहरियाणा
18 सित॰ 2026, 6:31 pm (1 दिन पहले)· 3

फरीदाबाद के नवादा गांव में स्थित है 5 हजार साल पुराना मंदिर, जहां परिक्रमा करने से पूरी होती है हर मुराद

फरीदाबाद के नवादा गांव में स्थित करीब 5000 साल पुराना बंशी वाले राधा-कृष्ण का मंदिर अपनी प्राचीन मान्यताओं, पवित्र सरोवर और जेठ महीने में लगने वाले एक महीने लंबे मेले के लिए प्रसिद्ध है।

फरीदाबाद जिले के नवादा गांव में स्थित भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का प्राचीन मंदिर अपनी अद्भुत आभा और आध्यात्मिक महत्व के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात है। इस पवित्र स्थान पर बंशी वाले राधा-कृष्ण की मनमोहक प्रतिमा स्थापित है, जिसके दर्शन करने के लिए हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करते ही एक अनूठा और अलौकिक अनुभव होता है, जो आगंतुकों को मानसिक शांति प्रदान करता है। घने पेड़ों और सुंदर वनस्पतियों से घिरा यह पूरा परिसर अत्यंत शांत और सुरम्य है, जो शहर की कोलाहल भरी जिंदगी से दूर एक शांत आश्रय प्रदान करता है। यहां सुबह की पहली किरण के साथ ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो जाता है और दूर-दराज के इलाकों से आने वाले लोग भी यहां घंटों बैठकर ध्यान और आराधना में समय व्यतीत करते हैं। यह मंदिर न केवल एक पूजा स्थल है, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन और आस्था का एक मुख्य केंद्र भी है।

द्वापर युग और पांच हजार वर्ष पुरानी पौराणिक मान्यताएं

इस मंदिर के इतिहास और इसकी प्राचीनता को लेकर स्थानीय लोगों के बीच कई तरह की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। ग्रामीणों और बुजुर्गों का दृढ़ विश्वास है कि बंशी वाले श्री कृष्ण के इस पावन स्थान का सीधा संबंध द्वापर युग से है। कई स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह धार्मिक स्थल लगभग पांच हजार वर्ष पुराना है। यद्यपि इन दावों का कोई लिखित ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है, परंतु पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपराओं और लोककथाओं ने इस जगह को जनमानस के लिए अत्यंत पूजनीय बना दिया है। गांव के बुजुर्ग आज भी अपनी नई पीढ़ी के बच्चों को मंदिर से जुड़ी अलौकिक घटनाओं, चमत्कारों और पुरानी मान्यताओं की कहानियां सुनाते हैं, जिससे युवाओं में भी अपनी इस अमूल्य सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरी श्रद्धा बनी हुई है।

ये भी पढ़ें

प्राकृतिक परिवेश, प्राचीन सरोवर और साधु संतों का निवास स्थान

नवादा गांव के इस राधा-कृष्ण मंदिर परिसर में एक अत्यंत प्राचीन तालाब यानी सरोवर भी स्थित है। स्थानीय श्रद्धालु इस जलस्रोत को बेहद पवित्र और आस्था का प्रतीक मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस प्राचीन सरोवर के जल में एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा समाहित है। इसके अलावा, मंदिर के चारों ओर विशाल वृक्षों की शीतल छाया और प्राकृतिक वातावरण बना रहता है, जो ध्यान लगाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। परिसर के भीतर ही साधु-संतों के ठहरने और साधना करने के लिए विशेष आश्रमों का निर्माण किया गया है। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले तपस्वी और साधु यहाँ कुछ समय के लिए प्रवास करते हैं और मौन साधना, जप व ध्यान में लीन रहते हैं। सुबह के समय मंदिर का वातावरण विशेष रूप से ध्यानमग्न कर देने वाला होता है, जहां पक्षियों की चहचहाहट और बहती ठंडी हवा लोगों को शहर की भागदौड़ से दूर एक अनूठा सुकून देती है।

पुजारी सोमनाथ की देखरेख और जेठ के महीने का ऐतिहासिक मेला

मंदिर की दैनिक गतिविधियों, पूजा-अर्चना और रख-रखाव की जिम्मेदारी संभाल रहे मुख्य पुजारी सोमनाथ इस स्थान की महिमा के बारे में बताते हैं। पुजारी सोमनाथ के अनुसार, यहां हर वर्ष जेठ के महीने में एक विशाल और भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला किसी एक या दो दिन का नहीं, बल्कि पूरे एक महीने तक निरंतर चलता रहता है। इस एक महीने के दौरान, न केवल नवादा और फरीदाबाद के आसपास के गांवों से, बल्कि सुदूर क्षेत्रों और अन्य राज्यों से भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां भगवान के दर्शन के लिए उमड़ते हैं। मेले के दौरान मंदिर में आने वाले भक्त अपनी-अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करते हैं। कुछ लोग मंदिर की व्यवस्था संभालते हैं, कुछ पूजा-पाठ की तैयारियों में सहयोग करते हैं, तो कुछ सेवा भाव से अन्य कार्यों में हाथ बंटाते हैं।

