सड़क पर सफर के दौरान अप्रत्याशित हादसों की आशंका सदैव बनी रहती है। जब कोई गंभीर दुर्घटना घटती है, तब परिजनों की पहली प्राथमिकता पीड़ित का जीवन बचाना और उपचार कराना होती है। अस्पताल की भागदौड़ और महंगे इलाज के चलते परिवारों पर अचानक बड़ा आर्थिक बोझ आ पड़ता है। ऐसी विकट स्थिति में अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि कानून के तहत वे किस प्रकार आर्थिक राहत या क्षतिपूर्ति की मांग कर सकते हैं। कानूनी प्रावधानों के तहत मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल यानी एमएसीटी के माध्यम से घायलों और पीड़ित परिजनों को मुआवजा दिलाने की स्पष्ट व्यवस्था बनाई गई है।
मुआवजे के निर्धारण में एमएसीटी की मुख्य भूमिका
फरीदाबाद सेक्टर 12 कोर्ट के वकील मोहन तिवारी के अनुसार, सड़क हादसों में घायल होने या जान गंवाने वाले व्यक्तियों के परिजनों के लिए क्षतिपूर्ति तय करने का अधिकार एमएसीटी प्राधिकरण के पास होता है। पीड़ित या उनके परिजन इस विशेष ट्रिब्यूनल के समक्ष अपना दावा प्रस्तुत करते हैं। अदालत में याचिका दाखिल होने के पश्चात मामले की बारीकी से समीक्षा की जाती है। इसमें दुर्घटना की प्रकृति, पीड़ित को आई शारीरिक चोटों का स्तर, स्थायी या अस्थायी दिव्यांगता और स्थिति की गंभीरता का मूल्यांकन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, दुर्घटनाग्रस्त वाहन की बीमा पॉलिसी की शर्तों और दुर्घटना के संपूर्ण घटनाक्रम को ध्यान में रखकर मुआवजे की अंतिम राशि तय की जाती है।
दावा दायर करने के लिए अनिवार्य दस्तावेज
कानूनी रूप से क्षतिपूर्ति का दावा मजबूत करने के लिए दुर्घटना के तुरंत बाद साक्ष्यों और कागजातों को सहेजना अनिवार्य होता है। वकील मोहन तिवारी बताते हैं कि दुर्घटना के उपरांत सबसे पहला और अनिवार्य कदम पुलिस में प्राथमिकी यानी एफआईआर दर्ज कराना है। एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस द्वारा विस्तृत जांच रिपोर्ट तैयार की जाती है, जो क्लेम की रीढ़ बनती है। इसके साथ ही पीड़ित का चिकित्सकीय परीक्षण और मेडिकल रिपोर्ट तैयार कराई जानी चाहिए। अस्पताल से उपचार पूरा होने के बाद मिलने वाली डिस्चार्ज समरी, मेडिकल बिल और डॉक्टर की पर्चियों को सुरक्षित रखना आवश्यक होता है। यह तमाम दस्तावेज अदालत में साबित करते हैं कि चोटें दुर्घटना की वजह से ही आई हैं और उपचार पर कितना खर्च हुआ है।
क्लेम प्रक्रिया में समय का महत्व
हादसे के बाद कानूनी कार्रवाई शुरू करने में किसी भी प्रकार की अनावश्यक देरी पीड़ित पक्ष को नुकसान पहुंचा सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि दुर्घटना घटित होते ही आवश्यक कागजी प्रक्रिया तुरंत शुरू कर देनी चाहिए। यदि दावा पेश करने में अत्यधिक समय बीत जाता है, तो साक्ष्यों के कमजोर होने, गवाहों के उपलब्ध न होने और तकनीकी आपत्तियां खड़े होने का जोखिम बढ़ जाता है। जितनी जल्दी एफआईआर दर्ज कराकर ट्रिब्यूनल का रुख किया जाएगा, कानूनी उलझनों से उतना ही बचा जा सकेगा और राहत राशि भी समय पर मिल पाएगी।
बिना हेलमेट चलने पर भी मिलता है कानूनी अधिकार
यातायात नियमों के अनुसार दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट धारण करना सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य है। मोहन तिवारी स्पष्ट करते हैं कि सुरक्षा के लिहाज से हर व्यक्ति को हमेशा हेलमेट पहनना चाहिए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति ने दुर्घटना के वक्त हेलमेट नहीं पहन रखा था, तो केवल इस आधार पर उसका कानूनी क्षतिपूर्ति का अधिकार खारिज नहीं हो जाता। गंभीर चोट लगने या बड़ा हादसा होने पर बिना हेलमेट वाले चालक या सवार को भी कानूनी रूप से मुआवजा मिल सकता है, क्योंकि अदालतें संपूर्ण परिस्थितियों और सामने वाले वाहन की लापरवाही का समग्र विश्लेषण करती हैं।
मृत्यु की स्थिति में आश्रितों की गणना
यदि किसी दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में व्यक्ति की असमय मृत्यु हो जाती है, तो मुआवजे का निर्धारण मृतक की आय और उसके आश्रितों की संख्या के आधार पर किया जाता है। ट्रिब्यूनल यह देखता है कि मृतक अपने परिवार में आजीविका चलाने वाला इकलौता सदस्य था या नहीं। उदाहरण के तौर पर, यदि परिवार में एक अकेला कमाने वाला बेटा था और उसके ऊपर वृद्ध माता-पिता तथा तीन या चार बहनों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी थी, तो इस सामाजिक और आर्थिक निर्भरता को अदालत प्रमुखता से दर्ज करती है। मृतक की कमाई से कितने लोगों का जीवन यापन चल रहा था, इसी पैमाने पर आश्रितों के भविष्य की सुरक्षा हेतु मुआवजे की धनराशि तय की जाती है।
























