कुंभ साप्ताहिक राशिफल: नए आकर्षण के प्रभाव में पुराने रिश्तों की अनदेखी से बचेंबिरसा मुंडा हवाई अड्डे पर धुंध का असर, इंडिगो की दो उड़ानें देरी से हुईं रवानादीपावली से पहले मिलावट पर शिकंजा, कोटा में 100 वर्ग फीट के ठिकाने से 1920 किलो संदिग्ध मावा और मिल्क केक जब्तकेरल लोक सेवा आयोग भर्ती परीक्षाओं में भारी गड़बड़ियां, वेबसाइट्स से चोरी हुए 45 प्रश्न और मूल्यांकन में बड़ा फेरबदलफिटनेस सेंटर में 3 करोड़ रुपये लगाने के बाद असल में कितना बचता है, संचालक ने साझा किया पूरा गणितजवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में जामिया के छात्रों को 4,000 रुपये में मिले दिलजीत दोसांझ के 20,000 वाले दो गोल्ड टिकटकेंद्र ने राज्यों को बांटे टैक्स के 1.09 लाख करोड़ रुपये, उत्तर प्रदेश को मिला सबसे बड़ा हिस्सा1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के नायक ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का मऊ स्थित पैतृक घर बदहाली में तब्दीलघातक विष से कैसे तैयार हुई उच्च रक्तचाप की पहली अचूक दवा, ब्राजील के जंगलों से लैब तक का सफरफर्श पर पैर रखते ही आने लगी है खोखली आवाज? त्योहार से पहले फर्श की टाइल को ऐसे बनाएं मजबूत
बीकानेर के दिव्यांग बच्चों की कला का कमाल, दिवाली के लिए रंगे 12 हजार दीये, गुजरात और कोलकाता से मिले ऑर्डरराजस्थान
1 नव॰ 2026, 7:39 am (1 घंटे पहले)· 1

बीकानेर के दिव्यांग बच्चों की कला का कमाल, दिवाली के लिए रंगे 12 हजार दीये, गुजरात और कोलकाता से मिले ऑर्डर

बीकानेर के एक संस्थान में पढ़ने वाले मूकबधिर बच्चे अपनी लगन से साधारण दीयों को आकर्षक रूप दे रहे हैं। अब तक 12 हजार दीये रंगे जा चुके हैं और बिक्री से होने वाली आय इन्हीं बच्चों के कल्याण में इस्तेमाल होगी।

त्योहारों के मौसम में जब पूरा देश रोशनी की तैयारी में जुटता है, तब बीकानेर के कुछ विशेष बच्चे अपनी रचनात्मकता और कौशल से इस पर्व को और अधिक अर्थपूर्ण बना रहे हैं। गंगाशहर इलाके की चौधरी कॉलोनी में स्थित दिव्यांग सेवा संस्थान के मूकबधिर बच्चों ने इस बार मिट्टी के दीपकों को अपनी कल्पना के रंगों से सजाने का बीड़ा उठाया है। बोल और सुन न पाने के बावजूद इन बच्चों की कलात्मक दृष्टि इतनी समृद्ध है कि साधारण मिट्टी के दीये भी अब बेहद सुंदर और नक्काशीदार कलाकृतियों में बदल चुके हैं।

प्रतिदिन पढ़ाई के बाद कला साधना में जुटते हैं बच्चे

संस्थान में कार्यरत शिक्षक कलवंत कुमार ने बताया कि इस केंद्र में वर्तमान में लगभग 60 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन विद्यार्थियों में से 15 बच्चे संस्थान के ही छात्रावास परिसर में रहते हैं, जबकि शेष 45 बच्चे बीकानेर शहर के अलग-अलग मोहल्लों से हर दिन यहां पढ़ने पहुंचते हैं। संस्थान का पाठ्यक्रम केवल पारंपरिक किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की व्यक्तिगत रुचि और कौशल के अनुसार उन्हें रचनात्मक गतिविधियों से भी जोड़ा जाता है। इसी पहल के अंतर्गत करीब एक महीने पहले बच्चों ने मिट्टी के दीयों को रंगने और सजाने का काम अपने हाथ में लिया था।

ये भी पढ़ें

अपनी नियमित कक्षाओं और पढ़ाई को पूरा करने के बाद ये बच्चे प्रतिदिन दो से तीन घंटे इस काम में लगाते हैं। बच्चे दीयों पर केवल एक जैसा रंग नहीं चढ़ाते, बल्कि अपनी पसंद और कल्पना के अनुसार अलग-अलग रंगों के संयोजन, बारीक बॉर्डर और पारंपरिक डिजाइन उकेरते हैं। यही वजह है कि बच्चों के हाथों से निकला प्रत्येक दीपक एक अनोखी और अलग पहचान लेकर सामने आता है। संस्थान परिसर में दीयों को तैयार करने का यह सिलसिला लगातार जारी है।

एक महीने के भीतर तैयार किए 12 हजार कलात्मक दीपक

संस्थान के अनुसार बच्चों ने बीते एक माह के दौरान अपने हाथों से करीब 12 हजार दीयों को रंगकर तैयार कर दिया है। बच्चों की बनाई इन कलाकृतियों को स्थानीय स्तर पर समाज के लोगों की ओर से काफी सराहना मिली है और कई लोगों ने इन्हें खरीदा भी है। स्थानीय स्तर पर पसंद किए जाने के साथ-साथ अब इन दीपकों की मांग अन्य राज्यों तक भी पहुंच चुकी है।