श्रद्धालुओं द्वारा सेवा और जन-कल्याण के कार्य

जेठ के महीने में आयोजित होने वाले इस महीने भर लंबे मेले के दौरान मंदिर का पूरा माहौल भक्तिमय और उत्सव जैसा हो जाता है। इस दौरान स्थानीय ग्रामीणों द्वारा बड़े पैमाने पर सेवा कार्यों का आयोजन किया जाता है। भक्तों के लिए जगह-जगह भंडारे आयोजित किए जाते हैं, जहां आने वाले श्रद्धालुओं को निःशुल्क भोजन और प्रसाद वितरित किया जाता है। इसके अलावा, गर्मी के मौसम को देखते हुए राहगीरों और दर्शनार्थियों को ठंडा और मीठा शरबत पिलाने के लिए प्याऊ और विशेष काउंटर लगाए जाते हैं। गांव के युवा, बुजुर्ग और महिलाएं सभी मिलकर इस आयोजन को सफल बनाने में अपना योगदान देते हैं। दूर-दराज से आने वाले परिवारों के लिए यह मेला एक बहुत बड़ा सामाजिक और धार्मिक मिलन स्थल बन जाता है, जिससे आपसी सौहार्द और भाईचारा भी मजबूत होता है।

परिक्रमा की अनोखी परंपरा और मनोकामना पूर्ति का विश्वास

इस प्राचीन मंदिर की एक और सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यहां की जाने वाली परिक्रमा की परंपरा है। मंदिर परिसर के चारों ओर एक विशेष परिक्रमा पथ बना हुआ है, जहां भक्त श्रद्धापूर्वक चक्कर लगाते हैं। स्थानीय लोगों में यह अटूट विश्वास है कि यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन और पवित्र भाव से इस परिसर की परिक्रमा करता है, तो उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। इसी अटूट विश्वास के कारण, सुबह और शाम के समय परिक्रमा पथ पर भक्तों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। कुछ भक्तों के हाथों में पूजा की थाली, जल का लोटा और फूल होते हैं, जबकि अन्य लोग आंखें बंद करके भगवान के नाम का जाप करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हवा में गूंजते मंत्र और शंखनाद पूरे वातावरण को अत्यंत पवित्र और भक्ति रस से सराबोर कर देते हैं।

बहु-देवता मंदिर परिसर और पारिवारिक दर्शन का केंद्र

नवादा का यह मंदिर केवल राधा-कृष्ण तक ही सीमित नहीं है। विशाल मंदिर परिसर के भीतर भगवान शिव, शनिदेव और कई अन्य देवी-देवताओं के भी सुंदर और भव्य मंदिर स्थापित किए गए हैं। श्रद्धालु जब मुख्य मंदिर में बंशी वाले राधा-कृष्ण के दर्शन कर लेते हैं, तो उसके बाद वे परिसर में स्थित भगवान शिव के शिवालय में जाकर जलाभिषेक करते हैं और शनिदेव महाराज के मंदिर में तेल अर्पित कर आशीर्वाद मांगते हैं। मंदिर परिसर में पर्याप्त खुली जगह, सुंदर पार्क और चारों तरफ फैली हरियाली के कारण यह स्थान परिवारों के लिए एक आदर्श गंतव्य बन गया है। अवकाश के दिनों में लोग अपने बच्चों और बुजुर्गों के साथ यहां आते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और कुछ समय इस शांत और प्राकृतिक माहौल में बैठकर मानसिक शांति का अनुभव करते हैं।

जन्माष्टमी का भव्य त्योहार और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

भाद्रपद मास में आने वाली श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर इस मंदिर की रौनक और भी कई गुना बढ़ जाती है। जन्माष्टमी के अवसर पर पूरे नवादा गांव में एक अलग ही ऊर्जा और उत्साह देखने को मिलता है। इस दौरान मंदिर को रंग-बिरंगी लाइटों, सुंदर फूलों और गुब्बारों से बेहद आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण के जन्म के स्वागत में विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों, भजन संध्याओं और झांकियों का आयोजन किया जाता है। मध्यरात्रि को कान्हा के जन्म के समय शंखों की ध्वनि और 'नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की' के जयकारों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठता है। स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि यह उनकी सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत का सजीव प्रतीक है, जिसे वे अत्यंत गर्व और आदर के साथ संजोकर रखे हुए हैं।

