हरियाणा के पंचकूला अंतर्गत सेक्टर-20 के एक स्कूल परिसर में घटी खौफनाक वारदात ने अभिभावकों और शिक्षकों को झकझोर कर रख दिया है। वहां तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र ने केजी की नन्हीं छात्रा पर बर्बरतापूर्वक हमला कर दिया। छात्र पर आरोप है कि उसने बच्ची का सिर पहले डेस्क पर दे मारा, चेहरे पर लगातार लात-घूंसे बरसाए, बाल पकड़कर उसे जमीन पर घसीटा और फिर ईंट से सिर पर प्रहार किया। लहूलुहान हालत में बच्ची को फौरन सेक्टर-6 स्थित नागरिक अस्पताल पहुंचाया गया, जहां से उसकी नाजुक स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उसे पीजीआई चंडीगढ़ रेफर कर दिया। इस स्तब्धकारी वाकये ने शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों की शारीरिक सुरक्षा के साथ-साथ कम उम्र के छात्रों की मनोदशा और उनके व्यवहार को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।
कम उम्र में पनपते आक्रामक व्यवहार की बुनियादी वजहें
फरीदाबाद के मनोचिकित्सक सर्जन कमोडोर डॉ. सुनील गोयल के अनुसार, इतनी छोटी उम्र में किसी बच्चे के भीतर ऐसा अनियंत्रित क्रोध और जानलेवा आक्रामकता उभरना बेहद गंभीर मसला है। उनका विश्लेषण है कि इस तरह की हिंसक प्रवृत्तियां कई घरेलू और सामाजिक परिस्थितियों से जन्म लेती हैं। यदि कोई बच्चा अपने घर के माहौल में लगातार मारपीट का शिकार होता है या अपने माता-पिता के बीच घरेलू हिंसा होते देखता है, तो उसके अवचेतन मन में यह विकृत धारणा घर कर जाती है कि नाराजगी जताने का एकमात्र स्वाभाविक तरीका शारीरिक प्रहार ही है। इसके अतिरिक्त, विद्यालयों में जब बड़े विद्यार्थी किसी छोटे बच्चे को तंग या प्रताड़ित करते हैं, तो वह बच्चा अपने उसी दबे हुए गुस्से और हीनभावना को अपने से भी कमजोर व छोटे बच्चों पर उतारने का प्रयास करता है।
डिजिटल स्क्रीन और हिंसक दृश्यों का गहरा प्रभाव
डॉ. सुनील गोयल रेखांकित करते हैं कि आधुनिक दौर में स्मार्टफोन पर देखी जाने वाली रील्स, सिनेमा और धारावाहिकों में परोसी जा रही आक्रामक सामग्री भी बच्चों के कोमल मस्तिष्क को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है। अपरिपक्व उम्र के कारण वे वास्तविक जीवन और काल्पनिक दृश्यों में अंतर नहीं कर पाते। निरंतर हिंसक दृश्य देखते रहने से उनकी संवेदनाएं सुन्न होने लगती हैं और वे मारपीट को एक सामान्य व स्वीकार्य आचरण मानकर अपने साथियों पर भी उसे दोहराने लगते हैं।
शुरुआती संकेतों और चिड़चिड़ेपन को न समझें महज शरारत
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण स्पष्ट करता है कि बच्चों में अत्यधिक हिंसक प्रवृत्तियां रातों-रात पैदा नहीं होतीं, बल्कि उनका विकास एक निरंतर प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे होता है। डॉ. सुनील गोयल अभिभावकों को आगाह करते हैं कि यदि बच्चा मामूली बात पर गुस्सा होकर सामान फेंकने लगे, किसी को अचानक धक्का दे या परिवार के सदस्यों पर हाथ उठाने की चेष्टा करे, तो इसे सामान्य बचपन की नादानी या शरारत मानकर नजरअंदाज करने की भूल बिल्कुल न करें। यह बच्चे के व्यक्तित्व और व्यवहार में आ रहे नकारात्मक बदलाव की स्पष्ट चेतावनी होती है, जिसे शुरुआत में ही संभालना आवश्यक है।
सख्ती और समझाइश का संतुलन, हिंसा के बदले हिंसा से बचें
यदि कोई बच्चा अपने माता-पिता अथवा भाई-बहनों पर हाथ उठाता है, तो परिवार को बिना किसी ढिलाई के यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि ऐसा कृत्य किसी भी परिस्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके सुधार के लिए घर में स्पष्ट लक्ष्मण रेखाएं तय की जानी चाहिए। दंड स्वरूप बच्चे के खेलने के समय में कटौती की जा सकती है, कुछ दिनों के लिए उसका मोबाइल फोन जब्त किया जा सकता है अथवा उसकी प्रिय गतिविधियों पर सीमित समय के लिए रोक लगाई जा सकती है। हालांकि, सबसे अहम बात यह है कि बच्चे की आक्रामकता का जवाब कभी भी शारीरिक प्रहार से नहीं दिया जाना चाहिए। अभिभावकों को प्रेम और दृढ़ता का संतुलित रुख अपनाते हुए यह सिखाना होगा कि अत्यधिक क्रोध की स्थिति में भी किसी पर हाथ उठाना सर्वथा अनुचित है।
























