त्योहारों के मौसम में जब पूरा देश रोशनी की तैयारी में जुटता है, तब बीकानेर के कुछ विशेष बच्चे अपनी रचनात्मकता और कौशल से इस पर्व को और अधिक अर्थपूर्ण बना रहे हैं। गंगाशहर इलाके की चौधरी कॉलोनी में स्थित दिव्यांग सेवा संस्थान के मूकबधिर बच्चों ने इस बार मिट्टी के दीपकों को अपनी कल्पना के रंगों से सजाने का बीड़ा उठाया है। बोल और सुन न पाने के बावजूद इन बच्चों की कलात्मक दृष्टि इतनी समृद्ध है कि साधारण मिट्टी के दीये भी अब बेहद सुंदर और नक्काशीदार कलाकृतियों में बदल चुके हैं।
प्रतिदिन पढ़ाई के बाद कला साधना में जुटते हैं बच्चे
संस्थान में कार्यरत शिक्षक कलवंत कुमार ने बताया कि इस केंद्र में वर्तमान में लगभग 60 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन विद्यार्थियों में से 15 बच्चे संस्थान के ही छात्रावास परिसर में रहते हैं, जबकि शेष 45 बच्चे बीकानेर शहर के अलग-अलग मोहल्लों से हर दिन यहां पढ़ने पहुंचते हैं। संस्थान का पाठ्यक्रम केवल पारंपरिक किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की व्यक्तिगत रुचि और कौशल के अनुसार उन्हें रचनात्मक गतिविधियों से भी जोड़ा जाता है। इसी पहल के अंतर्गत करीब एक महीने पहले बच्चों ने मिट्टी के दीयों को रंगने और सजाने का काम अपने हाथ में लिया था।
अपनी नियमित कक्षाओं और पढ़ाई को पूरा करने के बाद ये बच्चे प्रतिदिन दो से तीन घंटे इस काम में लगाते हैं। बच्चे दीयों पर केवल एक जैसा रंग नहीं चढ़ाते, बल्कि अपनी पसंद और कल्पना के अनुसार अलग-अलग रंगों के संयोजन, बारीक बॉर्डर और पारंपरिक डिजाइन उकेरते हैं। यही वजह है कि बच्चों के हाथों से निकला प्रत्येक दीपक एक अनोखी और अलग पहचान लेकर सामने आता है। संस्थान परिसर में दीयों को तैयार करने का यह सिलसिला लगातार जारी है।
एक महीने के भीतर तैयार किए 12 हजार कलात्मक दीपक
संस्थान के अनुसार बच्चों ने बीते एक माह के दौरान अपने हाथों से करीब 12 हजार दीयों को रंगकर तैयार कर दिया है। बच्चों की बनाई इन कलाकृतियों को स्थानीय स्तर पर समाज के लोगों की ओर से काफी सराहना मिली है और कई लोगों ने इन्हें खरीदा भी है। स्थानीय स्तर पर पसंद किए जाने के साथ-साथ अब इन दीपकों की मांग अन्य राज्यों तक भी पहुंच चुकी है।
हाल ही में गुजरात और कोलकाता जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों से भी इन दीपकों के ऑर्डर संस्थान को प्राप्त हुए हैं। दूरदराज के क्षेत्रों से मांग आने के कारण बच्चों का आत्मविश्वास और उत्साह कई गुना बढ़ गया है। अब बच्चे और अधिक लगन के साथ दीयों को सजाने के काम में जुटे हुए हैं, ताकि त्योहार से पहले ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर पूरे किए जा सकें और लोगों के घरों तक इन दीपकों की रोशनी पहुंच सके।
दीयों की बिक्री से संवरेगा बच्चों का भविष्य
इस संस्थान की स्थापना वर्ष 2016 में की गई थी और तब से यह केंद्र विशेष बच्चों के समग्र विकास के लिए काम कर रहा है। कलवंत कुमार ने स्पष्ट किया कि केंद्र का प्राथमिक लक्ष्य बच्चों को केवल साक्षर बनाना नहीं है, बल्कि उन्हें स्वावलंबी बनाकर समाज में सम्मानपूर्वक जीने का हौसला देना है। मिट्टी के दीयों को सजाने की यह परियोजना भी बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की इसी व्यापक सोच का एक हिस्सा है।
दीयों की बिक्री से जो भी धनराशि एकत्र होगी, वह पूरी तरह से संस्थान के मूकबधिर बच्चों के कल्याण, उनकी सुविधाओं और शिक्षा पर ही खर्च की जाएगी। इस तरह बच्चों के हाथों से सजे ये दीपक न केवल लोगों के घरों के आंगनों को रोशन करेंगे, बल्कि स्वयं इन बच्चों के जीवन और भविष्य को भी नई रोशनी और संबल प्रदान करेंगे।






