सवाल-जवाब

यह प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर हरियाणा के फरीदाबाद जिले के नवादा गांव में स्थित है, जिसे स्थानीय लोग बंशी वाले का मंदिर भी कहते हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर कितना पुराना माना जाता है?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का संबंध द्वापर युग से है और इसे लगभग पांच हजार साल पुराना माना जाता है।
मंदिर के पुजारी कौन हैं और यहां का मुख्य मेला कब आयोजित होता है?
मंदिर की देखरेख पुजारी सोमनाथ करते हैं और यहां हर साल जेठ के महीने में एक महीने तक चलने वाले भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
इस मंदिर में परिक्रमा करने की परंपरा का क्या महत्व है?
ऐसी मान्यता है कि मंदिर परिसर की सच्चे मन से परिक्रमा करने से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
इस परिसर के भीतर अन्य किन देवी-देवताओं के मंदिर स्थित हैं?
मुख्य राधा-कृष्ण मंदिर के अलावा, इस विशाल परिसर में भगवान शिव, शनिदेव और अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी स्थापित हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Arjun Mehta@arjun-mehta·13 घंटे पहले

नवादा गांव के इस प्राचीन मंदिर की रिपोर्ट धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के बीच के गहरे संबंध को उजागर करती है। हालांकि इसके 5000 वर्ष पुराने होने का कोई लिखित पुरातात्विक दस्तावेज नहीं है, लेकिन मौखिक परंपराएं और लोककथाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। ऐसे ऐतिहासिक स्थलों पर बुनियादी सुविधाओं का विकास और संरक्षण स्थानीय स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ हमारी प्राचीन धरोहर को सहेजने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·14 घंटे पहले

यह रिपोर्ट फरीदाबाद के नवादा गांव के मंदिर की मौखिक परंपराओं और लोककथाओं को प्रभावी ढंग से सामने लाती है। हालांकि, पांच हजार वर्ष पुरानी प्राचीनता के इन दावों को अकादमिक और पुरातात्विक दस्तावेजों से सत्यापित करने की आवश्यकता है। भविष्य की रिपोर्टिंग में यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या स्थानीय इतिहासकारों के इनपुट जोड़े जाएं, तो इस सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्व और अधिक प्रामाणिक रूप से पाठकों के सामने आ सकेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 घंटे पहले

यह रिपोर्ट सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, लेकिन एक जिम्मेदार मीडिया संस्थान होने के नाते हमें लोककथाओं और दावों की सत्यता की तह तक जाना चाहिए। चूंकि इस मंदिर की पांच हजार साल पुरानीता का कोई लिखित ऐतिहासिक या पुरातात्विक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, इसलिए पाठकों के बीच किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या भ्रामक संदेश से बचने के लिए सतर्कता बरतना आवश्यक है। भविष्य में इस तरह की धरोहरों से जुड़े कानूनी, प्रशासनिक या भूमि संबंधी विवादों और सुरक्षा पहलुओं की भी गहन जांच होनी चाहिए, ताकि जनता को पूरी तरह तथ्यात्मक और पारदर्शी जानकारी मिल सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 घंटे पहले

एक क्राइम रिपोर्टर और जांच के दृष्टिकोण से, पांच हजार साल पुराने इस धार्मिक स्थल और इसके ऐतिहासिक दावों के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है। हालांकि पुरातात्विक दस्तावेजों का अभाव है, लेकिन ग्रामीण परंपराएं और लोककथाएं इस स्थल की सामाजिक महत्ता को स्पष्ट करती हैं। भविष्य में ऐसी प्राचीन विरासतों के संरक्षण और उनके कानूनी पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा, ताकि सांस्कृतिक आस्था और ऐतिहासिक प्रमाणिकता के बीच संतुलन बना रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·14 घंटे पहले

नवादा गांव की इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि लोककथाएं और मौखिक परंपराएं सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं। यद्यपि इन दावों का कोई लिखित पुरातात्विक प्रमाण मौजूद नहीं है, लेकिन इस तरह के प्राचीन स्थल ग्रामीण समाज को एकजुट करने का बड़ा जरिया हैं। आने वाले समय में इन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के साथ-साथ उनके ऐतिहासिक और कानूनी दस्तावेजों को संकलित करने की दिशा में भी काम होना चाहिए, ताकि हमारी प्राचीन विरासत सुरक्षित रह सके।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp