फिटनेस और जिम का कारोबार अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी इसका तेजी से विस्तार हो रहा है। बाहर से देखने पर जिम का कारोबार बेहद आकर्षक और भारी कमाई वाला नजर आता है, लेकिन इसके पीछे के वास्तविक परिचालन खर्च और निवेश का गणित काफी जटिल है। हरियाणा के गुरुग्राम और फरीदाबाद में फिटनेस सेंटर का संचालन करने वाले नितेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर इस उद्योग के वित्तीय मॉडल की पूरी सच्चाई सामने रखी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुल 3 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी लगाने और हर महीने लगभग 20 लाख रुपये का राजस्व जुटाने के बावजूद वास्तविक शुद्ध मुनाफा अपेक्षा से काफी कम रहता है।
राजस्व बड़ा लेकिन जेब में जाने वाली रकम सीमित
नितेश यादव के अनुसार, जिम उद्योग लाभदायक अवश्य है, लेकिन आम धारणा के विपरीत इसमें असीमित या आसान मुनाफा नहीं है। गुरुग्राम और फरीदाबाद स्थित दोनों केंद्रों से वह हर महीने करीब 20 लाख रुपये जुटाते हैं। हालांकि, सभी नियमित और वित्तीय देनदारियों को चुकाने के बाद उनके पास घर ले जाने के लिए केवल 2 से 3 लाख रुपये ही बचते हैं। उन्होंने बताया कि जब तक कोई उद्यमी इस कारोबार के मासिक खर्चों के हर पहलू को गहराई से नहीं समझता, तब तक वह मुनाफे का सही आकलन नहीं कर सकता।
मासिक परिचालन खर्चों का विस्तृत ब्योरा
फिटनेस सेंटर के संचालन में सबसे बड़ा हिस्सा परिचालन लागत पर खर्च होता है। नितेश यादव ने अपने मासिक खर्चों का विस्तृत हिसाब प्रस्तुत करते हुए बताया कि कुल 20 लाख रुपये के राजस्व में से 6 से 7 लाख रुपये सीधे स्टाफ और प्रशिक्षकों के वेतन में चले जाते हैं। इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा नियमित खर्च परिसर का किराया है। जीएसटी सहित दोनों केंद्रों का मासिक किराया करीब 4 लाख रुपये बैठता है।
इसके अलावा, एयर कंडीशनिंग और भारी इलेक्ट्रॉनिक कसरत मशीनों के निरंतर उपयोग के कारण बिजली का मासिक बिल 70 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। मेंटेनेंस, साफ-सफाई और अन्य प्रशासनिक मदों में 1 से 3 लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च हर महीने दर्ज किया जाता है। इन सभी प्रत्यक्ष खर्चों को घटाने के बाद हाथ में लगभग 5 से 6 लाख रुपये की राशि बचती है, जिसे अधिकांश लोग गलती से शुद्ध लाभ मान लेते हैं।
पूंजीगत निवेश और ईएमआई का भारी दबाव
हाथ में बचने वाली 5 से 6 लाख रुपये की राशि में से अभी पूंजीगत लागत का भुगतान होना बाकी रहता है। नितेश यादव ने दोनों फिटनेस सेंटरों को शुरू करने के लिए 3 करोड़ रुपये से अधिक की कुल पूंजी लगाई थी। यह रकम आधुनिक कसरत मशीनों, फिटनेस उपकरणों, इंटीरियर डिजाइनिंग और बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खर्च हुई थी। इस भारी निवेश के लिए ली गई वित्तीय देनदारियों के तहत उन्हें हर महीने करीब 3 लाख रुपये की ईएमआई चुकानी पड़ती है। इस किस्त के भुगतान के पश्चात ही संचालक के पास वास्तविक बचत के रूप में केवल 2 से 3 लाख रुपये बच पाते हैं।
पूंजी की रिकवरी और निरंतर आधुनिकीकरण की चुनौती
नितेश यादव का मानना है कि जिम का काम त्वरित या अत्यधिक मुनाफा कमाने का जरिया नहीं है। प्रारंभिक पूंजीगत लागत को पूरी तरह निकालने में लगभग 6 साल तक का लंबा समय लग सकता है। इस उद्योग में शुरुआत में ही भारी एकमुश्त पूंजी की आवश्यकता होती है, जिसकी वापसी काफी धीमी गति से होती है।
इसके साथ ही, बाजार की प्रतिस्पर्धा में प्रासंगिक बने रहने के लिए केंद्रों का लगातार आधुनिकीकरण करना अनिवार्य होता है। उपकरणों की नियमित सर्विसिंग, घिसावट की मरम्मत और समय-समय पर नई तकनीकों वाली आधुनिक मशीनें जोड़ने पर हर महीने निरंतर धन खर्च करना पड़ता है, जिससे मुनाफे का मार्जिन और अधिक सीमित हो जाता है।


















