महिलाएं अक्सर अपनी स्वास्थ्य जांच के दौरान मैमोग्राम रिपोर्ट में डेंस ब्रेस्ट शब्द देखकर काफी चिंता में आ जाती हैं और उनके मन में यह सवाल उठने लगता है कि क्या यह किसी गंभीर बीमारी या कैंसर का शुरुआती लक्षण है। आखिर इस शब्द का वास्तविक मतलब क्या है और क्या इसकी वजह से घातक बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। क्या ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर गांठ या ट्यूमर की पहचान करना कठिन हो जाता है। महिलाओं को ऐसी स्थिति में कौन-सी मेडिकल जांचें करानी चाहिए और उनकी फ्रीक्वेंसी क्या होनी चाहिए, इन सभी महत्वपूर्ण विषयों पर फरीदाबाद की डॉक्टर श्वेता रजदान ने खुलकर जानकारी साझा की है।
क्या होता है डेंस ब्रेस्ट का मतलब
फरीदाबाद के अमृता हॉस्पिटल के ब्रेस्ट सर्जरी विभाग में सीनियर कंसल्टेंट के तौर पर कार्यरत डॉ. श्वेता रजदान स्पष्ट करती हैं कि बहुत ही साधारण शब्दों में कहें तो डेंसिटी का सीधा संबंध स्तन के भीतर मौजूद ऊतकों यानी टिश्यू की मात्रा से है। महिला का स्तन मुख्य रूप से फैट और ग्लैंडुलर टिश्यू से मिलकर बनता है। दूध बनाने वाली ग्रंथियों यानी ग्लैंड्स की मौजूदगी जब स्तन में अधिक होती है, तब उसे डेंस ब्रेस्ट कहा जाता है। इसके विपरीत जब स्तन में फैट की मात्रा अधिक होती है, तो उसे फैटी या कम घना स्तन माना जाता है। डॉ. श्वेता का कहना है कि यदि किसी महिला की मैमोग्राम रिपोर्ट में डेंस ब्रेस्ट का जिक्र है, तो इसमें डरने जैसी कोई बात नहीं है। इसका केवल इतना अर्थ है कि उस महिला के स्तनों में ग्रंथियों और ग्लैंडुलर टिश्यू का अनुपात ज्यादा है। आमतौर पर कम उम्र की महिलाओं में इस प्रकार के टिश्यू की प्रधानता अधिक होती है। यही वजह है कि 40 साल से कम उम्र की महिलाओं के मैमोग्राम में स्तन अक्सर डेंस नजर आते हैं। इसी कारण से चिकित्सीय रूप से मैमोग्राम आमतौर पर 40 वर्ष की आयु के आसपास या उसके बाद ही करवाने की सलाह दी जाती है।
डेंस ब्रेस्ट से कैंसर का कितना खतरा
इस विषय पर डॉ. श्वेता रजदान बताती हैं कि स्तन के घनत्व और कैंसर के बीच कोई सीधा और प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता है। हालांकि जब कोई महिला मैमोग्राम करवाती है, तो एक्स-रे तकनीक के माध्यम से स्तन के ऊतक सफेद, ग्रे और काले रंगों में स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। यदि स्तनों में ग्रंथियां ज्यादा हैं, तो एक्स-रे में सफेद रंग का टिश्यू दिखाई देता है और एक चिंता की बात यह होती है कि स्तन का ट्यूमर भी सफेद ही नजर आता है। ऐसे में सफेद रंग के ग्लैंडुलर टिश्यू और ट्यूमर के बीच अंतर करना और उन्हें अलग से पहचानना काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि स्तन के अंदर कोई ट्यूमर या गांठ मौजूद हो और साथ ही ग्रंथियां भी बहुत अधिक मात्रा में हों, तो वह ट्यूमर उन घनी ग्रंथियों के बीच में छिप सकता है, जिससे शुरुआती दौर में उसकी सटीक पहचान करना कठिन हो जाता है। स्तन जितना अधिक डेंस होगा, यानी मैमोग्राम में जितना ज्यादा सफेद टिश्यू उभर कर आएगा, ट्यूमर को पकड़ना उतना ही ज्यादा पेचीदा हो सकता है।
कौन-सी जांच और कितनी बार है जरूरी
घने स्तनों वाली महिलाओं को किन मेडिकल जांचों का सहारा लेना चाहिए, इस पर डॉ. श्वेता रजदान का कहना है कि अगर मैमोग्राम की रिपोर्ट में आपके स्तन डेंस आते हैं, तो डॉक्टर की जरूरत के अनुसार कुछ अतिरिक्त परीक्षण करवाने पड़ सकते हैं, जिनमें अल्ट्रासाउंड प्रमुख है। यदि कोई महिला जीवन में पहली बार मैमोग्राम करवा रही है, तो उसके साथ अल्ट्रासाउंड भी करवाया जा सकता है। लेकिन अगर आपका मैमोग्राम पहले से नियमित रूप से होता रहा है, जैसे कि हर एक या दो साल में एक बार, और इस बार की रिपोर्ट में भी स्तन डेंस आते हैं, तो इस नई रिपोर्ट की तुलना पुरानी रिपोर्ट से की जा सकती है। ऐसी स्थिति में हर बार एक नया अल्ट्रासाउंड करवाना अनिवार्य नहीं होता है। यदि मैमोग्राम पहली बार हुआ है, तो चिकित्सक स्थिति की गंभीरता और जरूरत के आधार पर अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं। जिन महिलाओं के स्तन डेंस होते हैं, उन्हें आमतौर पर वर्ष में एक बार मैमोग्राम करवाने की सिफारिश की जाती है। हालांकि, जैसे-जैसे महिला की उम्र बढ़ती जाती है, स्तनों का घनत्व प्राकृतिक रूप से कम होने लगता है। जब डेंसिटी कम हो जाए, तो डॉक्टर के निर्देशानुसार मैमोग्राम को दो साल में एक बार भी करवाया जा सकता है।
























