भारत के स्वाधीनता आंदोलन के पन्नों में 1857 के संग्राम को एक युगांतरकारी मोड़ माना जाता है। सामान्य जनधारणा में इस ऐतिहासिक विद्रोह की चिंगारी मेरठ से फूटने की बात कही जाती है, मगर हरियाणा के ऐतिहासिक अभिलेख एक बेहद महत्वपूर्ण और अनसुना पहलू सामने लाते हैं। अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार, 10 मई 1857 की सुबह मेरठ में बगावत भड़कने से तकरीबन नौ घंटे पूर्व ही अंबाला छावनी के भीतर सैनिकों ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया था। स्वतंत्रता समर के इसी विस्मृत अध्याय और अमर बलिदानियों के योगदान को चिरस्थायी रूप देने के उद्देश्य से अंबाला छावनी में लगभग 800 करोड़ रुपये का विशाल शहीद स्मारक निर्मित किया गया है। निर्माण कार्य संपन्न होने के बाद अब यह परिसर आम दर्शकों के लिए खुलने जा रहा है और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शीघ्र ही इसका औपचारिक लोकार्पण करेंगे।
स्मारक परिसर में 23 दीर्घाएं और स्वर्ण अक्षरों में वीरों के नाम
अंबाला छावनी में स्थापित इस भव्य परिसर को 23 अलग-अलग दीर्घाओं में विभाजित किया गया है। इन दीर्घाओं में केवल हरियाणा अथवा अंबाला के घटनाक्रम को ही नहीं समेटा गया है, बल्कि मेरठ, दिल्ली, पंजाब, झांसी और गुजरात सहित समूचे भारत में लड़े गए संग्राम के विस्तृत दृश्य सहेजे गए हैं। व्यापक शोध के आधार पर अब तक 700 से ज्यादा सेनानियों की मुकम्मल पहचान की जा चुकी है, जिनके नाम, उनके पिताओं के नाम तथा उनके पैतृक गांवों का ब्योरा एकत्र किया गया है। इन जांबाज वीरों के नाम स्मारक के भीतर सुनहरे अक्षरों में तराशे गए हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियां उनके त्याग से परिचित हो सकें।
सैनिक हलचल से कहीं आगे का जनक्रांति रूप
अंबाला स्थित पीजी कॉलेज के इतिहासकार अतुल यादव ने बताया कि 1857 के इस ऐतिहासिक आंदोलन को मात्र सिपाहियों की एक सीमित बगावत समझ लेना तथ्यपरक नहीं होगा। उनके अनुसार यह समूचे समाज का एक व्यापक जन-विद्रोह था, जिसमें हर तबके के लोगों ने विदेशी आधिपत्य का पुरजोर विरोध किया था। उस दौर में हरियाणा के कृषकों, सैनिकों, गृहणियों और साधारण नागरिकों ने साझा संकल्प के साथ इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। उन्होंने रेखांकित किया कि कैबिनेट मंत्री अनिल विज के निरंतर प्रयासों की बदौलत साकार हुआ यह स्मारक नई पीढ़ी को देशव्यापी संघर्ष की समग्र तस्वीर समझाने का एक सशक्त माध्यम बनेगा।
मेरठ से नौ घंटे पहले भड़का अंबाला का संग्राम
इस स्मारक की ऐतिहासिक रूपरेखा का एक बड़ा आधार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष रहे डॉ. के.सी. यादव का प्रामाणिक शोध कार्य है। उनके अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ कि 10 मई 1857 की भोर में, जब मेरठ की घटनाएं अभी घटित नहीं हुई थीं, उससे लगभग नौ घंटे पहले ही अंबाला छावनी में तैनात 5वीं तथा 60वीं नेटिव इन्फैंट्री के जवानों ने शस्त्र उठाकर अपनी बैरकों से बाहर कदम रख दिया था।
इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त एक अन्य दस्तावेज में सितंबर 1857 के एक भीषण वाकये का विवरण सुरक्षित है। उस दस्तावेज के अनुसार, सैनिकों को एक दिन परेड ग्राउंड में एकत्र होने का आदेश दिया गया था। उसी समय एक सिपाही ने भागने का संकेत देते हुए अंग्रेजी शब्द पुकारा, जिसके तुरंत बाद वहां मौजूद यूरोपीय सैनिकों ने अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। महज 10 मिनट के अल्प समय में 135 भारतीय सिपाही गोलियों का शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हो गए, जबकि 33 सैनिकों को गिरफ्तार कर बंदी बनाया गया और तकरीबन 40 जवान वहां से सुरक्षित निकलने में सफल रहे थे। इतिहासकारों का मानना है कि स्वाधीनता संग्राम का यह खूनी पन्ना लंबे समय तक अपेक्षित ध्यान पाने से वंचित रहा।
वैश्विक पुस्तकालयों और पुरालेखागारों से जुटाए गए दस्तावेज
इस स्मारक की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को सुदृढ़ बनाने के लिए भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार और पुरातत्व से जुड़े संस्थानों के साथ-साथ विदेशों से भी ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त की गई है। शोध दलों ने लंदन की प्रतिष्ठित लाइब्रेरी और लाहौर के पुरातात्विक अभिलेखों से दुर्लभ दस्तावेज मंगवाए। इन्हीं ऐतिहासिक साक्ष्यों के बूते अब तक चिन्हित 700 से अधिक शूरवीरों के नाम सुनहरी इबारत में अंकित किए गए हैं। परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में जैसे-जैसे अन्य सेनानियों के प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध होते जाएंगे, उनके नाम भी इस सूची में निरंतर जोड़े जाते रहेंगे।
आधुनिक तकनीक, 360 डिग्री प्रोजेक्शन और लेजर प्रस्तुति
आगंतुकों को 1857 के उस दौर का जीवंत और सजीव अनुभव कराने के लिए परिसर को अत्याधुनिक दृश्य-श्रव्य तकनीक से सुसज्जित किया गया है। यहां 360 डिग्री प्रोजेक्शन तकनीक स्थापित की गई है, जिसके साथ ध्वनि और लेजर शो के जरिए उस कालखंड के संघर्षों का नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया जाएगा। इसके अलावा शहीदों को नमन करने के लिए एक विशेष डिजिटल दीर्घा भी स्थापित की गई है। इस गैलरी में दर्शक अपने हाथ रखकर अमर सेनानियों को डिजिटल श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे, जिसका पूरा इलेक्ट्रॉनिक ब्योरा प्रणाली में स्वतः दर्ज होता रहेगा।
कमल के आकार का 63 मीटर ऊंचा ढांचा और अन्य सुविधाएं
परिसर का मुख्य आकर्षण 63 मीटर ऊंची एक विशेष वास्तुशिल्पीय संरचना है, जिसे खिलते हुए कमल के फूल के स्वरूप में गढ़ा गया है। इस भव्य स्तंभ में दो तेज रफ्तार लिफ्ट लगाई गई हैं, जो दर्शकों को शीर्ष तल तक ले जाएंगी, जहां एक स्काई कैफे तैयार किया जा रहा है। इसके साथ ही परिसर में 2,500 लोगों के बैठने की क्षमता वाला एक खुला रंगमंच यानी ओपन एयर थिएटर, 300 सीटों की क्षमता से युक्त एक आधुनिक प्रेक्षागृह और एक निजी हेलीपैड का निर्माण भी किया गया है। पूरे क्षेत्र में निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र बिजली सब-स्टेशन और भारी क्षमता के जनरेटर लगाए गए हैं।
भ्रमण की रूपरेखा और ऑनलाइन प्रवेश व्यवस्था
इस विशाल स्मारक की सभी 23 दीर्घाओं और विभिन्न प्रदर्शनों का बारीकी से अवलोकन करने में आगंतुकों को लगभग छह घंटे का समय लगेगा। सुगम व्यवस्था बनाए रखने के लिए दर्शकों को 40-40 व्यक्तियों के सुनियोजित दलों में परिसर का भ्रमण कराया जाएगा। आम नागरिक अपने प्रवेश टिकट विशेष मोबाइल ऐप अथवा आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से डिजिटल रूप से बुक कर सकेंगे। इसके अलावा परिसर में आगंतुकों के लिए स्मृति-चिह्न, कलाकृतियां और ऐतिहासिक प्रतिकृतियां खरीदने हेतु आठ समर्पित दुकानें भी खोली गई हैं।



