हाल ही में गुजरात और कोलकाता जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों से भी इन दीपकों के ऑर्डर संस्थान को प्राप्त हुए हैं। दूरदराज के क्षेत्रों से मांग आने के कारण बच्चों का आत्मविश्वास और उत्साह कई गुना बढ़ गया है। अब बच्चे और अधिक लगन के साथ दीयों को सजाने के काम में जुटे हुए हैं, ताकि त्योहार से पहले ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर पूरे किए जा सकें और लोगों के घरों तक इन दीपकों की रोशनी पहुंच सके।

दीयों की बिक्री से संवरेगा बच्चों का भविष्य

इस संस्थान की स्थापना वर्ष 2016 में की गई थी और तब से यह केंद्र विशेष बच्चों के समग्र विकास के लिए काम कर रहा है। कलवंत कुमार ने स्पष्ट किया कि केंद्र का प्राथमिक लक्ष्य बच्चों को केवल साक्षर बनाना नहीं है, बल्कि उन्हें स्वावलंबी बनाकर समाज में सम्मानपूर्वक जीने का हौसला देना है। मिट्टी के दीयों को सजाने की यह परियोजना भी बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की इसी व्यापक सोच का एक हिस्सा है।

दीयों की बिक्री से जो भी धनराशि एकत्र होगी, वह पूरी तरह से संस्थान के मूकबधिर बच्चों के कल्याण, उनकी सुविधाओं और शिक्षा पर ही खर्च की जाएगी। इस तरह बच्चों के हाथों से सजे ये दीपक न केवल लोगों के घरों के आंगनों को रोशन करेंगे, बल्कि स्वयं इन बच्चों के जीवन और भविष्य को भी नई रोशनी और संबल प्रदान करेंगे।

सवाल-जवाब

यह संस्थान कहां स्थित है और इसका क्या नाम है?
यह बीकानेर के गंगाशहर स्थित चौधरी कॉलोनी में है और इसका नाम दिव्यांग सेवा संस्थान है।
संस्थान में कितने बच्चे पढ़ते हैं और कितने हॉस्टल में रहते हैं?
संस्थान में कुल 60 बच्चे पढ़ते हैं, जिनमें से 15 बच्चे हॉस्टल में रहते हैं और बाकी रोजाना आते हैं।
बच्चों ने अब तक कितने दीपक तैयार किए हैं?
बच्चों ने पिछले एक महीने की मेहनत से करीब 12 हजार दीयों को रंगकर तैयार किया है।
बच्चे पढ़ाई के अलावा रोज कितना समय इस काम में लगाते हैं?
बच्चे अपनी नियमित पढ़ाई पूरी करने के बाद हर दिन दो से तीन घंटे दीयों को रंगने में लगाते हैं।
बीकानेर के बाहर किन जगहों से दीपकों के ऑर्डर मिले हैं?
बच्चों द्वारा तैयार दीपकों के लिए गुजरात और कोलकाता से ऑर्डर मिले हैं।
दीपक बेचने से मिलने वाले पैसों का इस्तेमाल कैसे होगा?
बिक्री से होने वाली पूरी आय को संस्थान में रहने और पढ़ने वाले मूकबधिर बच्चों की शिक्षा और कल्याण पर खर्च किया जाएगा।
इस संस्थान की स्थापना कब हुई थी?
इस संस्थान की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·17 मिनट पहले

दीये बहुत सुंदर हैं, पर मुझे थोड़ा शक है कि इतने कम बच्चों ने सिर्फ एक महीने में 12 हजार दीये कैसे रंग लिए होंगे। कोलकाता और गुजरात के ऑर्डर पूरे करने का दबाव इन मासूमों पर ज़्यादा न पड़ जाए।

Arjun Mehta@arjun-mehta·37 मिनट पहले

इन बच्चों की कला ने दिल खुश कर दिया। गुजरात और कोलकाता तक ऑर्डर पहुँचना वाकई बड़ी बात है, इससे इनका हौसला और आत्मनिर्भरता दोनों बढ़ेंगे।

Ravikash Gupta@ravikash·36 मिनट पहले

अर्जुन जी, बिल्कुल सही कहा आपने। पिछले साल जब मैं बीकानेर गया था, तब ऐसे ही एक स्थानीय केंद्र में इन बच्चों की बनाई चीजें देखी थीं, उनका उत्साह देखकर सचमुच बहुत सुकून मिलता है।

Rohan Verma@rohan-verma·59 मिनट पहले

इन बच्चों ने सिर्फ एक महीने में 12 हजार दीये रंग दिए, सोचकर ही हैरानी होती है। बिना सुने और बोले इतनी मेहनत से काम करना वाकई बहुत बड़ी बात है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·58 मिनट पहले

रोहन भाई, सही कहा आपने। मैं पिछले साल बीकानेर गया था और तब ऐसे ही कुछ बच्चों से मिला था, उनकी लगन देखकर सच में आँखें भर आती हैं।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp